मैं
खुद के साथ कभी इत्मीनान से बैठा ही नहीं
कभी तथाकथित संतों की बातों में आकर खुद को कोसता रहा
कभी खुद पर ही मोहित हो कर नशे में झूमता रहा
कभी इत्मीनान से खुद के साथ नहीं बैठा
निहारते, प्यार से एक-एक आवरण को उठा कर देखते
बिना कोसे, बिना पक्ष लिए
बस आराम से, जैसे किसी आत्मीय के साथ