उपन्यास अंश -
‘‘काया!!! कैसी हो? फोन क्यों नहीं किया इतने दिन?’’ मैंने फोन को कस के हाथ में पकड़ लिया जैसे उसके गिर जाने का डर हो।
‘‘तुम मेरे फोन का इंतजार कर रहे थे?’’
‘‘तुम्हारे इस वाहियात का सवाल का मतलब?’’ मैं चिढ़ गया।
‘‘कैसे हो?’’
‘‘अअ.....अच्छा हूं!!’’ मेरी चिढ़ लीची के खुरदुरे छिलके की तरह उतर गयी और मेरी असलियत मुलायम गूदे की तरह बाहर आ गयी।
‘‘मैं नहीं जानती की ऐसा क्यों हो रहा है ... मेरी कुछ समझ नहीं आ रहा है ... मैं ढेरों लोगों से मिली हूं ...लेकिन जैसा तुमसे मिल कर लगा वैसा मुझे किसी से मिल कर नहीं लगा .... मैं वाकई में तुमको मिस कर रही हूं ... शायद इसकी वजह यह है कि मैंने तुम्हारी आखों में अपना जो चेहरा देखा वो एक औरत का था ... ऐसा चेहरा मुझे कहीं और देखने को नहीं मिला!!’’
‘‘ ..... ’’, मैं कुछ बोल नहीं पाया। भावनाओं से गीले हो गए शब्द फिसल रहे थे, पकड़ में ही नहीं आ रहे थे। मैं सोचने लगा मेरे मन में काया के लिए जो इतना जबरदस्त आकर्षण उत्पन्न हो गया है वो प्रेम है, सेक्स है या कभी किसी विपरीतलिंगी द्वारा मुझमें दिलचस्पी न लेने का परिणाम है। जो भी है, यह इतना प्रबल था कि इसने मेरे मन को गहरी काली घटाओं की तरह घेर लिया। बेचैनी की सारी धूप गायब हो गयी थी, अनजानी-सी ठंडी हवा भीतर-ही-भीतर चलने लगी थी। बादलों की तरह मन में कई सारे रंग भर गए थे लेकिन सब अच्छे लग रहे थे। रह-रह कर एक मीठा-सा अहसास बरस जाता और मेरे अन्तर को तर कर जाता।
अगर ये धोखा भी है तो क्या बुरा है? अखिल ब्रह्मांड में समुद्र के किनारे की रेत के एक कण जितनी हैसियत वाली अपनी पृथ्वी में असंख्य जीवित होते, मरते जीवों के बीच मेरी क्या औकात है? अपने आधे-अधूरे शरीर के साथ अनजानी परिस्थितियों की फिसलपट्टी पर फिसलते हुए, काल्पनिक रिश्तों के बीच सूखे पत्तों की तरह झड़ते जिंदगी के दिनों के बीच अगर कोई चीज मुझे इतना सूकून दे सकती है तो उसका धोखा होना भी कोई बुरा सौदा नहीं है। कम-से-कम जितने दिनों तक यह चल रहा है उतने दिन तक तो इससे रिसता हुआ रस मेरी अनन्त प्यास को बुझाता रहेगा। और स्थायी तो कुछ भी नहीं है!! जहां धोखा नहीं है वहां भी क्या स्थायित्व है? स्थायित्व की तलाश मानवता का सबसे बड़ा रोग है, जो हमे ठीक से जीने ही नहीं देती। हम चीजों को महसूस करने की बजाय उनके अस्थायित्व के भय से ग्रस्त होकर उनका अहसास ही नहीं कर पाते। या कई बार इसके विपरीत यह भूल कर कि हर चीज अस्थायी है उनको बिना छुए, बिना उल्टे-पल्टे उन्हें छोड़ देते हैं और इस बात का अहसास तब होता है जब उनके खत्म होने का वक्त आ जाता है।
‘‘चुप क्यों हो गए? मेरी बात से नाराज हो?’’
‘‘नहीं .... नहीं!! तुम्हारी बात से नाराज नहीं हतप्रभ हूं!! समझ नहीं आ रहा क्या कहूं’’, मैंने अपनी बात खुल कर कह दी।
‘‘मैं तुमसे मिलना चाहती हूँ!! तुम बताओ कब आऊं?’’
‘‘मिलने????’’ मेरा गला सूख गया।
‘‘क्यों? तुम नहीं चाहते मैं मिलने आऊं?’’
‘‘नहीं! नहीं!! मैं चाहता हूं तुम मिलने आओ ..... बल्कि मेरे पास से जाओ ही नहीं ... लेकिन थोड़ा मैनेज करना होगा ... घरवालों का रिएक्शन पता नहीं कैसा होगा?’’
‘‘तुम बच्चे नहीं हो!! अपनी जिंदगी के तीन दशक गुजार चुके हो, क्या तुम अपने फैसले भी नहीं ले सकते?’’, अचानक काया के स्वर मे आयी तल्खी मुझे महसूस होने लगी।
‘‘बात बच्चे होने की नहीं है, हममें कौन अपने ढंग से जीवन जी सकता है? चाहे पांव कब्र में लटके हों फिर भी हरेक को सोचना पड़ता है कि मैं ऐसा करूंगा तो क्या प्रतिक्रिया होगी, मैं वैसा करूंगा तो मेरे परिवार के लोग, मेरा पास-पड़ौस सब क्या कहेंगे।’’
‘‘पागलपन है ये! पागलपन! जहां सही-गलत का फैसला सही-गलत के हिसाब से नहीं लोगों के रिएक्शन के हिसाब से होता हो वो जगह एक बहुत बड़ा पागलखाना है जहां पागलों के कैद करने के लिए सलाखें और बेड़ियां भी नहीं है। अपनी आजादी के लिए सब कुछ दांव पर लगाना पड़ता है, हम जो हैं वही होने के लिए बहुत बड़ा खतरा उठाना पड़ता है। माना कि हम सब फांसी की सजा पाए मुजरिम हैं जिन्हें एक न दिन मौत को गले लगाना ही है लेकिन फांसी पर चढ़ने से पहले कैद में रहने के लिए हम क्यों अभिशप्त हैं? क्यों हम इस जेल में जिंदगी गुजारना चाहते हैं? माना कि जेल में रोटी की गारंटी है, शायद सुरक्षा भी बाहर से अधिक हो लेकिन ये जिंदगी नहीं है। असुरक्षा के डर से जिंदगी को बोनसाई बना लेना पाप है, गमलों में बरगद नहीं फलते-फूलते! पिंजड़े में जो कुछ हमें मिल रहा है उसे खोने के डर से पंख भी नहीं फड़फड़ाना! क्या इसे तुम जिंदगी कहते हो!’’ उसके स्वर आवेश से कांपने लगा।
‘‘हे भगवान!! इतनी भारी-भरकम बाते तुम्हें किसने बतायीं?’’
‘‘जिंदगी ने बतायीं! क्योंकि मैं जिंदगी से सीधे बात करती हूं, किसी को बीच में नहीं आने देती। जिंदगी जितनी लिजलिजी हो उतनी आसान होती है, जहाजों को किनारे पर खड़ा कर दो, कोई खतरा नहीं, कोई समस्या नहीं। लेकिन जहाज की जिंदगी किनारों पर नहीं होती, अगर वो किनारों पर खड़ा हो जाए तो समझ लो वो मर चुका है बस अपनी मृत्यु की घोषणा का इंतजार कर रहा है। मेरे लिए कितना आसान होता अगर मैं भी अपने को एक लड़का मान कर जिंदगी जीने को तैयार हो जाती? मेरा परिवार मेरे साथ होता, मेरा समाज मेरे साथ होता, कोई मजबूर लड़की परम्पराओं के नाम पर मेरे साथ जिंदगी काट लेती, सब कुछ आसान होता और फिर एक दिन मैं एक सामान्य आदमी की तरह मर जाती और सब खत्म हो जाता। लेकिन उस जिंदगी में मौत आने से पहले हर दिन मैं अपने आप को कितनी बार मारती यह मैं ही जानती हूं। मेरी हंसी भी मेरे तड़पते वजूद की भाप की तरह होती, मेरी पूरी जिंदगी मेरी नहीं किसी और की होती। क्या कोई अपनी सुविधाओं और सुरक्षा के लालच के कारण पूरी जिंदगी किसी ऐसे व्यक्ति के साथ गुजार सकता है जो उसे बिलकुल भी पसंद नहीं है?’’
‘‘ओ. के.!! तुमने तो मेरी बोलती बंद कर दी!! मैं आज शाम तक तुमको काॅल करता हूं और फिर बताता हूं कि हम कब मिलते हैं!’’
‘‘ठीक है! मैं तुम्हारे फोन का वेट करूंगी!’’ उसने फोन काट दिया। मैंने रिसीवर रख दिया और एक गहरी सांस ली। ये किस बवंडर से मेरा पाला पड़ा है? इसके सामने तो कुछ भी टिकना मुश्किल है!! उसी समय अचानक मम्मी कमरे में आ गयीं। मैं घबरा गया, जैसे कोई चोरी कर रहा हूं, मुझे लगा कहीं मेरे चेहरे कुछ ऐसे भाव तो नहीं हैं जो मेरी चुगली कर दें। मैंने कोशिश करने लगा कि मेरे चेहरे के भाव बदल जाएं। मम्मी के चेहरे पर सुबह वाला सूखापन नहीं था। पहले जैसी आत्मीयता वहां दोबारा आ चुकी थी। शायद उन्हें लग रहा होगा कि मामला ठंडा पड़ चुका है अब उसके बारे में परेशान होने की जरूरत नहीं है।
‘‘बेटा आज शाम को मुझे और तुम्हारे पापा को शादी में जाना है!’’
‘‘किसकी?’’ मैंने भी ऐसे बात की जैसे कुछ हुआ ही न हो।
‘‘आशा स्टोर वालों की लड़की की। तुम अकेले रह लोगे या पड़ौस में बोल जाऊं’’
‘‘प्लीज मम्मी!! आप किसी से नहीं बोलना मुझे नहीं अच्छा लगता किसी का यहां रहना। कोई प्राॅब्लम नहीं है मैं अंदर से लाॅक कर लूंगा आप आराम से जाओ! कितने बजे जाना है?’’
‘‘शाम को छः बजे तक निकल जाएंगे!’’
‘‘लौटना कब तक होगा?’’
‘‘कम-से-कम ग्यारह तो बजेंगे ही। तुम्हारे पापा को स्कूटर चलाना आता तो टाइम बच जाता लेकिन रिक्शे-टैम्पो से लौटने में इतना समय तो लग ही जाएगा।’’
‘‘ठीक है! आप आराम से जाओ!’’
‘‘खाना में बना कर यहीं मेज पर रख जाउंगी!’’, मम्मी मुझे देख के मुस्करायीं और कमरे से निकल गयीं। झनझनाते हुए विचार मन में उठने लगे और मैंने फोन उठा कर अपने पास रख लिया।
‘‘काया!!! कैसी हो? फोन क्यों नहीं किया इतने दिन?’’ मैंने फोन को कस के हाथ में पकड़ लिया जैसे उसके गिर जाने का डर हो।
‘‘तुम मेरे फोन का इंतजार कर रहे थे?’’
‘‘तुम्हारे इस वाहियात का सवाल का मतलब?’’ मैं चिढ़ गया।
‘‘कैसे हो?’’
‘‘अअ.....अच्छा हूं!!’’ मेरी चिढ़ लीची के खुरदुरे छिलके की तरह उतर गयी और मेरी असलियत मुलायम गूदे की तरह बाहर आ गयी।
‘‘मैं नहीं जानती की ऐसा क्यों हो रहा है ... मेरी कुछ समझ नहीं आ रहा है ... मैं ढेरों लोगों से मिली हूं ...लेकिन जैसा तुमसे मिल कर लगा वैसा मुझे किसी से मिल कर नहीं लगा .... मैं वाकई में तुमको मिस कर रही हूं ... शायद इसकी वजह यह है कि मैंने तुम्हारी आखों में अपना जो चेहरा देखा वो एक औरत का था ... ऐसा चेहरा मुझे कहीं और देखने को नहीं मिला!!’’
‘‘ ..... ’’, मैं कुछ बोल नहीं पाया। भावनाओं से गीले हो गए शब्द फिसल रहे थे, पकड़ में ही नहीं आ रहे थे। मैं सोचने लगा मेरे मन में काया के लिए जो इतना जबरदस्त आकर्षण उत्पन्न हो गया है वो प्रेम है, सेक्स है या कभी किसी विपरीतलिंगी द्वारा मुझमें दिलचस्पी न लेने का परिणाम है। जो भी है, यह इतना प्रबल था कि इसने मेरे मन को गहरी काली घटाओं की तरह घेर लिया। बेचैनी की सारी धूप गायब हो गयी थी, अनजानी-सी ठंडी हवा भीतर-ही-भीतर चलने लगी थी। बादलों की तरह मन में कई सारे रंग भर गए थे लेकिन सब अच्छे लग रहे थे। रह-रह कर एक मीठा-सा अहसास बरस जाता और मेरे अन्तर को तर कर जाता।
अगर ये धोखा भी है तो क्या बुरा है? अखिल ब्रह्मांड में समुद्र के किनारे की रेत के एक कण जितनी हैसियत वाली अपनी पृथ्वी में असंख्य जीवित होते, मरते जीवों के बीच मेरी क्या औकात है? अपने आधे-अधूरे शरीर के साथ अनजानी परिस्थितियों की फिसलपट्टी पर फिसलते हुए, काल्पनिक रिश्तों के बीच सूखे पत्तों की तरह झड़ते जिंदगी के दिनों के बीच अगर कोई चीज मुझे इतना सूकून दे सकती है तो उसका धोखा होना भी कोई बुरा सौदा नहीं है। कम-से-कम जितने दिनों तक यह चल रहा है उतने दिन तक तो इससे रिसता हुआ रस मेरी अनन्त प्यास को बुझाता रहेगा। और स्थायी तो कुछ भी नहीं है!! जहां धोखा नहीं है वहां भी क्या स्थायित्व है? स्थायित्व की तलाश मानवता का सबसे बड़ा रोग है, जो हमे ठीक से जीने ही नहीं देती। हम चीजों को महसूस करने की बजाय उनके अस्थायित्व के भय से ग्रस्त होकर उनका अहसास ही नहीं कर पाते। या कई बार इसके विपरीत यह भूल कर कि हर चीज अस्थायी है उनको बिना छुए, बिना उल्टे-पल्टे उन्हें छोड़ देते हैं और इस बात का अहसास तब होता है जब उनके खत्म होने का वक्त आ जाता है।
‘‘चुप क्यों हो गए? मेरी बात से नाराज हो?’’
‘‘नहीं .... नहीं!! तुम्हारी बात से नाराज नहीं हतप्रभ हूं!! समझ नहीं आ रहा क्या कहूं’’, मैंने अपनी बात खुल कर कह दी।
‘‘मैं तुमसे मिलना चाहती हूँ!! तुम बताओ कब आऊं?’’
‘‘मिलने????’’ मेरा गला सूख गया।
‘‘क्यों? तुम नहीं चाहते मैं मिलने आऊं?’’
‘‘नहीं! नहीं!! मैं चाहता हूं तुम मिलने आओ ..... बल्कि मेरे पास से जाओ ही नहीं ... लेकिन थोड़ा मैनेज करना होगा ... घरवालों का रिएक्शन पता नहीं कैसा होगा?’’
‘‘तुम बच्चे नहीं हो!! अपनी जिंदगी के तीन दशक गुजार चुके हो, क्या तुम अपने फैसले भी नहीं ले सकते?’’, अचानक काया के स्वर मे आयी तल्खी मुझे महसूस होने लगी।
‘‘बात बच्चे होने की नहीं है, हममें कौन अपने ढंग से जीवन जी सकता है? चाहे पांव कब्र में लटके हों फिर भी हरेक को सोचना पड़ता है कि मैं ऐसा करूंगा तो क्या प्रतिक्रिया होगी, मैं वैसा करूंगा तो मेरे परिवार के लोग, मेरा पास-पड़ौस सब क्या कहेंगे।’’
‘‘पागलपन है ये! पागलपन! जहां सही-गलत का फैसला सही-गलत के हिसाब से नहीं लोगों के रिएक्शन के हिसाब से होता हो वो जगह एक बहुत बड़ा पागलखाना है जहां पागलों के कैद करने के लिए सलाखें और बेड़ियां भी नहीं है। अपनी आजादी के लिए सब कुछ दांव पर लगाना पड़ता है, हम जो हैं वही होने के लिए बहुत बड़ा खतरा उठाना पड़ता है। माना कि हम सब फांसी की सजा पाए मुजरिम हैं जिन्हें एक न दिन मौत को गले लगाना ही है लेकिन फांसी पर चढ़ने से पहले कैद में रहने के लिए हम क्यों अभिशप्त हैं? क्यों हम इस जेल में जिंदगी गुजारना चाहते हैं? माना कि जेल में रोटी की गारंटी है, शायद सुरक्षा भी बाहर से अधिक हो लेकिन ये जिंदगी नहीं है। असुरक्षा के डर से जिंदगी को बोनसाई बना लेना पाप है, गमलों में बरगद नहीं फलते-फूलते! पिंजड़े में जो कुछ हमें मिल रहा है उसे खोने के डर से पंख भी नहीं फड़फड़ाना! क्या इसे तुम जिंदगी कहते हो!’’ उसके स्वर आवेश से कांपने लगा।
‘‘हे भगवान!! इतनी भारी-भरकम बाते तुम्हें किसने बतायीं?’’
‘‘जिंदगी ने बतायीं! क्योंकि मैं जिंदगी से सीधे बात करती हूं, किसी को बीच में नहीं आने देती। जिंदगी जितनी लिजलिजी हो उतनी आसान होती है, जहाजों को किनारे पर खड़ा कर दो, कोई खतरा नहीं, कोई समस्या नहीं। लेकिन जहाज की जिंदगी किनारों पर नहीं होती, अगर वो किनारों पर खड़ा हो जाए तो समझ लो वो मर चुका है बस अपनी मृत्यु की घोषणा का इंतजार कर रहा है। मेरे लिए कितना आसान होता अगर मैं भी अपने को एक लड़का मान कर जिंदगी जीने को तैयार हो जाती? मेरा परिवार मेरे साथ होता, मेरा समाज मेरे साथ होता, कोई मजबूर लड़की परम्पराओं के नाम पर मेरे साथ जिंदगी काट लेती, सब कुछ आसान होता और फिर एक दिन मैं एक सामान्य आदमी की तरह मर जाती और सब खत्म हो जाता। लेकिन उस जिंदगी में मौत आने से पहले हर दिन मैं अपने आप को कितनी बार मारती यह मैं ही जानती हूं। मेरी हंसी भी मेरे तड़पते वजूद की भाप की तरह होती, मेरी पूरी जिंदगी मेरी नहीं किसी और की होती। क्या कोई अपनी सुविधाओं और सुरक्षा के लालच के कारण पूरी जिंदगी किसी ऐसे व्यक्ति के साथ गुजार सकता है जो उसे बिलकुल भी पसंद नहीं है?’’
‘‘ओ. के.!! तुमने तो मेरी बोलती बंद कर दी!! मैं आज शाम तक तुमको काॅल करता हूं और फिर बताता हूं कि हम कब मिलते हैं!’’
‘‘ठीक है! मैं तुम्हारे फोन का वेट करूंगी!’’ उसने फोन काट दिया। मैंने रिसीवर रख दिया और एक गहरी सांस ली। ये किस बवंडर से मेरा पाला पड़ा है? इसके सामने तो कुछ भी टिकना मुश्किल है!! उसी समय अचानक मम्मी कमरे में आ गयीं। मैं घबरा गया, जैसे कोई चोरी कर रहा हूं, मुझे लगा कहीं मेरे चेहरे कुछ ऐसे भाव तो नहीं हैं जो मेरी चुगली कर दें। मैंने कोशिश करने लगा कि मेरे चेहरे के भाव बदल जाएं। मम्मी के चेहरे पर सुबह वाला सूखापन नहीं था। पहले जैसी आत्मीयता वहां दोबारा आ चुकी थी। शायद उन्हें लग रहा होगा कि मामला ठंडा पड़ चुका है अब उसके बारे में परेशान होने की जरूरत नहीं है।
‘‘बेटा आज शाम को मुझे और तुम्हारे पापा को शादी में जाना है!’’
‘‘किसकी?’’ मैंने भी ऐसे बात की जैसे कुछ हुआ ही न हो।
‘‘आशा स्टोर वालों की लड़की की। तुम अकेले रह लोगे या पड़ौस में बोल जाऊं’’
‘‘प्लीज मम्मी!! आप किसी से नहीं बोलना मुझे नहीं अच्छा लगता किसी का यहां रहना। कोई प्राॅब्लम नहीं है मैं अंदर से लाॅक कर लूंगा आप आराम से जाओ! कितने बजे जाना है?’’
‘‘शाम को छः बजे तक निकल जाएंगे!’’
‘‘लौटना कब तक होगा?’’
‘‘कम-से-कम ग्यारह तो बजेंगे ही। तुम्हारे पापा को स्कूटर चलाना आता तो टाइम बच जाता लेकिन रिक्शे-टैम्पो से लौटने में इतना समय तो लग ही जाएगा।’’
‘‘ठीक है! आप आराम से जाओ!’’
‘‘खाना में बना कर यहीं मेज पर रख जाउंगी!’’, मम्मी मुझे देख के मुस्करायीं और कमरे से निकल गयीं। झनझनाते हुए विचार मन में उठने लगे और मैंने फोन उठा कर अपने पास रख लिया।
