उस युवती ने सिगरेट का आखिरी लम्बा कश लिया और सिगरेट के टुकड़े को ऐश ट्रे में रगड़ दिया। काउच पर सीधी हो कर लेट गयी और जब आदमी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तो तराशी हुई मुस्कान के साथ बोली, ‘‘सर, गो अ हेड! टाइम इज मनी फॉर मी?’’
वह आदमी कुछ असमंजस की स्थिति में था। चालीस-बयालीस के आस-पास की आयु, कलर किए गए बाल जिनके बीच से खोपड़ी झांकने लगी थी, हल्की-सी तोंद और आंखों में पल-पल बदलते भाव। वो उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है जो हर सुबह पांच मिनट नाक से हवा निकाल कर अपनी सेहत की देखभाल करता है, नहाने के बाद जोर-जोर से कुछ रट कर लोक-परलोक सुधार लेता है, कुत्ते को रोटी डालकर और सूरज की ओर मुंह करके छत के कोने में जल की कुछ बूंदे टपका कर पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी से निवृत हो लेता है और हर बुराई के लिए दूसरे को जिम्मेदार ठहरा कर अपनी आत्मा को पवित्र कर लेता है।
दिन भर घर-गृहस्थी में खटती पत्नी के आधे-अधूरे, अधजगे, कई बार पसीने से गंधाते, समय से पहले ढीले पड़ गए शरीर के अलावा स्त्री देह से उसका परिचय सिर्फ परदे की ओट से कामवाली को ताकने या सड़क पर आती-जाती महिलाओं/लड़कियों को इस अंदाज से घूरने कि मैं तो कहीं और देख रहा था, तक ही सीमित था। इस तरह एक एक्जीक्यूटिव सूइट में एक यूक्रेनियाई कॉल गर्ल के साथ रहना उसके ख्वाबो में भी नहीं था।
लेकिन किस्मत से विश्व बैंक और सरकार से पैसे का ऐसा अकूत प्रवाह आया कि पूरे शहर को खोद कर पाइप लाइन बिछाने का कार्य चालू करने का आदेश पारित हो गया। इस शहर में एक रिवाज है, दशक में एक बार पूरे शहर में पाइप लाइनें डाली जाती हैं। सूखी, चटकती पाइप लाइनों को जमीन के अंदर दफना दिया जाता है और दुबारा पाइप लाइनों को बिछा दिया जाता है। लेकिन इनमें कभी पानी आएगा इस उम्मीद में कितनी आंखों में झाइयां पड़ चुकी हैं कहा नहीं जा सकता।
इसी के साथ कार्यालय के बाहर जाइलो, बोलेरो, स्कार्पियो, सफारी की लाइनें लग गयी, जिनमें भरी हुई ठेकेदारों, सप्लायरों की भीड़ मक्खियों की तरह ठेकों की चाशनी पर मंडराने लगी। उसके जैसा मामूली-सा जूनियर इंजीनियर अचानक एक ख़ास व्यक्ति हो गया। वो उस मंदिर का पुजारी हो गया, बड़े-बड़े साहबों रूपी भगवानों को रिझाने की कुंजी उसके ही पास थी। इसलिए सारी भीड़ उसके आस-पास ही जमा होने लगी। नोट कोई खास बात नहीं थी, उसे गिन कर देने वाले भी थे और तोल कर देने वाले भी। लेकिन जब एक ठेकेदार ने अकेले में ले जाकर ये अजीबोगरीब पेशकश की तो वो सकपका गया। वैसे वो इज्जतदार व्यक्ति था, एक बेटी भी थी जिसकी इज्जत का उसे बहुत ख्याल था, समाज में प्रतिष्ठा थी। लेकिन इज्जत भी बहुत अद्भुत चीज होती है, बिलकुल बच्चों के खेलने वाली रबर की तरह जिसे हम अपने इच्छा से किसी भी आकार में ढाल सकते हैं।
इसलिए मौन स्वीकृति देकर उसने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया, कई कागजों पर दस्तखत हो गए, साहब राजी हो गए, कई नोटों से भरे ब्रीफकेस इधर से उधर हो गए और उसके साथ ही मजदूरों की फौज फांवड़े, कुदाल, तसले उठा कर कुछ ही दिन पहले बनी शहर की सड़कों को खोदने के लिए टूट पड़ी। और देखते ही देखते शहर सड़कों के श्मशान में बदल गया।
इस सबके बीच उसके हाथ में हवाई जहाज का एक रिटर्न टिकट आ गया, अपने शहर से दूर इस प्रसिद्ध महानगर में आने का ताकि इज्जत की बेदाग चादर तनी रहे और उसके नीचे हर तरह की नीचता बिना किसी भी प्रकार की हीन भावना लाए की जा सके।
यहां होटल में पहुँच कर खूबसूरत वेशधारी महिलाओं के अभिवादन का जवाब देते हुआ वह अपने कमरे में पहुँच गया। सबसे पहले गुलाब की पंखुडि़यों से भरे बाथ टब में इत्मिनान से स्नान किया, फिर जिंजर-हनी टी पी, उसके बाद पास्ता विद व्हाइट सॉस, रशियन सलाद और फ्रैंच फ्राइज। खाने में कोई खास मजा नहीं आया लेकिन ऑर्डर किया था तो खाना ही था। जीभ को तो वही कचोरी, जलेबी सूतने की आदत है फिर भी यह सोच कर खाने का स्वाद लिया कि देश की राजधानी के सबसे मंहगे होटलों में से एक का खाना खाया जा रहा है।
उसके बाद कुछ देर 24 डिग्री सेल्सियस तापमान की तरावट में आलीशान पलंग पर आरामदायक झपकी ली और फिर दरवाजे की घंटी बजने पर उठ गया। दरवाजा खोला तो यह लंबी चौड़ी युवती, जिसकी लम्बाई उससे भी कई इंच ज्यादा थी, अंदर आ गयी। भक्क गोरा रंग, बड़ी-बड़ी लेकिन कुछ भूरी-सी आंखे, बड़ा चेहरा, गालों की हड्डियां उभरी हुई, भरे-भरे होंठों पर लगायी गहरी लाल लिपिस्टिक और कंधों पर बिखरे दोहरे रंग के करीने से कटे हुए बाल। लुभावना कसा हुआ नीला टॉप और घुटनों तक की डेनिम स्कर्ट, स्कर्ट के नीचे दिखती कसी हुई पिंडलियां और बैंगनी रंग की हाई हील सेंडल। एक ही नजर में उसने भांप लिया कि युवावस्था में फिल्मों देखी हुई हॉलीवुड हिरोइनों, जिन्होने घर के सूने कोनों में बैठ कर किए हुए अनगिनत मानसिक, शारीरिक विलासो को रंगीन किया था, इस कमनीय काया के सामने फीकी हैं। कल्पना की हर उड़ान के लिए इसके पास कोई-न-कोई ठौर-ठिकाना है।
सधी हुई मुस्कान, बिलकुल नपे-तुल ढंग से हाय-हैलो, रोबोट की तरह नाम मात्र के अधोवस्त्रों को छोड़ कर बाकी कपड़ों को उतारना फिर सिगरेट सुलगाना, उसे जल्दी-जल्दी कश लेकर खत्म करना और फिर काउच पर लेट जाना और उस आदमी द्वारा चुपचाप बैठे रहने पर दुबारा उसी गढ़ी हुई मुस्कान के साथ कहना, ‘‘‘‘सर, गो अ हेड! टाइम इज मनी फॉर मी?’’
उस आदमी की हालत भी खराब थी। दो बच्चों के बाप, अगले साल शादी की रजत जयंती है फिर भी उसे लग रहा था कि वो कुंआरा है और स्त्री देह से उसका कोई परिचय ही नहीं है। या शायद उसकी वही हालत थी जो किसी भूखे के सामने छप्पन भोग रख देने से होती है। वो समझ ही नहीं पाता कि पहले क्या खाए और बस भोजन को ताकता हुआ रह जाता है।
लेकिन कुछ तो करना ही था, उसने हिम्मत बटोरी, उस युवती पर झुका और अपने कंपकपाते सूखे होंठ उसके होठों पर रख दिए।
‘‘वॉट द हैल यू आर डूइंग?’’ उस युवती ने उसे इतनी ताकत से धकेला कि वो फिसल कर फर्श पर गिर पड़ा।
‘‘व्हाट हैपंड?’’, उस आदमी ने किसी तरह साहस बटोर कर कहा।
‘‘डू एनीथिंग यू वांट, ऑर आस्क मी टू डू व्हाटऐवर यू वांट, बट नेवर डेयर लिप टू लिप किसिंग’’ वो बुरी तरह झल्ला रही थी।
‘‘बट व्हाई?’’, वो आदमी हैरत में डूब गया। उसे याद आया कि अभी कुछ दिन पहले जब उसने दांतो के एक डाक्टर का पानी का बिल कम कराया था तो उसने उसके मुंह का फ्री चेक अप करके सब कुछ ओ. के. बताया था।
‘‘यू सन ऑफ़ बिच, लिप टू लिप किसिंग इज फॉर लवर नॉट फॉर कस्टमर!!’’
वो आदमी भोंचक्का रह गया। विचार उसके दिमाग में चक्करघिन्नी की तरह घूमने लगे थे। अचानक उसे लगने लगा कि वो नंगा होकर बिकने के लिए बाजार में बैठा है और ये गरिमामयी औरत उसे हिकारत से घूर रही है।
वह आदमी कुछ असमंजस की स्थिति में था। चालीस-बयालीस के आस-पास की आयु, कलर किए गए बाल जिनके बीच से खोपड़ी झांकने लगी थी, हल्की-सी तोंद और आंखों में पल-पल बदलते भाव। वो उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है जो हर सुबह पांच मिनट नाक से हवा निकाल कर अपनी सेहत की देखभाल करता है, नहाने के बाद जोर-जोर से कुछ रट कर लोक-परलोक सुधार लेता है, कुत्ते को रोटी डालकर और सूरज की ओर मुंह करके छत के कोने में जल की कुछ बूंदे टपका कर पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी से निवृत हो लेता है और हर बुराई के लिए दूसरे को जिम्मेदार ठहरा कर अपनी आत्मा को पवित्र कर लेता है।
दिन भर घर-गृहस्थी में खटती पत्नी के आधे-अधूरे, अधजगे, कई बार पसीने से गंधाते, समय से पहले ढीले पड़ गए शरीर के अलावा स्त्री देह से उसका परिचय सिर्फ परदे की ओट से कामवाली को ताकने या सड़क पर आती-जाती महिलाओं/लड़कियों को इस अंदाज से घूरने कि मैं तो कहीं और देख रहा था, तक ही सीमित था। इस तरह एक एक्जीक्यूटिव सूइट में एक यूक्रेनियाई कॉल गर्ल के साथ रहना उसके ख्वाबो में भी नहीं था।
लेकिन किस्मत से विश्व बैंक और सरकार से पैसे का ऐसा अकूत प्रवाह आया कि पूरे शहर को खोद कर पाइप लाइन बिछाने का कार्य चालू करने का आदेश पारित हो गया। इस शहर में एक रिवाज है, दशक में एक बार पूरे शहर में पाइप लाइनें डाली जाती हैं। सूखी, चटकती पाइप लाइनों को जमीन के अंदर दफना दिया जाता है और दुबारा पाइप लाइनों को बिछा दिया जाता है। लेकिन इनमें कभी पानी आएगा इस उम्मीद में कितनी आंखों में झाइयां पड़ चुकी हैं कहा नहीं जा सकता।
इसी के साथ कार्यालय के बाहर जाइलो, बोलेरो, स्कार्पियो, सफारी की लाइनें लग गयी, जिनमें भरी हुई ठेकेदारों, सप्लायरों की भीड़ मक्खियों की तरह ठेकों की चाशनी पर मंडराने लगी। उसके जैसा मामूली-सा जूनियर इंजीनियर अचानक एक ख़ास व्यक्ति हो गया। वो उस मंदिर का पुजारी हो गया, बड़े-बड़े साहबों रूपी भगवानों को रिझाने की कुंजी उसके ही पास थी। इसलिए सारी भीड़ उसके आस-पास ही जमा होने लगी। नोट कोई खास बात नहीं थी, उसे गिन कर देने वाले भी थे और तोल कर देने वाले भी। लेकिन जब एक ठेकेदार ने अकेले में ले जाकर ये अजीबोगरीब पेशकश की तो वो सकपका गया। वैसे वो इज्जतदार व्यक्ति था, एक बेटी भी थी जिसकी इज्जत का उसे बहुत ख्याल था, समाज में प्रतिष्ठा थी। लेकिन इज्जत भी बहुत अद्भुत चीज होती है, बिलकुल बच्चों के खेलने वाली रबर की तरह जिसे हम अपने इच्छा से किसी भी आकार में ढाल सकते हैं।
इसलिए मौन स्वीकृति देकर उसने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया, कई कागजों पर दस्तखत हो गए, साहब राजी हो गए, कई नोटों से भरे ब्रीफकेस इधर से उधर हो गए और उसके साथ ही मजदूरों की फौज फांवड़े, कुदाल, तसले उठा कर कुछ ही दिन पहले बनी शहर की सड़कों को खोदने के लिए टूट पड़ी। और देखते ही देखते शहर सड़कों के श्मशान में बदल गया।
इस सबके बीच उसके हाथ में हवाई जहाज का एक रिटर्न टिकट आ गया, अपने शहर से दूर इस प्रसिद्ध महानगर में आने का ताकि इज्जत की बेदाग चादर तनी रहे और उसके नीचे हर तरह की नीचता बिना किसी भी प्रकार की हीन भावना लाए की जा सके।
यहां होटल में पहुँच कर खूबसूरत वेशधारी महिलाओं के अभिवादन का जवाब देते हुआ वह अपने कमरे में पहुँच गया। सबसे पहले गुलाब की पंखुडि़यों से भरे बाथ टब में इत्मिनान से स्नान किया, फिर जिंजर-हनी टी पी, उसके बाद पास्ता विद व्हाइट सॉस, रशियन सलाद और फ्रैंच फ्राइज। खाने में कोई खास मजा नहीं आया लेकिन ऑर्डर किया था तो खाना ही था। जीभ को तो वही कचोरी, जलेबी सूतने की आदत है फिर भी यह सोच कर खाने का स्वाद लिया कि देश की राजधानी के सबसे मंहगे होटलों में से एक का खाना खाया जा रहा है।
उसके बाद कुछ देर 24 डिग्री सेल्सियस तापमान की तरावट में आलीशान पलंग पर आरामदायक झपकी ली और फिर दरवाजे की घंटी बजने पर उठ गया। दरवाजा खोला तो यह लंबी चौड़ी युवती, जिसकी लम्बाई उससे भी कई इंच ज्यादा थी, अंदर आ गयी। भक्क गोरा रंग, बड़ी-बड़ी लेकिन कुछ भूरी-सी आंखे, बड़ा चेहरा, गालों की हड्डियां उभरी हुई, भरे-भरे होंठों पर लगायी गहरी लाल लिपिस्टिक और कंधों पर बिखरे दोहरे रंग के करीने से कटे हुए बाल। लुभावना कसा हुआ नीला टॉप और घुटनों तक की डेनिम स्कर्ट, स्कर्ट के नीचे दिखती कसी हुई पिंडलियां और बैंगनी रंग की हाई हील सेंडल। एक ही नजर में उसने भांप लिया कि युवावस्था में फिल्मों देखी हुई हॉलीवुड हिरोइनों, जिन्होने घर के सूने कोनों में बैठ कर किए हुए अनगिनत मानसिक, शारीरिक विलासो को रंगीन किया था, इस कमनीय काया के सामने फीकी हैं। कल्पना की हर उड़ान के लिए इसके पास कोई-न-कोई ठौर-ठिकाना है।
सधी हुई मुस्कान, बिलकुल नपे-तुल ढंग से हाय-हैलो, रोबोट की तरह नाम मात्र के अधोवस्त्रों को छोड़ कर बाकी कपड़ों को उतारना फिर सिगरेट सुलगाना, उसे जल्दी-जल्दी कश लेकर खत्म करना और फिर काउच पर लेट जाना और उस आदमी द्वारा चुपचाप बैठे रहने पर दुबारा उसी गढ़ी हुई मुस्कान के साथ कहना, ‘‘‘‘सर, गो अ हेड! टाइम इज मनी फॉर मी?’’
उस आदमी की हालत भी खराब थी। दो बच्चों के बाप, अगले साल शादी की रजत जयंती है फिर भी उसे लग रहा था कि वो कुंआरा है और स्त्री देह से उसका कोई परिचय ही नहीं है। या शायद उसकी वही हालत थी जो किसी भूखे के सामने छप्पन भोग रख देने से होती है। वो समझ ही नहीं पाता कि पहले क्या खाए और बस भोजन को ताकता हुआ रह जाता है।
लेकिन कुछ तो करना ही था, उसने हिम्मत बटोरी, उस युवती पर झुका और अपने कंपकपाते सूखे होंठ उसके होठों पर रख दिए।
‘‘वॉट द हैल यू आर डूइंग?’’ उस युवती ने उसे इतनी ताकत से धकेला कि वो फिसल कर फर्श पर गिर पड़ा।
‘‘व्हाट हैपंड?’’, उस आदमी ने किसी तरह साहस बटोर कर कहा।
‘‘डू एनीथिंग यू वांट, ऑर आस्क मी टू डू व्हाटऐवर यू वांट, बट नेवर डेयर लिप टू लिप किसिंग’’ वो बुरी तरह झल्ला रही थी।
‘‘बट व्हाई?’’, वो आदमी हैरत में डूब गया। उसे याद आया कि अभी कुछ दिन पहले जब उसने दांतो के एक डाक्टर का पानी का बिल कम कराया था तो उसने उसके मुंह का फ्री चेक अप करके सब कुछ ओ. के. बताया था।
‘‘यू सन ऑफ़ बिच, लिप टू लिप किसिंग इज फॉर लवर नॉट फॉर कस्टमर!!’’
वो आदमी भोंचक्का रह गया। विचार उसके दिमाग में चक्करघिन्नी की तरह घूमने लगे थे। अचानक उसे लगने लगा कि वो नंगा होकर बिकने के लिए बाजार में बैठा है और ये गरिमामयी औरत उसे हिकारत से घूर रही है।