Tuesday, June 17, 2014

काया नहीं तेरी - 4


उपन्यास अंश-

इस बिना चांद की चांदनी ने कमरे का माहौल कुछ अजीब सा कर दिया, आवाजें शांत हो गयी थी, लगा जैसे समय कहीं अटक गया है, या थक कर कुछ देर सुस्ता रहा है। मुझे अपनी ही सांसे सुनाई देने लगी, जिंदगी अंदर जा रही थी और मौत बाहर आ रही थी, और जिंदगी और मौत के बीच में भी कहीं अटका था। किसी जंगली खरपतवार के पत्ते से निकली एक अनजानी सी सरसराहट की तरह जिसे किसी ने नहीं सुना। लेकिन मुझे वो सरसराहट बहुत तेजी से सुनाई देने लगी, किसी तूफान की तरह, एक तूफान जिसमें मेरा पूरा अस्तित्व उड़ा जा रहा था। काया का ख्याल मांसल रूप ग्रहण करने लगा, जैसे कोई बादल अचानक ठोस हो जाए या कोई खूशबू मेरे गले में लिपट जाए। काया ने अपने बाल मुझ पर गिरा लिए और उसके होंठ मेरे इतने पास आ गए कि मुझे लगा बस अब उसके होंठ पिघल जाएंगे और मेरे पूरे शरीर पर फैल जाएंगे। उसका हाथ नीचे फिसला और मुझे लगा उसने मेरे सबसे पुराने घाव पर अपना हाथ रख दिया है। उसके हाथ एक जादुई मरहम के तरह थे, जहां छूते प्यास के खुरंट हट जाते और घाव ठीक हो जाते।

किसी मर्द की असलियत पता करनी हो तो उसके दिमाग को तब पढ़ो जब वह किसी के साथ न हो बस अपने शरीर के साथ हो। उस समय वो बिलकुल पारदर्शी होता है और उसके दिमाग की एक-एक पर्त उधड़ जाती है। उसके शरीर का पोर-पोर खुल जाता है और वो तरल में बदल कर बहने लगता है, उसे लपेटे हुए सारी चादरें खुल जाती हैं, चेहरों पर चढ़े हुए सभी चेहरे एक-एक करके बर्फ से बने मुखोटों की तरह इस तरल में बहते जाते हैं, फिर जो बचता है वह सिर्फ एक बहता हुआ यथार्थ होता है।

जब ये तूफान रुका तो मैं हैरान रह गया मेरे हाथों से काया की देह की खुशबू आ रही थी और मेरे होठों पर अब भी उसके चुम्बन के अहसास की कुछ बूंदे टिकी हुई थीं। मुझे पहले कभी ऐसा अनुभव नहीं हुआ था। अनगिनत बार मैंने अपने शरीर के साथ प्रयोग किए थे, सूखी गर्म रेत पर मछली की तरह छटपटाते अपने अहसासों को राहत देने के लिए मैंने कई बार उन्हें मृगतृष्णा के पानी से निहलाया है लेकिन आज जैसा अनुभव पहले कभी नहीं हुआ था। मुझे अपने वजूद का पता ही नहीं चल रहा था ऐसा लगा कि मैं काया में समा कर काया ही हो गया था। अब काया के बगैर तो अपना समय काट रहा था लेकिन काया के ख्याल के बगैर रहना अब असंभव था।

सुबह हुई तो सब कुछ अलग सा था। काया के फोन का इंतजार था लेकिन उसका फोन न आने की कोई बेचैनी नहीं थी। गमलों में लगे पौधों के पत्ते कुछ ज्यादा हरे और जीवन्त लग रहे थे और उन पर पड़ती चमकती सुनहरी धूप कुछ ज्यादा ही खिल रही थी। रोज सुबह मेरे पास आने वाली मम्मी अब भी मेरे पास नहीं आयीं। लेकिन पता नहीं क्यों मुझे उसका अफसोस नहीं हुआ और मैं लगभग गुनगुनाता हुआ दैनिक कर्म निबटाने के लिए बाथरूम की ओर चल दिया। आज हर चीज कुछ ज्यादा ही शिद्दत से महसूस हो रही थी। शरीर पर पड़ता ठंडा पानी, साबुन की खुशबू और बाल्टी में गिरती पानी की धार की आवाज, अपने ही शरीर पर फिसलते मेरे अपने हाथ!!

नहा कर आया तो मम्मी नाश्ता रख कर जा चुकी थी। कोई और वक्त होता तो मैं नाश्ते को उठाकर फेंक देता लेकिन उस समय मुझे बिलकुल भी बुरा नहीं लगा और मैंने चुपचाप सैंडविच और काॅफी इत्मीनान से खा-पी लिए और फिर बिस्तर पर मसनद की टेक लगा कर बैठ गया। शायद कभी अकबर या अशोक ऐसे ही बैठते होंगे ... लेकिन मैं उनकी तरह हिंसा तो नहीं फैला रहा हूं!!

खिड़की से दिख रहा आसमान का टुकड़ा खूब चमक रहा था। बारिश के बाद जब बादलों के फटने पर जो साफ-सुथरी धूप खिलती है तो उसकी चमक आंखों को चैंधिया देती है। तितलियां तो अब नहीं दिखती लेकिन कुछ पंतगे खिड़की के आस-पास मंडरा रहे थे। उसी समय फोन की घंटी बजी, मैंने फोन उठाया और कुछ पलों के सन्नाटे के बाद काया की आवाज सुनायी दी ‘‘हैलो!’’

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