Thursday, September 15, 2016



जानवर

तुम उसे छोड़ क्यों नहीं देती हो? वो तुमसे जानवरों को लजाने वाला व्यवहार करता है, कोई काम नहीं करता और कल तो तुम्हारे बच्चे को नशे में टांगो से इस तरह खींचा कि उसे सूजन ही आ गयी। फायदा क्या ऐसे पति का?
फायदा है साहब एक जानवर पास हो तो बाकी आवारा जानवर दूर रहते हैं।

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कीमत

पूरे ऑफिस में कुतूहल था कि बड़े साहब रोज कमरा बंद करके आखिर क्या करते हैं? लोगों के लिए बिना खाए रहना आसान है लेकिन बिना झाँका-ताकी किए रहना नामुमकिन है। कुछ खुराफातियों ने किसी तरह वेंटीलेटर तक पहुचने की योजना बनायी और इधर साहब ने अपना कमरा लॉक किया, सेक्रेटरी को एक घंटे तक डिस्टर्ब नहीं करने का आर्डर दिया उधर वो खुराफाती अपनी अस्थायी सीढी से वेंटीलेटर तक पहुँच गए। अन्दर झाँका तो भोचक्के रहे गए! साहब कोट उतार कर जमीन पर आलथी-पालथी मार कर हाथ से दाल-चावल मिला कर खा रहे थे।
बड़े आदमी होने की सबसे बड़ी कीमत कीमत ये है कि आप जमीन पर नहीं बैठ सकते!!

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चौराहा लाइव

चौराहे पर चहल-पहल चालू ही हुई थी .. कुछ उनींदे से शटर उठे ही थे। दूकान के बाहर बने बरामदे में बैठी भुट्टेवाली ने अपनी आग दहकाई और गोरे-गोरे भुट्टे तपती आग पर रखे दिए। वो बड़ी उदास थी, शाम को ईद थी और लगातार बारिश रंग में भंग कर रही थी।
"जल्दी दो भुट्टे दे", एक युवक पास आकर रुका।
"देती हूँ ... लगता है आज बारिश ईद का मजा खराब कर देगी", उसने भुट्टे की तरह भुनकते हुए अपना दुखड़ा रोया।
"हा हा हा हा हा ... अच्छा है तुम लोगों की ईद का मज़ा खराब हो जाए", युवक उदंडता पर उतर आया।
"अच्छा हमारी ईद खराब करेगा ... देखियो रक्षाबंधन पर कितनी बारिश होगी", बात ख़तम करते ही उसने आग को झपका और उसका गुस्सा और आग दोनों एक साथ भड़के। फिर भी वो चुपचाप भुट्टा भूनती रही और युवक भी भुट्टे के इन्तेजार में खड़ा रहा। कमाल हो गया कोई दंगा ही नहीं भड़का।

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आटे में नमक

"साहब इसके आदमी की लाश का पोस्टमॉर्टेम हो गया हो तो ले जाए", बदहवास स्वर में उस व्यक्ति ने कहा। उसके साथ अस्त व्यस्त हालत में खड़ी युवती कभी जोर-जोर से रोने लगती तो कभी पागलों की तरह शून्य में कुछ ताकने लगती थी।
"ठीक है .. अभी रुको ... मनोज जरा इधर तो आ"
"क्या हुआ भाई जी? आज बिना कुछ लिए-दिए डेड बॉडी दे दोगे क्या? शाम सूखी-सूखी जाएगी!" मनोज उसके पीछे चल दिया।
"यार भगवान सब देखता है ... आटे में नमक के बराबर ही खाना चाहिए .. हमें भी एक दिन पाप-पुण्य का हिसाब देना होगा। वैसे भी लाश की जेब में पांच सौ का नोट पड़ा था!"

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आधुनिक

"डैड हाउ डर्टी एवरीवेयर !! इट इज लाइक हेल हियर " पुत्री ने चश्मा चढाते हुए नाक भी चढ़ाई।
"डिअर! इट इज इंडिया! सो ऑर्थोडॉक्स, डर्टी, बेकवर्ड एंड अनकल्चर्ड !! ओनली फॉर टू डेज .. टोलरेट समहाउ " पिता ने उत्तर दिया।
दरवाजा खटखटाया तो एक अधेड़ महिला और एक अधेड़ पुरुष ने दरवाजा खोला।
"ये कौन है?" सबने चौंकते हुए एक साथ पूछा।
"बेटा! ये मेरी बहुत पुरानी मित्र है मेरी ही तरह अकेली है। तुम्हारे अमेरिका जाने के बाद मैं बहुत अकेला हो गया तो हमने फैसला किया की अपनी जिन्दगी के बचे हुए दिन हम साथ-साथ गुजारेंगे", अधेड़ ने आत्मविश्वास से कहा।
"पापा आपका दिमाग खराब हो गया है? सभ्यता, संस्कृति और समाज का कुछ तो ख़याल करते!! इस उम्र में आपको शर्म नहीं आयी?"

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अश्लील

लड़की - चलो आज कुछ बेहद अश्लील हरकत करते हैं!!
लड़का - यहाँ सड़क पर??
लड़की - हाँ यही!!
लड़का - क-क .. क्या करोगी?
लड़की - वो सामने भिखारिन के साथ बैठा छोटा बच्चा हमारी और ताक रहा है। उसके सामने आइस क्रीम खरीद कर खाते हैं।

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जलन

उस घर में हर बार कार की बढ़ती लम्बाई, दीवार पर लगते बेशकीमती टाइलों और आकाश की और बढ़ती मंजिलों के साथ मेरी जलन बढ़ती जा रही थी। लेकिन उस सर्द रात रात टटोलते हुए मैं उस घर के पिछवाड़े से निकला तो एक खिड़की खुली हुई दिखी। स्याह धुंध के साथ घुल रही कमरे के सीऍफ़एल की सफ़ेद रोशनी के बीच एक कमजोर चेहरा जैसे अचानक अतीत से झाँका।
"क्या ले कर आ रहा है बेटा?"
"ब्रेड ला रहा था अम्मा। क्यों?"
"एक देगा क्या?"
मैंने झटके से ब्रेड का पैकेट फाड़ा और तीन-चार ब्रेड पकड़ा दिए। मेरे जलन के घावों पर राहत का मरहम फ़ैल गया।

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मुलें 

"देखिये 27 दिन की मूलें हैं शान्ति तो करानी ही पड़ेगी ... कितना भी कम कर लूँ एक छोटी पूजा और 27 ब्राहमणों का भोजन तो होगा ही ... वर्ना बच्चा माता-पिता पर भारी पड़ेगा" पंडितजी ने गंभीर स्वर में कहा।
रानी ने अपनी गोद में बेसुध सो रहे मासूम को देख कर सोचा ये कैसे उन पर भारी हो सकता है?
रमेश ने अपनी उदास नजर घुमाई तो रानी के पैरों पर अटक गयी।
"अब मूल शांति तो करानी ही पड़ेगी ... रानी अभी तू ये पायल दे दे .. एक बार पुलिस से खोखा वापिस मिल गया तो पायल क्या तेरी सोने की चूडी भी पक्की"
इतना कह कर रमेश की आंखें बुझ गयीं, रानी के आँखों में भी स्याह रंग उभर आया और पंडितजी की आँखों में रुपहली चमक आ गयी।

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वीनस

हॉस्पिटल से आज नयना घर आ गयी। कूकर फटने से उछटी खौलती हुई दाल ने पूरा एक तरफ का चेहरा जला दिया, खाल जल कर ढीली पड़ गयी थी। अब तो बस हल्की-सी टीस रह गयी है, लेकिन त्वचा पर ऐसे गहरे निशान पड़ गए, जो शायद अब जिंदगी भर नहीं जाएंगे। शीशे से तो उसे खौफ लग रहा है। नयी बहु की खूबसूरती की नुमाइश कर गर्व का अनुभव करने वाली सास आज ऐसा व्यवहार कर रही थी जैसे उसने जानबूझ कर कोई भारी अपराध कर दिया हो।
रात को कमरे की लाइट जलाने का भी मन नहीं हुआ, यूं ही अंधेरे में लेटी रही। अचानक वैभव आकर धीरे से उसकी बगल में लेट गया और लैम्प जला दिया। रोशनी नयना के चेहरे पर पड़ी तो अपनी आंखों का गीलापन छुपाने के लिए उसने दूसरी ओर मुंह कर लिया। वैभव झुका और उसके गाल पर बने खुरंट पर हल्के से चूम कर फुसफसाया, ‘‘मिस्ड यू सो मच!’’ नयना को लगा अब वीनस भी उसके सामने कुछ नहीं है और उसने घूम कर वैभव को बाहों में कस लिया।

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सभ्यता

गली कुछ पुरानी सी थी, धुप भी वहां घुसने में हिचकती थी और नालियों की उच्चश्रंख्लता सब तरफ दिख रही थी। बीचों बीच बने एक ऊँचे चबूतरे पर एक काँपता हुआ बूढा व्यक्ति खड़ा हुआ था, सीढियां उसके कमजोर लरजते पैरों के मुकाबले काफी ऊँची थी।
"भाई जरा नाली पर बैठा दो", वो हर आने-जाने वाले से गुहार कर रहा था।
कुछ बिना उसकी तरफ देखे निकल जाते, कुछ मुस्करा कर आगे बढ़ जाते, कुछ चाह कर भी हिचक के कारण आगे बढ़ जाते। कुछ देर बाद संयोगवश एक इंसान गली में घुसा और उसकी बात सुन कर उसकी और बढ़ा। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी, सारी सभ्यता बह चुकी थी।

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कत्ल

खिड़की से झांकती नीम की डाल मेरे लिए पूरी कायनात से कम नहीं थी। कभी उस पर कोई गोरैया फुदकती आ जाती तो कभी कोई गिलहरी सुस्ताने लगती। उसके पत्ते पीले पड़ते, झडते, नईं कोपलें आतीं, पत्तियां छा जाती, निम्बोरियां उगती और इस तरह मेरे जीवन की फीकी एकरसता में बदलाव की मिठास घुलती रहती।
एक सुबह उठा तो खिड़की एक डरावनी मनहूसियत के साथ खाली पड़ी थी, घबरा कर खिड़की के पास गया तो देखा पेड़ का तना सडक पर बेसुध पड़ा था और कुछ लोग उसकी काटी गयी डालियों के गट्ठर बना रहे थे। हमेशा पेड़ की पत्तियों से कूड़ा होने की शिकायत करने वाले कॉलोनी के कुछ लोग मुस्कराते चेहरों के साथ बतिया रहे थे। कहीं कोई मातम नहीं था, कहीं कोई उदास नहीं था। किसी को जरा भी अहसास नहीं था की मेरा क्या गया सिवाय मेरी पलकों पर झूलती आंसू की एक बूँद के।

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मंदिर

"यार! आजकल क्या चक्कर है रोज मंदिर की चक्कर लगा रहा है? कोई मनौती माँगी है क्या?", मैंने विनय को मंदिर की भीड़ से निकल कर आते देखा तो पूछ लिया।
"अरे यार! मंदिर आने के बहुत फायदे हैं!! ये कि आजकल इतने महंगे ब्रांडेड कपडे आते हैं उन्हें दिखाने के लिए कोई रोज तो पार्टी कर नहीं सकता! नंदनी से भी रोज यहीं मिलना हो जाता है ... घरवाले कुछ नहीं बोलते ... आजकल सेटिंग का ज़माना है तो भगवान से भी सेटिंग बनी रहती है और और ये जो कभी जेब में एक-दो के सिक्के आ जाते हैं वो और कहीं तो चलते नहीं यहाँ भिखारियों को देकर समाज सेवा भी हो जाती है ... ", उसने अपने जेल लगे बालों पर उँगलियाँ फिराते हुए मुस्करा कर जवाब दिया।

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माँ का यक्ष प्रश्न

उसकी आँखों में ख़ुशी के दिए टिमटिमा उठते हैं
दीयों की रोशनी में उसके भीतर के अँधेरे और गहरे हो जाते हैं
सर के दुपट्टे के साथ चेहरे पर मुस्कान खींचती है
और पूछती है
सर! बड़ी लडकी को पढ़ाने से क्या फायदा?
रोटी तो तब भी वैसे ही बनायेगी?

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दर्द

दर्द की लहरें पेट में उठ रही हैं। एक पल को थोड़ी ठिठकती फिर उसी तीखेपन के साथ फ़ैल जाती। पता नहीं हर महीने पेट में ये कौन सी सुनामी आ जाती है फिर न कुछ खाना अच्छा लगता है न पीना और ना चाहते हुए भी आँखों में आंसू आ जाते हैं । हर बात पर खिसियाहट होती है।
"प्रियंका" अचानक दादा जी ने आवाज लगा दी।
"हाँ दादा जी", प्रियंका ने लेटे-लेटे ही जवाब दिया।
"जरा ऊपर से पुराने अख़बारों की गड्डी उतार दे, मुझे एक अखबार ढूंढना है"
"दादाजी, थोड़ी देर बाद उतार दूँ?"
"क्यों कुछ हो गया हैं क्या?"
"नहीं दादाजी", प्रियंका ने जवाब दिया। उसे ये बताने में झिझक हो रही थी की वो हर महीने होने वाले दर्द को झेल रही है।
"कल घूमने जाने के लिए तो बड़ी जल्दी तैयार हो गयी थी .. आज जरा सा काम बता दिया तो बहाना मार दिया!! क्या ज़माना आ गया है" दादाजी का तेजाबी स्वर कमरे में गूंज उठा।
प्रियंका के गालों पर गर्म आंसुओं की कुछ बूंदे फिसल आयीं। काश वो बेहिचक बता सकती की वो क्यों नहीं उठ पा रही है!!

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कर्फ़यू

सहमी हुई रात सन्नाटे की चादर ओढ़ कर गली में पसरी हुई थी। हर आहट पर लगता जैसे ठिठक जाती। विवेक ने मोटर साइकिल निकाली और स्टार्ट करने लगा। कई किक मारी लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। टेढ़ी की, प्लग साफ़ किया लेकिन सब बेकार। हताश हो कर मोबाइल निकाल और मिला दिया, "यार असलम मेरी मोटर साइकिल स्टार्ट नहीं हो रही। मुझे बुआ जी को हॉस्पिटल देखने जाना है, इस समय कर्फ़यू में मुझे मैकेनिक भी नहीं मिलेगा!"
थोड़ी देर में असलम आ गया। विवेक उसकी मोटर साइकिल में पीछे बैठ गया और दोनों रात के सन्नाटे को चीरते हुए तेज गति से बढ़ गए।
"यार इतनी रात में इस मुस्लिम बस्ती से क्यों निकल रहा है? मेरी तो हवा टाइट हो रही है!!" अचानक विवेक ने कहा।
"कमाल है यार? मुसलमान के पीछे बैठने में डर नहीं लग रहा मुस्लिम बस्ती से निकलने में डर लग रहा है?" असलम ने मुस्करा कर कहा।
"ओ तेरी!! मैंने तो सोचा ही नहीं की तू मुसलमान है!!!" विवेक ठठा कर हंसा। दोनों की हंसी देर तक उस घोर अन्धकार में दिए की लौ की तरह टिमटिमाती रही।

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इज्जत : एक खोज

आजकल हर तरफ इज्जतकी बहुत बातें हो रही है तो मेरा भी मन मचल गया कि मैं भी इज्जत को खोज कर उससे गले मिल कर कहूं कि ‘‘भई वाह! हमारे देश में बड़े-से-बड़े महापुरुष की जितनी बात नहीं होती जितनी आपकी होती है!!’’
मैंने सोचा इज्जत की खोज की शुरूआत अपने मोहल्ले से ही की जाए, आखिकार चैरिटी बिगिन्स एट होम! तो मोहल्ले के सबसे पुराने, 'हम तो सब जानते हैं' टाइप बन्दे से मिला और पूछा, ‘‘अंकल आजकल अपने मोहल्ले में किसके पास इज्जत है?’’
उन्होंने अपने अधगंजे सर पर उंगलियां फेरी और दार्शनिक मुद्रा में बोले, ‘‘इस समय तो भाई अपने मोहनकुमार टॉप पर चल रहे हैं! अपने मकान को शानदार कोठी में बदल लिया है, बोलेरो, स्कार्पियो, होन्डा सिटी-वोन्डा सिटी सब आ गयी हैं। पूरा मोहल्ला कोई भी बात होती है तो उनके पास आता है, हर जगह उनकी रेपूटेशन है, पुलिस में, एडमिनिस्ट्रेशन में!!’’
‘‘मोहन कुमार?? लेकिन अंकल वो तो गिरगिटिया, दलबदलू छुटभइया नेता हैं? कभी ये पार्टी तो कभी वो पार्टी? पुलिस से छुड़वाने की दलाली करते थे, हर आन्दोलन में अपनी फोटो खुद ही खींच कर अखबार में दे कर आते थे!! और जिस मकान में रहते हैं वो भी कब्जाया हुआ है!! उनके यहां इज्जत कहां से आ गयी?’’
‘‘अरे बेटा तुम कुछ भी कहो आज तो इज्जत उनके यहां ही है!! हर पार्टी वाला चक्कर काट रहा है, दमदार नेता है, नोटों की बारिश हो रही है!!’’
मुझे उनकी बात पर यकीन नहीं हुआ और मैंने अपनी खोज जारी रखते हुए लोगों से मिलना जारी रखा। कहीं देखा रिश्वत लेकर इज्जत बढ़ रही है, कहीं देखा बीवी को पीट कर इज्जत हो रही है, कहीं देखा दहेज लेकर इज्जत बढ़ रही है, कहीं ब़ोय फ्रेंड या गर्ल फ्रेंड की संख्या से इज्जत हो रही है किसी ने इज्जत को औरत की देह में टांक दिया, जरा सा हिली नहीं की इज्जत नीचे टपक गयी। सुबह से रात हो गयी लेकिन वास्तव में इज्जत कहां है यह पता नहीं चला। रात में घर लौटने हुए एक सड़क पर मुड़ा तो देखा कि मोहल्ले का एक लड़का, जो अपने ब्रान्डेड कपड़ों, चश्मों और महंगी से महंगी मोटर साइकिलों के लिए पूरे मोहल्ले में इज्जत से देखा जाता था, अजीब सी मुद्रा में सड़क पर घूम रहा था। लिपिस्टिक लगाए और और कानों में झुमके पहने। मुझे देख कर सकपका गया। मैंने आव देखा न ताव उससे भी पूछ लिया इज्जत के बारे में।
‘‘भाईसाहब मेरी इज्जत का फालूदा मत करो। अभी बहुत इज्जतदार लोग आने वाले हैं आप यहां से सटको!!’’
मैं भौंचक्का सा उसे देखता रहा फिर बिना इज्जत से मिले अपने घर की ओर लौट लिया।

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ठग

जैसे ही उनींदा सा सूरज जैसे ही लेटा और मदमाती रात अपनी तारों टकी काली चूनर लहराती आकाश में दौड़ी उस बाजार की रोशनियाँ जगमगा उठी। पूरा बाज़ार रंग-बिरंगी रोशनियों की बारिश से नहा गया। बड़ी-बड़ी दुकानों में लगे एलसीडी जीवंत हो उठे। शहर का सबसे पॉश इलाका था, इसलिए चमकती कारों और दमकते चेहरों की लम्बी कतारें थी। भिखारियों का यहाँ प्रवेश वर्जित था लेकिन कई सारे गरीब बच्चे छोटा-मोटा सामान बेचते हुए यहाँ वहां घूम रहे थे ... चमकने वाली बॉल्स, रंग बिरंगे गुब्बारे, उछलने वाला कुत्ता ... और जाने क्या-क्या।
उन्ही के बीच एक युवक अपने मुड़े हुए पैरो और एक टेढ़े हाथ के साथ लकड़ी की पहियों वाली गाडी को सड़क पर धकेलता हुआ फूलों के छोटे-छोटे गुलदस्ते बेच रहा था। वो भागती हुई गाडियों के बीच भी बेहिचक निकलता जा रहा था .. एक लम्बी गाडी से एक महिला को उतरता देख कर वो तेजी से उसकी और चल पड़ा।
"मैडम! ये लीजिए .. गुलदस्ते .. गाडी में रख लीजिये .. खूसबू आयेगी ... किसी को देंगी तो याद करेगा ..." उसने अपना सींकिया-सा हाथ आगे बढ़ाया जिसमे चार-पांच गुलदस्ते पकडे हुआ था।
मैडम पहले तो उसको अपने इतना पास देख कर कर कुछ बेचैन हुई, फिर अपना पल्ला ठीक किया, मोबाइल और पर्स एक हाथ में पकड़ा, साड़ी को समेटा की कहीं उससे छू न जाये फिर बड़ी सावधानी से उसके हाथ से गुलदस्ता पकड़ा कही उसकी उंगली न छू जाए। फिर गुलदस्ते को उलट-पुलट कर देखा और पूछा, "कितने का है?"
"मैडम बस तीस रुपए!!"
"तीस रुपए? ठग रहे हो तुम तो!"
"अरे नहीं मैडम देखिये एक गुलाब का भी फूल है .. महँगा आता है!"
"मुझे महंगा सस्ता सब पता है .. तुम लोग जम के ठगते हो! 1 5 में देना हो तो बताओ वरना भागो यहाँ से!"
"मैडम हम लोग नहीं ठगते वरना हमारे पास भी लम्बी गाड़ियाँ होती!!"
उसने झटके से गुलदस्ता वापिस लिया और तेजी से अपनी पहियों वाली गाडी सड़क पर दौडती कारों और मोटर साईकलों के बीच तेजी से निकालता हुआ नजरों से ओझल हो गया। मैडम अवाक खड़ी रह कर मोबाइल में झांक कर अपनी झेंप मिटाने की कोशिश करने लगीं।

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खुजली

एक आदमी के हाथ में अजीब सा संक्रमण हो गया। हथेली में खुजली होने लगी फिर उसे खुजाने से एक घाव बन गया। खुजाने की तलब इतनी ज्यादा थी कि घाव से खून बहने लगता फिर भी खुजाने की इच्छा खत्म नहीं होती। उसने बड़े-से-बड़े डॉक्टर को दिखाया लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा। उसे बहुत शर्म आती, उसने अपने लिए सफेद दस्ताने खरीद लिए और हमेशा उन्हें पहन कर ही घर से बाहर निकलता। लेकिन जब खुजाने की इच्छा बहुत बढ़ जाती तो उसे दूसरों के सामने भी दस्ताने उतार कर खुजाना पड़ता था।
कुछ दिनों बाद उस आदमी ने देखा कि धीरे-धीरे कई लोगों के हाथ में वैसा ही संक्रमण होता जा रहा है। सफेद दस्तानों की बिक्री बढ़ती जा रही थी और सड़क पर सफेद दस्तानों वाले लोगों का ही बोलबाला हो गया था। कुछ समय बाद हालत ये हो गयी कि अधिकांश लोगों के हाथ में यही संक्रमण हो गया। अब किसी को सफेद दस्तानों की जरूरत ही नहीं रही। जब सबके हाथ में वही संक्रमण है तो छुपाने की क्या जरूरत?
फिर एक दिन वहां के राष्ट्राध्यक्ष ने पूरे देश भर से आम और खास लोगों के लिए एक विशाल सभा आयोजित की और टीवी के सभी चैनलों पर उस सभा के सीधे प्रसारण की व्यवस्था की गयी ताकि प्रत्येक नागरिक उसे देख सके। उस सभा को सम्बोधित करते हुए उन्होंने अनेक तर्कों, उदाहरणों और आंकड़ों से पूरे देश को समझाया कि वास्तव में यह खुजली कोई बीमारी नहीं है बल्कि सामान्य बात है और उन्हें इस पर शर्मिन्दा होने या परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है। बल्कि उन्हें इस पर गर्व करना चाहिए। भाषण के अंत में राष्ट्राध्यक्ष ने हाथ उठाकर पूरे राष्ट्र का अभिवादन किया। सबने देखा कि उनकी हथेलियों पर बड़े-बड़े रिसते हुए घाव बने हैं। पूरे राष्ट्र ने करतल ध्वनि से उनके भाषण का स्वागत किया।
उसी सभा में पीछे की तरह खड़े एक आदमी ने जल्दी से अपने हाथ जेब के अन्दर डाल लिए। उसे खौफ बैठ गया था कि अगर बाकियों को पता चल गया कि उसके हाथ में चमत्कारिक रूप से ये संक्रमण नहीं है तो उसे असामान्य समझते हुए उसके हाथ काट देंगे!!

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गिरगिट

बीच रास्ते में रुक कर किताबों की पॉलिथीन को फिर से ठीक किया तो न चाहते हुए भी विवेक के मन में एक विचार धमक गया कि एक बैग खरीद लेता तो ठीक रहता। लेकिन मां को दिल की बीमारी हो और बाप सरकारी नौकरी में न हो तो किताबें ही मिल जाएं यही बहुत है बैग तो दूर की बात है।
समय के साथ मटमैली हो गयी ईंटो के खरंजे को पार करके दरवाजे तक पहुंचा और दरवाजा खटखटा...या तो एक अधेड़ ने दरवाजा खोला, सेंडो बनियान पहने और गमछा लपेटे, गहराई से रंगे काले बाल और हल्की सी बढ़ी सफेद दाढ़ी, वर्तुलाकार पेट और लम्बा चेहरा, चेहरे पर हमेशा अपने सही होने का अघोषित भाव।
‘‘कहिए?’’ उसने सूखे स्वर में पूछा।
‘‘जी.... जी.....’’ स्वर इतना सूखा था खुद विवेक गला सूख गया और वह हकला गया, लेकिन जल्दी ही संभल कर बोला, ‘‘जी नीरा है? उससे कुछ नोट्स लेने थे!’’
‘‘नीरा से नोट्स लेने थे? अरे बाजार में किताबों की दुकानों में आग लग गयी क्या? मिस्टर, मैंने बहुत दुनिया देखी है, सब समझता हूं, तुम्हारे लिए अच्छा होगा कि नीरा से दूर रहो वर्ना मुझे और भी तरीके आते हैं’’, उसका स्वर सूखे से तीखा हो चला था और विवेक कुछ समझ पाता इससे पहले ही उसने भाड़ से दरवाजा बंद कर दिया।
विवेक कुछ पल भौंचक्का से खड़ा रहा फिर धीमे कदमों से लौट गया। वह समझ नहीं पा रहा था कि किस बात को शोक मनाए? कान में पड़ी तेजाबी बातों का या नोट्स न मिल पाने का?
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(एक साल बाद)
‘‘हे भगवान तुम फिर आ गए? कितने बेशरम मरे थे जब तुम पैदा हुए? मैं तो समझ रहा था तुम कहीं मर-खप गए होगे’’, अधेड़ ने दरवाजे खोलते हुए कहा।
‘‘जी ...... नीरा के लिए मिठाई का डब्बा लाया था, मैंने आई॰ ए॰ एस॰ का इन्टरव्यू क्लीयर कर लिया है .... ’’ विवेक ने धीरे से कहा।
‘‘अरे वाह ..... तुमने तो कमाल कर दिया ..... मुझे मालुम था एक दिन तुम कुछ करोगे .... वन्डरफुल .... आओ... आओ .... अंदर आओ .... नीरा ..... नीरा .... बेटी देख तो कौन आया है!!!

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बारात

रात की कालिमा धीरे-धीरे बिखरती जा रही है .... जनरेटर की भड़-भड़ चालू होती है .... बुझे हुए चेहरों और दुबली-पतली काया के कुछ लोग तारों के क्रम से बंधी चमकती लाइटों को उठा कर अपने कन्धों पर रखते हैं ... पिचके हुए गालों वाले बड़े से बाजे को अपने मुंह से लगा लेते हैं .. ढोल को गर्दन में टांग लिया जाता है ... काम न होने पर पर ठेला खींचने वाला एक अधेड़ अपनी नशे से चढ़ी आँखों और गले हुए लीवर के साथ बड़े से मंजीरे उठा लेता है ... जबरदस्त गर्मी में सब आजादी से पहले की अंगरेजी सेना की पोशाक पहने हैं ... पढ़ा-लिखा एक युवक पूरे होशो-हवास में तीन-चार सौ साल पहले की बेहद असुविधाजनक पोशाक पहन कर आता है ... सर पर जादूगरों जैसी पगड़ी पहने है .. रिश्तेदारों द्वारा उसे जैसे-तैसे बेचैनी से भरी घोडी पर बैठाया जाता है ... वो कुछ डरा हुआ हैं लेकिन चेहरे पर मुस्कान ओढ़ लेता है ... एक बदहवास बच्चे को उसके पीछे बैठा दिया जाता है .... इसी के साथ शोर चालू हो जाता है .... बैंड-बाजे वालों के फेफड़े और हाथ सुरों के लिए संघर्ष करने लगते हैं ... चिकनी चमेली अपनी पूरी अश्लीलता के साथ खिल जाती है ... फेविकोल अपने पूरे वाहियातपने के साथ सबसे चिपकने लगता है ... पिए, अधपिए युवाओं का समूह घोड़ी के आगे जमा हो जाता है और एल्विस प्रीस्ले से लेकर माइकेल जैक्सन तक सबका पुनर्जन्म हो जाता है ... युवतियों का समूह भी अपनी यदा-कदा मिलने वाली इस छद्म आजादी का आनंद उठाने के लिए शकीरा से लेकर मलैयका तक को मात देने लगता है ... बारात चल पड़ती है ... पसीने की धाराएँ बह निकलती हैं ... कपडे भीगने लगते हैं ... सांसे फूलने लगते हैं ... लेकिन डांस की गर्मी बढ़ती जाती है .... कुछ लोंगो में तो नागिन की आत्मा आ जाती है और वो सड़क पर लोटने लगते हैं .... कुछ रुमाल लेकर बीन बजाते हुए सापों को साधने लगते हैं ... कुछ भाई-बाप युवतियों के समूह के साथ-साथ चल कर एक उंगली उठा कर नृत्य करने का अभिनय करते हैं ... जबकी उनकी निगाह ये देखने में लगी होती हैं की डांस के बहाने कोई छेड़खानी ना कर दे ... बैंड-बाजे वाले न्योछावर के इन्तजार में हैं ... सड़क पूरी घिरी हुई है ... घर पहुँचने के लिए बैचेन कुछ लोग रास्ता खाली होने का इन्तजार कर रहे हैं ... जाम लगता जा रहा है ... एक असहाय एम्बुलेंस ड्राईवर सायरन बजा-बजा कर पीछे लेटे हार्ट अटैक के मरीज को जीवित हॉस्पिटल पहुचाने की कोशिश कर रहा है ...