Thursday, June 19, 2014

काया नहीं तेरी - 5

उपन्यास अंश -

‘‘काया!!! कैसी हो? फोन क्यों नहीं किया इतने दिन?’’ मैंने फोन को कस के हाथ में पकड़ लिया जैसे उसके गिर जाने का डर हो।

‘‘तुम मेरे फोन का इंतजार कर रहे थे?’’

‘‘तुम्हारे इस वाहियात का सवाल का मतलब?’’ मैं चिढ़ गया।

‘‘कैसे हो?’’

‘‘अअ.....अच्छा हूं!!’’ मेरी चिढ़ लीची के खुरदुरे छिलके की तरह उतर गयी और मेरी असलियत मुलायम गूदे की तरह बाहर आ गयी।

‘‘मैं नहीं जानती की ऐसा क्यों हो रहा है ... मेरी कुछ समझ नहीं आ रहा है ... मैं ढेरों लोगों से मिली हूं ...लेकिन जैसा तुमसे मिल कर लगा वैसा मुझे किसी से मिल कर नहीं लगा .... मैं वाकई में तुमको मिस कर रही हूं ... शायद इसकी वजह यह है कि मैंने तुम्हारी आखों में अपना जो चेहरा देखा वो एक औरत का था ... ऐसा चेहरा मुझे कहीं और देखने को नहीं मिला!!’’

‘‘ ..... ’’, मैं कुछ बोल नहीं पाया। भावनाओं से गीले हो गए शब्द फिसल रहे थे, पकड़ में ही नहीं आ रहे थे। मैं सोचने लगा मेरे मन में काया के लिए जो इतना जबरदस्त आकर्षण उत्पन्न हो गया है वो प्रेम है, सेक्स है या कभी किसी विपरीतलिंगी द्वारा मुझमें दिलचस्पी न लेने का परिणाम है। जो भी है, यह इतना प्रबल था कि इसने मेरे मन को गहरी काली घटाओं की तरह घेर लिया। बेचैनी की सारी धूप गायब हो गयी थी, अनजानी-सी ठंडी हवा भीतर-ही-भीतर चलने लगी थी। बादलों की तरह मन में कई सारे रंग भर गए थे लेकिन सब अच्छे लग रहे थे। रह-रह कर एक मीठा-सा अहसास बरस जाता और मेरे अन्तर को तर कर जाता।

अगर ये धोखा भी है तो क्या बुरा है? अखिल ब्रह्मांड में समुद्र के किनारे की रेत के एक कण जितनी हैसियत वाली अपनी पृथ्वी में असंख्य जीवित होते, मरते जीवों के बीच मेरी क्या औकात है? अपने आधे-अधूरे शरीर के साथ अनजानी परिस्थितियों की फिसलपट्टी पर फिसलते हुए, काल्पनिक रिश्तों के बीच सूखे पत्तों की तरह झड़ते जिंदगी के दिनों के बीच अगर कोई चीज मुझे इतना सूकून दे सकती है तो उसका धोखा होना भी कोई बुरा सौदा नहीं है। कम-से-कम जितने दिनों तक यह चल रहा है उतने दिन तक तो इससे रिसता हुआ रस मेरी अनन्त प्यास को बुझाता रहेगा। और स्थायी तो कुछ भी नहीं है!! जहां धोखा नहीं है वहां भी क्या स्थायित्व है? स्थायित्व की तलाश मानवता का सबसे बड़ा रोग है, जो हमे ठीक से जीने ही नहीं देती। हम चीजों को महसूस करने की बजाय उनके अस्थायित्व के भय से ग्रस्त होकर उनका अहसास ही नहीं कर पाते। या कई बार इसके विपरीत यह भूल कर कि हर चीज अस्थायी है उनको बिना छुए, बिना उल्टे-पल्टे उन्हें छोड़ देते हैं और इस बात का अहसास तब होता है जब उनके खत्म होने का वक्त आ जाता है।

‘‘चुप क्यों हो गए? मेरी बात से नाराज हो?’’

‘‘नहीं .... नहीं!! तुम्हारी बात से नाराज नहीं हतप्रभ हूं!! समझ नहीं आ रहा क्या कहूं’’, मैंने अपनी बात खुल कर कह दी।

‘‘मैं तुमसे मिलना चाहती हूँ!! तुम बताओ कब आऊं?’’

‘‘मिलने????’’ मेरा गला सूख गया।

‘‘क्यों? तुम नहीं चाहते मैं मिलने आऊं?’’

‘‘नहीं! नहीं!! मैं चाहता हूं तुम मिलने आओ ..... बल्कि मेरे पास से जाओ ही नहीं ... लेकिन थोड़ा मैनेज करना होगा ... घरवालों का रिएक्शन पता नहीं कैसा होगा?’’

‘‘तुम बच्चे नहीं हो!! अपनी जिंदगी के तीन दशक गुजार चुके हो, क्या तुम अपने फैसले भी नहीं ले सकते?’’, अचानक काया के स्वर मे आयी तल्खी मुझे महसूस होने लगी।

‘‘बात बच्चे होने की नहीं है, हममें कौन अपने ढंग से जीवन जी सकता है? चाहे पांव कब्र में लटके हों फिर भी हरेक को सोचना पड़ता है कि मैं ऐसा करूंगा तो क्या प्रतिक्रिया होगी, मैं वैसा करूंगा तो मेरे परिवार के लोग, मेरा पास-पड़ौस सब क्या कहेंगे।’’

‘‘पागलपन है ये! पागलपन! जहां सही-गलत का फैसला सही-गलत के हिसाब से नहीं लोगों के रिएक्शन के हिसाब से होता हो वो जगह एक बहुत बड़ा पागलखाना है जहां पागलों के कैद करने के लिए सलाखें और बेड़ियां भी नहीं है। अपनी आजादी के लिए सब कुछ दांव पर लगाना पड़ता है, हम जो हैं वही होने के लिए बहुत बड़ा खतरा उठाना पड़ता है। माना कि हम सब फांसी की सजा पाए मुजरिम हैं जिन्हें एक न दिन मौत को गले लगाना ही है लेकिन फांसी पर चढ़ने से पहले कैद में रहने के लिए हम क्यों अभिशप्त हैं? क्यों हम इस जेल में जिंदगी गुजारना चाहते हैं? माना कि जेल में रोटी की गारंटी है, शायद सुरक्षा भी बाहर से अधिक हो लेकिन ये जिंदगी नहीं है। असुरक्षा के डर से जिंदगी को बोनसाई बना लेना पाप है, गमलों में बरगद नहीं फलते-फूलते! पिंजड़े में जो कुछ हमें मिल रहा है उसे खोने के डर से पंख भी नहीं फड़फड़ाना! क्या इसे तुम जिंदगी कहते हो!’’ उसके स्वर आवेश से कांपने लगा।

‘‘हे भगवान!! इतनी भारी-भरकम बाते तुम्हें किसने बतायीं?’’

‘‘जिंदगी ने बतायीं! क्योंकि मैं जिंदगी से सीधे बात करती हूं, किसी को बीच में नहीं आने देती। जिंदगी जितनी लिजलिजी हो उतनी आसान होती है, जहाजों को किनारे पर खड़ा कर दो, कोई खतरा नहीं, कोई समस्या नहीं। लेकिन जहाज की जिंदगी किनारों पर नहीं होती, अगर वो किनारों पर खड़ा हो जाए तो समझ लो वो मर चुका है बस अपनी मृत्यु की घोषणा का इंतजार कर रहा है। मेरे लिए कितना आसान होता अगर मैं भी अपने को एक लड़का मान कर जिंदगी जीने को तैयार हो जाती? मेरा परिवार मेरे साथ होता, मेरा समाज मेरे साथ होता, कोई मजबूर लड़की परम्पराओं के नाम पर मेरे साथ जिंदगी काट लेती, सब कुछ आसान होता और फिर एक दिन मैं एक सामान्य आदमी की तरह मर जाती और सब खत्म हो जाता। लेकिन उस जिंदगी में मौत आने से पहले हर दिन मैं अपने आप को कितनी बार मारती यह मैं ही जानती हूं। मेरी हंसी भी मेरे तड़पते वजूद की भाप की तरह होती, मेरी पूरी जिंदगी मेरी नहीं किसी और की होती। क्या कोई अपनी सुविधाओं और सुरक्षा के लालच के कारण पूरी जिंदगी किसी ऐसे व्यक्ति के साथ गुजार सकता है जो उसे बिलकुल भी पसंद नहीं है?’’

‘‘ओ. के.!! तुमने तो मेरी बोलती बंद कर दी!! मैं आज शाम तक तुमको काॅल करता हूं और फिर बताता हूं कि हम कब मिलते हैं!’’

‘‘ठीक है! मैं तुम्हारे फोन का वेट करूंगी!’’ उसने फोन काट दिया। मैंने रिसीवर रख दिया और एक गहरी सांस ली। ये किस बवंडर से मेरा पाला पड़ा है? इसके सामने तो कुछ भी टिकना मुश्किल है!! उसी समय अचानक मम्मी कमरे में आ गयीं। मैं घबरा गया, जैसे कोई चोरी कर रहा हूं, मुझे लगा कहीं मेरे चेहरे कुछ ऐसे भाव तो नहीं हैं जो मेरी चुगली कर दें। मैंने कोशिश करने लगा कि मेरे चेहरे के भाव बदल जाएं। मम्मी के चेहरे पर सुबह वाला सूखापन नहीं था। पहले जैसी आत्मीयता वहां दोबारा आ चुकी थी। शायद उन्हें लग रहा होगा कि मामला ठंडा पड़ चुका है अब उसके बारे में परेशान होने की जरूरत नहीं है।

‘‘बेटा आज शाम को मुझे और तुम्हारे पापा को शादी में जाना है!’’

‘‘किसकी?’’ मैंने भी ऐसे बात की जैसे कुछ हुआ ही न हो।

‘‘आशा स्टोर वालों की लड़की की। तुम अकेले रह लोगे या पड़ौस में बोल जाऊं’’

‘‘प्लीज मम्मी!! आप किसी से नहीं बोलना मुझे नहीं अच्छा लगता किसी का यहां रहना। कोई प्राॅब्लम नहीं है मैं अंदर से लाॅक कर लूंगा आप आराम से जाओ! कितने बजे जाना है?’’

‘‘शाम को छः बजे तक निकल जाएंगे!’’
‘‘लौटना कब तक होगा?’’

‘‘कम-से-कम ग्यारह तो बजेंगे ही। तुम्हारे पापा को स्कूटर चलाना आता तो टाइम बच जाता लेकिन रिक्शे-टैम्पो से लौटने में इतना समय तो लग ही जाएगा।’’

‘‘ठीक है! आप आराम से जाओ!’’

‘‘खाना में बना कर यहीं मेज पर रख जाउंगी!’’, मम्मी मुझे देख के मुस्करायीं और कमरे से निकल गयीं। झनझनाते हुए विचार मन में उठने लगे और मैंने फोन उठा कर अपने पास रख लिया।

Tuesday, June 17, 2014

काया नहीं तेरी - 4


उपन्यास अंश-

इस बिना चांद की चांदनी ने कमरे का माहौल कुछ अजीब सा कर दिया, आवाजें शांत हो गयी थी, लगा जैसे समय कहीं अटक गया है, या थक कर कुछ देर सुस्ता रहा है। मुझे अपनी ही सांसे सुनाई देने लगी, जिंदगी अंदर जा रही थी और मौत बाहर आ रही थी, और जिंदगी और मौत के बीच में भी कहीं अटका था। किसी जंगली खरपतवार के पत्ते से निकली एक अनजानी सी सरसराहट की तरह जिसे किसी ने नहीं सुना। लेकिन मुझे वो सरसराहट बहुत तेजी से सुनाई देने लगी, किसी तूफान की तरह, एक तूफान जिसमें मेरा पूरा अस्तित्व उड़ा जा रहा था। काया का ख्याल मांसल रूप ग्रहण करने लगा, जैसे कोई बादल अचानक ठोस हो जाए या कोई खूशबू मेरे गले में लिपट जाए। काया ने अपने बाल मुझ पर गिरा लिए और उसके होंठ मेरे इतने पास आ गए कि मुझे लगा बस अब उसके होंठ पिघल जाएंगे और मेरे पूरे शरीर पर फैल जाएंगे। उसका हाथ नीचे फिसला और मुझे लगा उसने मेरे सबसे पुराने घाव पर अपना हाथ रख दिया है। उसके हाथ एक जादुई मरहम के तरह थे, जहां छूते प्यास के खुरंट हट जाते और घाव ठीक हो जाते।

किसी मर्द की असलियत पता करनी हो तो उसके दिमाग को तब पढ़ो जब वह किसी के साथ न हो बस अपने शरीर के साथ हो। उस समय वो बिलकुल पारदर्शी होता है और उसके दिमाग की एक-एक पर्त उधड़ जाती है। उसके शरीर का पोर-पोर खुल जाता है और वो तरल में बदल कर बहने लगता है, उसे लपेटे हुए सारी चादरें खुल जाती हैं, चेहरों पर चढ़े हुए सभी चेहरे एक-एक करके बर्फ से बने मुखोटों की तरह इस तरल में बहते जाते हैं, फिर जो बचता है वह सिर्फ एक बहता हुआ यथार्थ होता है।

जब ये तूफान रुका तो मैं हैरान रह गया मेरे हाथों से काया की देह की खुशबू आ रही थी और मेरे होठों पर अब भी उसके चुम्बन के अहसास की कुछ बूंदे टिकी हुई थीं। मुझे पहले कभी ऐसा अनुभव नहीं हुआ था। अनगिनत बार मैंने अपने शरीर के साथ प्रयोग किए थे, सूखी गर्म रेत पर मछली की तरह छटपटाते अपने अहसासों को राहत देने के लिए मैंने कई बार उन्हें मृगतृष्णा के पानी से निहलाया है लेकिन आज जैसा अनुभव पहले कभी नहीं हुआ था। मुझे अपने वजूद का पता ही नहीं चल रहा था ऐसा लगा कि मैं काया में समा कर काया ही हो गया था। अब काया के बगैर तो अपना समय काट रहा था लेकिन काया के ख्याल के बगैर रहना अब असंभव था।

सुबह हुई तो सब कुछ अलग सा था। काया के फोन का इंतजार था लेकिन उसका फोन न आने की कोई बेचैनी नहीं थी। गमलों में लगे पौधों के पत्ते कुछ ज्यादा हरे और जीवन्त लग रहे थे और उन पर पड़ती चमकती सुनहरी धूप कुछ ज्यादा ही खिल रही थी। रोज सुबह मेरे पास आने वाली मम्मी अब भी मेरे पास नहीं आयीं। लेकिन पता नहीं क्यों मुझे उसका अफसोस नहीं हुआ और मैं लगभग गुनगुनाता हुआ दैनिक कर्म निबटाने के लिए बाथरूम की ओर चल दिया। आज हर चीज कुछ ज्यादा ही शिद्दत से महसूस हो रही थी। शरीर पर पड़ता ठंडा पानी, साबुन की खुशबू और बाल्टी में गिरती पानी की धार की आवाज, अपने ही शरीर पर फिसलते मेरे अपने हाथ!!

नहा कर आया तो मम्मी नाश्ता रख कर जा चुकी थी। कोई और वक्त होता तो मैं नाश्ते को उठाकर फेंक देता लेकिन उस समय मुझे बिलकुल भी बुरा नहीं लगा और मैंने चुपचाप सैंडविच और काॅफी इत्मीनान से खा-पी लिए और फिर बिस्तर पर मसनद की टेक लगा कर बैठ गया। शायद कभी अकबर या अशोक ऐसे ही बैठते होंगे ... लेकिन मैं उनकी तरह हिंसा तो नहीं फैला रहा हूं!!

खिड़की से दिख रहा आसमान का टुकड़ा खूब चमक रहा था। बारिश के बाद जब बादलों के फटने पर जो साफ-सुथरी धूप खिलती है तो उसकी चमक आंखों को चैंधिया देती है। तितलियां तो अब नहीं दिखती लेकिन कुछ पंतगे खिड़की के आस-पास मंडरा रहे थे। उसी समय फोन की घंटी बजी, मैंने फोन उठाया और कुछ पलों के सन्नाटे के बाद काया की आवाज सुनायी दी ‘‘हैलो!’’

Sunday, June 15, 2014

काया नहीं तेरी - 3

उपन्यास अंश -

‘‘सही कर रही हैं आप’’, अब मैं उसे क्या बताता कि सिर्फ व्हील चेयर होने से कोई घूमने नहीं जा सकता उसके लिए अच्छे भले ताकतवर कम-से-कम दो इंसान चाहिएं।

लगभग छह-सात दिन काम चला था और मैं इस एक सप्ताह में उसके बहुत नजदीक आ गया। किसी इंसान के नजदीक जाना वैसे ही होता है जैस किसी पहाड़ की चोटी से नीचे झांकने के लिए बिलकुल किनारे तक सरक आना। इसमें डर तो लगता है लेकिन जो नजारा दिखता है वो पीछे से कभी नहीं देखा जा सकता है। इस एक सप्ताह में काया के भीतर की कई पर्तें मेरे सामने खुली। वो अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी। उसने बताया कि जब 6-7 साल की उम्र में पहली बार उसने अपने चचेरी बहन के कपड़े पहन लिए और उन्हें उतारने को तैयार नहीं हुआ तो किस तरह से उसकी बुरी तरह पिटाई हुई थी। उस दिन से शुरू हुआ अपमान और हिंसा का व्यवहार आज तक चालू है, भले ही कम हो गया है लेकिन खत्म नहीं हुआ।

‘‘मैं नहीं जानती ये क्या है! लेकिन मैं एक अनन्त बेचैनी का शिकार हूं, मैं ये नहीं हूं जो मै दिख रही हूं। जितना मैं लड़की बनती हूं उतनी ही मुझे राहत मिलती है, ये चूड़ियां, ये बिन्दी, ये मेकअप, ये सलवार-सूट, अकेले मैं तो मैं साड़ी भी पहनती हूं, सब मेरे अंदर बने हुए कभी ठीक न होने वाले जलन भरे हुए घाव पर ठंडे मरहम की तरह काम करते हैं। मैं नहीं जानती इसका क्या कारण है लेकिन मुझे अपने शरीर का रोम-रोम एक औरत की तरह महसूस होता है, एक औरत जो प्यार पाना चाहती है, प्यार करना चाहती है, खुश रहना चाहती है, खुशी देना चाहती है ...’’ ये शब्द उसने उस दिन कहे थे जब काम खत्म हो गया था। और वो सब हिसाब-किताब कर चुकी थी। सब लोग बाहर थे जब उसने ये बातें मुझसे कहीं हम दोनों कमरे में अकेले थे। अपनी बात खत्म करके उसने मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर कस के थाम लिया। पहली बार किसी स्पर्श में मुझे इतनी मजबूती और कोमलता का एक साथ अहसास हो रहा था। मुझे लगा ताजा खून मेरे हर अंग में दौड़ गया और मुझे अपने कमजोर पैरों तक में सनसनाहट का अहसास होने लगा। किसी की मुझमें दिलचस्पी है, वो भी उसकी जिसका आकर्षण सोते-जागते मुझे गुदगुदाता रहता है।

उसी समय पापा अंदर आए और काया को मेरा हाथ पकड़े हुए देख लिया। उनको देखते ही काया ने झटके से मेरा हाथ छोड़ दिया लेकिन पापा के चेहरे के पहले कुछ आश्चर्य और फिर उसके बाद आए तेज गुस्से के भाव ने जता दिया कि उन्होंने सब देख लिया है। काया तेजी से बाहर चली गयी, पापा कुछ देर किंकर्तव्यविमूढ़ से वहां खड़े रहे फिर तेज कदमों से बाहर चले गए। उसके बाद उस दिन मेरी किसी से कोई बात नहीं हुई, एक ठोस खामोशी चारों तरफ तनी रही। रात को मम्मी खाना बिना एक भी शब्द बोले मेरे पास रख गयीं और खा लेने के बाद खाली बर्तन उठा कर ले गयी। सब ऐसा व्यवहार कर रहे थे जैसे किसी का एक्सीडेंट हो गया हो या कोई मर गया हो।

अगले दिन सुबह में उठा तो देखा पापा बाहर क्यारी और गमलों में पानी दे रहे थे। बोगनविलिया, सदाबहार, मोरपंखी के पत्ते, तने और फूल सब पानी से धुल कर चमक रहे थे, उन पर धूप के कुछ बेतरतीब टूकड़े बिखरे हुए थे। निगाह ऊपर उठायी तो देखा बंदरों के कुछ बच्चे सामने की छत पर तने तारों पर धमाचैकड़ी कर रहे थे। इतनी देर में मम्मी चाय का गिलास लेकर कमरे में आ गयीं, मुझे पकड़ाया और मेरे पास कुर्सी खींच कर बैठ गयीं। कुछ देर तक शांत रह कर उन्होंने अपने शब्दों को जमा किया और यथासंभव संयत स्वर में बोलना चालू किया, ‘‘बेटा, तुम समझदार हो, इतना पढ़ते-लिखते हो, अच्छी खासी उम्र पार कर चुके हो फिर ऐसी हरकत की तुमसे कैसे हो गयी?’’

‘‘कौनसी हरकत?’’, मैंने जानबूझ कर अनजान बनते हुए कहा।

‘‘तुम जानते हो बेटा, मैं क्या कह रही हूं! अनजान बनने की कोशिश मत करो। काया या जो भी उसका नाम है, यहां काम करने आया था और इससे ज्यादा कुछ नहीं। तुम नहीं जानते क्या इस तरह के लोग कैसे होते हैं?’’

‘‘कैसे होते हैं मम्मी? क्या फर्क होता है उनमे? क्या उनके शरीर में दिल से खून पम्प नहीं होता?’’

‘‘हे भगवान! तुम कैसी पागलपन की बातें कर रहे हो? मैंने सिर्फ सुना था कि ऐसे लोग बड़ी आसानी से लोगों को फंसा लेते हैं, लेकिन तुमको? मुझे भरोसा नहीं हो रहा????’’

‘‘कोई किसी को नहीं फंसा रहा मम्मी, उसे मुझे फंसा कर क्या मिलेगा?’’

‘‘ऐसा तुम समझते हो, क्योंकि तुम्हें लगता है दुनिया बस तुम्हारे पलंग के पैताने और सिरहाने के बीच खत्म हो जाती है। लेकिन हकीकत ये है कि दुनिया कमीनेपन और धूर्तता से भरी है जिसे तुम जैसे दिमागी रूप से बच्चे नहीं समझ सकते। अगर ये किताबे पढ़ कर अकल आती होती तो बड़ी-बड़ी लाइबे्ररियों में अक्ल फर्श पर बहती रहती। मैं समझती गयी हूं कि तुमसे बात करना बेकार है, तुम्हारी हालत तो ऐसी है कि किसी ने प्यार के दो बोल बोले और तुम उस पर निहाल हो जाआगे। जब परिणाम भुगतने का समय आएगा तो सिर्फ तुम नहीं रोओगे साथ में हमें भी रोना होगा। इसलिए अब हमें खुद देखना होगा कि हम क्या करें। तुम बस इतनी कृपा करो कि काया का फोन आए तो मत उठाना!’’, मां ने झटके से कुर्सी पीछे की और खाली गिलास उठा कर कमरे से बाहर निकल गयी।

मम्मी की बात से मुझे उम्मीद हो गयी कि काया फोन कर सकती है। मैंने फोन को पास सरका कर रख लिया और इंतजार करने लगा शायद उसका फोन आ जाए। उसके बाद हमारे बीच खामोशी और सघन हो गयी। दिन भर मेरी किसी से बात नहीं हुई। मैंने दोस्तोव्योस्की की ‘बोड़म’ उठा कर पढ़ने की कोशिश की लेकिन मन नहीं किया, कीट्स और बायरन की कविताओं में दिमाग लगाने की कोशिश की लेकिन वो भी बेकार रहा। आखिरकार मैंने किताबों को समेट दिया और राइटिंग बोर्ड उठा कर कुछ लिखने की चेष्टा की लेकिन काफी देर तक पेन हाथ में घुमाने के बाद भी जब कुछ नहीं लिख पाया तो राइटिंग बोर्ड भी उठा कर रख दिया। और मसनद पर सर टिका का छत को घूरने लगा।

काया का ख्याल लगातार मेरे दिमाग में था। हो सकता है सच में वो मुझे बेवकूफ बना रही हो। लेकिन उससे क्या फर्क पड़ता है? इस बहाने कुछ समय उसके साथ रहता हूं, उसके साथ की आत्मीयता को सिप ले-ले कर तसल्ली से पीता हूं, उसे अपनी सुनाता हूं, उसकी सुनता हूं, उसके स्पर्श को ठंड से जकड़े हाथों पर पड़ती गुनगनी धूप की तरह और धूप से जलती पीठ पर बर्फ के टुकड़े की तरह महसूस करता हूं। लेकिन वो काॅल तो करे!!

कई काॅल आए, टेलीफोन के बकाया बिल के बारे में, इन्श्योरेंस करवाने के लिए, यहां तक कि रांग नंबर भी आया लेकिन काया का फोन नहीं आया। मेरी किसी से कोई बातचीत नहीं हुई। मैं पूरे दिन कमरे में अकेला रहा, कभी छत को ताकता तो कभी किसी दीवारों पर ख्यालों की तरह रैंगती छिपकलियों को देखता रहा। मम्मी-पापा कोई भी मेरे कमरे में नहीं आया, बस मम्मी चुपचाप खाना रख गयीं। ढीला-सा उदास दिन सीलन भरी दीवार की पर्त की तरह उखड़ कर गिर गया। रात के खाने के बाद लेट गया। लाइट बंद कर ली। लाइट बंद करते ही बाहर आसमान अचानक चमक से उठा जैसे इंतजार कर रहा हो कि कब मैं लाइट बंद करूं और अपनी लाइट जलाए। चांद तो कहीं नहीं दिख रहा था लेकिन चांदनी चारों तरह फैली हुई थी और ढेर सारी चांदनी खिड़की से बह-बह कर अंदर आने लगी और फर्श पर बिखर गयी। 

Monday, June 2, 2014

काया नहीं तेरी - 2

उपन्यास अंश -

सैंकड़ो साल पहले कबीर को कैसे पता चल गया कि काया मेरी नहीं है? और मैंने कबीर से पूछा कब कि बताइए काया मेरी है या नहीं जो उन्होने मुझे जवाब दे दिया कि काया नहीं तेरी? और काया मेरी क्यों नहीं? सिर्फ इसलिए कि कोई नहीं चाहता कि काया मेरी हो?

हद है काया अगर मेरी हो तो किसी को क्या तकलीफ है? अरे मेरा उनसे लेना नहीे, देना नहीं, मैं अपनी जिंदगी जैसी भी है खुद जी रहा हूं, उनकी जिंदगी जैसी है वो जी रहे हैं, मैं कोई उनसे जिंदगी एक्सचेंज करने को तो कह नहीं रहा। क्या मैं किसी के मुंह का निवाला छीन रहा हूं? किसी के जीने में बाधा डाल रहा हूं, किसी तरह से तंग कर रहा हूं? उनकी दीवार पर जाके मूत रहा हूं? आखिर परेशानी क्या है? उनका मुझसे कोई सरोकार नहीं है, उनको मेरी परेशानियों से कुछ मतलब नहीं है लेकिन अगर मेरी खुशी का कहीं से कोई कारण बनता है तो उनके माथे पर बल पड़ जाते हैं। विकलांग होकर इस तरह जीना चाहता है? हंसना चाहता है, खेलना चाहता है, पढ़ना चाहता है, प्रेम करना चाहता है? अरे हम अपने बीच सांसे लेने दे रहे हैं, और तू उंगली पकड़ कर पहुंचा पकड़ना चाहता है? अरे जिंदा है ये क्या कम है कि जो अपने शरीर के हर अंग को महसूस करना चाहता है? विकलांग बस जिंदा रहें यही बहुत है, खाने को मिल रहा है, शरीर ढकने का मिल रहा है, सर ढकने को छत है, ढेर सारी दया मिल रही है ... यही औकात से बढ़ कर है, प्रेम, सेक्स, मित्रता, सम्बन्ध, भावनाएं जैसी विलासताओं के बारे में सोचना भी महापाप है। धर्म ग्रन्थ पढ़ो, अपने पूर्व जन्म के किए पापों के लिए भगवान के सामने गिड़गिड़ाओ कि अगले जन्म में तुम्हारे पापों का दण्ड नहीं मिले और तुम सामान्य शरीर के साथ जन्म ले सको।

चलो दूसरों का तो समझ आया लेकिन मेरे अपने घरवाले? मेरे माता-पिता जो मेरा मुंह देख कर जीते हैं, सुबह से शाम तक सिर्फ मेरे बारे में ही सोचते हैं, अपनी मौत से ज्यादा इस बात से घबराते हैं कि उनके मरने के बाद मेरा ख्याल कौन रखेगा, उनको काया से क्या तकलीफ है? उनको मालूम है काया के पास होते ही मेरा पूरा वजूद थिरकने लगता है, मैं अपनी देह के बंधन से मुक्त होकर अनंत की सैर करने लगता हूं, कभी बर्फ से ढकी चोटियों पर फिसलने लगता हूं तो कभी घास के बड़े-बड़े मैदानों में लोट लगाने लगता हूं, कभी समुद्र की मदहोश लहरों पर तैरने लगता हूं तो कभी ठंडी रेत के टीलों में धंसने लगता हूं, कभी पखेरू की तरह किसी ऊंचे पेड़ पर जा बैठता हूं तो कभी फूलों की घाटी में उतर कर खुद भी एक फूल बन कर एक नाजुक-सी डाली पर उग आता हूं।

फिर भी उन्होंने अपनी पूरी ताकत इस बात के लिए झोंक रखी है कि मैं किसी भी तरह काया से नहीं मिल पाऊं। काया को अपमानित करने, मुझे कोसने से लेकर जादू-टोना तक करवाने के हर तरह के उपाय उन्होंने आजमा लिए हैं। काया की रीढ़ गली हुई नहीं है, उसने मुझसे मिलना छोड़ दिया है। मैं जानता हूं भले वो और किसी से भी प्यार करती होगी लेकिन जब कभी वो अकेली होती होगी तो एक आंसू तो मेरे नाम का बनता है यार! माना कि मैं विकलांग हूं लेकिन क्या दिल, भावनाएं, सोच, विचार भी विकलांग होते हैं? ये सब सीमित हो सकते हैं लेकिन विकलांग नहीं। हो सकता है मुझे सामान्य लोगों की तरह रिश्ते बनाने का हक नहीं है लेकिन अपने को सुलगाने, भीतर-ही-भीतर अपने को सेकने का हक तो मुझे भी है। शायद मेरे भीतर का यह दर्द ही रिस कर मेरी हड्डियों में आ गया है।

सोचने की जरूरत नहीं, बिना सोचे बता सकता हूं कि पहली बार काया से कब मिला था। बाथरूम के टूटे हुए फर्श की मरम्मत के लिए आयी थी। उसका नाम कई बार सुना था लेकिन कभी किसी ने उसे देखा नहीं था। किसी को उम्मीद नहीं थी कि वो हमारे घर आएगी, जिससे टाइल खरीदी थीं उसी से किसी बढि़या फर्श बनाने वाले को भेजने की कही थी और उसने काया को भेज दिया। उसे देखते ही सब सन्न रह गए। ये तो कोई नहीं कह सका आप वापिस चले जाओ लेकिन सब को धक्का सा लग गया और सब यही सोचने लगे कि किसी तरह जल्दी से काम खत्म हो और वो यहां से टले।

जैसे ही पहली बार हमारी नजरें एक-दूसरे से टकराईं उसने एक बड़ी गहरी मुस्कान के साथ मेरी ओर देखा। मैं व्हील चेयर पर था इसलिए काफी कमफर्टेबल था क्योंकि अगर व्हील चेयर पर न होउं तो सामने वाले पता नहीं चल पाता कि मैं विकलांग हूं और फिर उसके सामने चलने फिरने में दिक्कत होती है। लेकिन व्हील चेयर पर होने पर देखते ही पता चल जाता है कि मेरे साथ कुछ समस्या है और फिर कुछ छुपाने जैसा नहीं रहता।

उसकी गहरी मुस्कान एक नर्म, मासूम नश्तर की तरह मेरे भीतर उतर गयी। शायद आज से पहले कोई मुझे देखकर इस तरह मुस्कराया ही नहीं। मैं देर तक उसे देखता रहा। अद्भुत थी वो, अनूठी ... न जाने औरत थी या मर्द!! एक पुरुष की देह में कैद एक औरत की आत्मा्! आधी-अधूरी नहीं बल्कि एक भरपूर औरत, जो अपने औरतपने के हर क्षण को पूरी तरह जीना चाहती थी, बिना किसी शर्म या हीन भावना के। उसकी सोच ने उसके शरीर पर भी अपनी छाप छोड़ दी थी, उसके पूरे व्यक्तित्व में एक ऐसी कमनीयता, नारीत्व का ऐसा गहरा अहसास था जो मुझे कई बार पूरी औरतों में नहीं दिखता।

हाथों में चूडि़यां, कानों में बुंदे और बलखाती लटें, वाकई वो बला की खूबसूरत थी, कम-से-कम मुझे तो लगती ही थी। तराशी हुई तीखी नाक के नीचे पतले होठों पर लगी हुई लाल लिपिस्टिक और डिजायनर चूड़ीदार और सलवार। चाल में एक नाजुक लचक और बोलने में अद्भुत मिठास। इस बात को कहने में मुझे कोई हिचक नहीं है कि उसे देखते ही मुझ पर जो असर हुआ वो अब तक किसी को देख कर नहीं हुआ। जैसे किसी क्यारी में बहुत दिन से किसी ने पानी न डाला हो, मिट्टी चटक गयी हो, खरपतवार भी जल कर मर गयी हो, कैंचुए भी या तो मर गए हों या भाग गए हों, और फिर अचानक उसमें कोई ठंडा पानी उगलता हुआ पाइप लगा दे।

मैंने उसके बारे में पहले सुन रखा था लेकिन जो कुछ मैं जानता था उसका उसकी वास्तविकता से कोई नाता नहीं था। वह क्या है, कौन है यह मैंने उससे मिल कर ही जाना। कभी भी किसी इंसान को उन बातों से नहीं जाना जा सकता जो उसके बारे में होती हैं, और काया को तो बिलकुल ही जाना जा सकता। हमारी शुरूआती बातें जब चालू हुईं जब पत्थर लगाने वाले मजदूरों, मिस्त्रियों की निगरानी खड़े-खड़े करते हुए उसकी टांगे दुख जाती और कुछ पल सुस्ताने के लिए वो पानी का गिलास लेकर मेरी चारपाई के किनारे पर बैठ जाती थी।

‘‘किताबें आपके सिरहाने रखी रहती हैं!! मतलब आपको पढ़ने का शौक है? मुझे भी किताबें अच्छी लगती हैं लेकिन मैंने ज्यादा कुछ पढ़ा नहीं है।’’, वह अपनी उसी आत्मीय मुस्कान के साथ बात करती थी।

‘‘हां, मुझे किताबों से बहुत प्रेम है, पढ़ भी नहीं रहा हूं तो सिर्फ उनके पास होने से ही मुझे अच्छा लगता है। आपको पता है किताबों से खुशबू आती है, पन्नों की भी और शब्दों की भी!!’’, मैं तो बोलने के लिए तैयार ही बैठा था। किताबों के बारे में बात करने वाला मुश्किल से ही मिलता है।

‘‘आप बाहर क्यों नहीं आते-जाते? आपका मन बहलेगा और लोगों मिलना-जुलना भी होगा? पहले मुझे भी किसी से मिलना अच्छा नहीं लगता था, महीनों कमरा बंद करके बैठे रहती थी। लेकिन फिर मुझे लगा कि भले ही और लोग मुझे देख कर दरवाजे बंद कर रहे हों लेकिन कम-से-कम मुझे तो अपने दरवाजे खोल कर रखने चाहिए।’’