छल्लों वाली कार विशालकाय गेट के सामने रुकी। ये बिल्डिंग किसी भी तरह से नर्सिंग होम नहीं लगती थी। बेशकीमती शीशों और आयातित टाइलों से सजी ये इमारत पांच सितारा होटलों को मात करती थी। यह शहर का सबसे अत्याधुनिक ट्रोमा सेन्टर था जहां आने के बाद अगर कोई जिंदा नही बचा तो शायद कहीं नहीं बचता।
सूटधारी शोफ़र ने दरवाजा खोला और मंहगे ब्रांडों की सफेद टी-शर्ट, गहरी नीली जीन्स, गहरी हरी आभा वाला धूप का चश्मा और हल्के भूरे रंग की चप्पल पहने लगभग 45-46 साल का एक व्यक्ति बाहर आया। बरगेंडी कलर के बेतरतीब पड़े बालों को ऊपर किया और सधी हुई चाल से गेट के पास आया। गेट पर खड़े हथियारबंद गार्ड ने सलाम ठोका और गेट खोल दिया। पहले लॉन और फिर दोनों तरफ रखे तरह-तरह के फूलों और पौधों से भरे गमलों के बीच संगमरमर के लम्बे कॉरिडोर को पार करके बड़े से हॉल में पहुंचा, सोफों की कतार पर बैठे कुछ मरीजों पर उड़ती-सी निगाह डाली और अपने भव्य केबिन के अंदर चला गया।
डा॰ विनोद देश के सबसे बड़े शल्य चिकित्सकों में से एक हैं। अस्थि रोग विशेषज्ञ हैं, दुर्घटना और आपातकालीन स्थितियों को संभालने में माहिर हैं। न्युरो सर्जन, एनेस्थीसिया, फिजीशियन और प्रशिक्षित सहायकों की एक पूरी टीम उनके साथ काम करती है। कहते है उनके हाथ में पकड़े चाकू से राहत के दरिया बहते हैं, लेकिन समस्या इतनी है कि राहत के इस दरिया में पानी तब ही आता है जब नोटों की झमाझम बारिश हो। कोई आदमी अगर दम तोड़ रहा हो तब भी यहां आने से पहले सौ बार सोचेगा।
उनके बारे में मशहूर है कि काम में तो महारत है लेकिन स्वभाव में जरा गर्मी है। मरीज या उसके किसी घरवाले ने अगर गलती से किसी बात पर सवाल दाग दिया तो उसे बाहर का रास्ता दिखा देते हैं और जब तक वो गिड़गिड़ा कर माफी नहीं मांग लेता मरीज को नहीं देखते भले ही वो तड़पता रहे। कोई बहुत ही वी.आई.पी. मरीज हो तो बात अलग है। पेमेन्ट में देरी हो जाए तो आपरेशन थियेटर में नहीं घुसते भले ही मरीज वहां बेहोश पड़ा रहे। हास्पीटल के कैम्पस में दवाखाना है, अगर सस्ती के चक्कर में कहीं ओर से दवा ले आए या उनकी सुझाई पैथोलौजी लेब के अलावा कहीं ओर टेस्ट करा लिए तो साफ कह देते हैं अब मरीज की कोई जिम्मेदारी नहीं है।
अभी केबिन में घुसे ही थे कि बाहर कुछ शोर सुनाई दिया। डॉक्टर साहब को शोर-शराबा बिलकुल पसंद नहीं है। तमतमा कर बाहर की ओर निकले तो देखा गेट के पास कुछ लोग जमा थे। तेज कदमों से गेट की तरफ चले तो उनका सहायक डा॰ अनुज उनकी तरफ आता हुआ दिखा।
‘‘सर! कोई एक्सीडेंट का केस है!! 12-13 साल की लड़की है, छत से गिर पड़ी है, पास के कस्बे से लाए हैं, यही हॉस्पिटल सबसे पहले दिखा तो यहीं चले आए। देख कर ही गरीब लोग लग रहे हैं, बाद में पेमेन्ट के लिए फजीता करेंगे। मैंने कह दिया कि एमरजेन्सी ले कर जाओ यहां भरती नहीं होगी। उसी पर हल्ला मचा रहे हैं’’ डा॰ अनुज ने एक ही सांस में कहा।
‘‘सन्स ऑफ़ बिच, अन्दर पेशेन्ट्स एडमिट हैं, इनके शोर-शराबे से उनको परेशानी होगी। गार्डस को बोलो भगाएं इन्हें’’ डा॰ विनोद आगबबूला होते हुए गेट की तरफ बढ़े।
‘‘गार्डस! कम हियर!! फास्ट!! अनुज कॉल अदर गार्ड्स!!’’ गेट की तरफ बढ़ते हुए डा॰ विनोद के मुंह से लगातार शोले उछट रहे थे।
‘‘ओ. के. सर!’’ डा॰ अनुज अन्दर की ओर दौड़ गए।
‘‘विकास तुम्हें सैलरी इनकी शक्ल देखने को मिलती है? भगाओ इन्हें बाहर!’’ डा॰ विनोद गेट पर खड़े गार्ड पर बरसे।
‘‘डाक्टर साहब छोटी बच्ची है .... एक बार देख लो ... आपकी भी कोई बच्ची होगी ... डाक्टर साहब एक बार देख लो .... साहब लड़की की सांस चल रही है .... हंसती.खेलती बच्ची थी, छत से गिर गयी डाक्टर साहब ... एक बार देख लो डाक्टर साहब ... बच्ची मर जाएगी साहब ... आप देख लेंगे तो जान बच जाएगी’’ एक असमय अधेड़ से हो गए व्यक्ति ने डा॰ विनोद के पैर पकड़ लिए। बेजान से नीले रंग की शर्ट और पुरानी से पेंट पहने उस व्यक्ति की वीरान सी आंखों से आंसू तो नहीं बह रहे थे लेकिन उसकी पीड़ा साफ-साफ उसकी आंखों में तैर रही थी।
‘‘पैर छोड़ो’’, डा॰ विनोद ने झटके से पैर छुड़ाया। इस तरह के स्पर्श उन्हें बेहद ऑकवर्ड लगते हैं।
‘‘देखो भाई ... लड़की सीरियस है .. यहां भरती नहीं होगी ... आप सरकारी हॉस्पिटल में जाइए .... वर्ना ये गार्डस आपको धक्के मार कर यहां से भगा देंगे!!’’ डा॰ विनोद ने देख लिया था कि डा॰ अनुज पूरे हॉस्पिटल से दर्जन भर सिक्योरिटी गार्डस जमा करके गेट की तरह आ रहे थे।
‘‘नहीं डाक्टर साहब ... मरती है यहीं मरने दीजिए .. लिटा दे भाई यहां ... उसने मरना होगा तो यहीं मर जाएगी’’ वो व्यक्ति जमीन पर बैठ गया। टैम्पो में बैठे हुए दो लोग बेहाश लड़की को बाहर निकालने लगे।
‘‘गेट लॉस्ट!! गार्डस भगाओ इन्हें!’’ डा॰ विनोद कुछ पीछे हो गए। गार्डस अपने-अपने डंडे हाथ में लेकर पोजीशन संभालने लगे। तब तक दो लोगों ने लड़की को जमीन पर लिटा दिया। लग रहा था वो पूरी तरह सत्याग्रह के मूड में थे ... बिना किसी डर के। गार्डस को डंडे संभालते देख कर भी उन तीनों में कोई एक इंच भी नहीं हिला। आदमी को सबसे ज्यादा डराने वाली मौत ही कई बार आदमी को जबरदस्त साहसी भी बना देती है।
न चाहते हुए भी डा॰ विनोद की उड़ती हुई निगाह लड़की के चेहरे पर पड़ी। चेहरे में पता नहीं क्या था कि डा॰ विनोद के चेहरे की रंगत एकदम से उड़ गयी। लगने लगा कि वो अचानक बदल गए, कोई और इंसान हो गए, बिलकुल अलग!! निरभ्र नीले आकाश में अचानक काली घटाओं घिर आयीं, बुरी तरह बिजली चमकने लगी और तूफानी हवाएं चलने लगीं। एक पल को तो उनके कदम भी लड़खड़ा गए और किसी तरह अपने आप को संभाला।
‘‘हटो!!’’, आगे वाला गार्ड डन्डा लेकर आगे झपटा लेकिन उसका डंडा अपनी मंजिल तक पहुंच पाता इससे पहले डा॰ विनोद का हमेशा भकभकाता रहने वाला स्वर राख की तरह फीका और ठंडा-सा था , ‘‘रूक जाओ!! लड़की को आपरेशन रूम में पहुंचाओ!!’’
सब लोग हक्के-बक्के थे, गार्ड भौंचक्का था और डा॰ अनुज फुसफसाया, ‘‘सर क्या कह रहे हो? ये लोग पैसे-वैसे नहीं दे पाएंगे ... लड़की मर-मुर गयी तो गांववाले मधुमक्खियों की तरह से ट्राली-जुगाड़ में भर कर आएंगे और आफत खड़ी कर देंगे!!’’
‘‘वार्ड बॉय को बुलाओ और इसे ऑपरेशन थियेटर में पहुंचाओ!!’’ डा॰ विनोद ने कहा और बिना किसी की ओर देखे मुड़ कर पीछे चले गए। उनकी चाल भी शिथिल थी, किसी पेशन्ट के ऑपरेशन टेबल पर दम तोड़ देने पर भी वो उसके छाती पीटते, दहाड़ मारते घरवालों के बीच से अपनी उसी शानदार चाल से निकलते थे। बुरी तरह घायल दर्द से चीखते घायल को ऑपरेशन टेबल पर पहुंचाने के बाद भी वो ऑपरेशन थियेटर में सधी हुई चाल से ही घुसते थे। लेकिन आज लग रहा था वो किसी तरह अपने को घसीट कर चल रहे थे।
ऑपरेशन थियेटर में पहुंचकर डा॰ विनोद चुपचाख खड़े हो गए, फर्श की ओर ताकते हुए। दोनों हाथ जेब में डाल लिए। कुछ ही देर में दो वार्ड बॉय लड़की को पहिए वाली स्ट्रेचर पर लेकर आ गए। और ऑपरेशन टेबल पर लिटा दिया। डा॰ अनुज भी पीछे-पीछे आ गए।
‘‘आप लोग प्लीज बाहर चलिए!! मैं पेशेन्ट को खुद ही देख लूंगा।’’
तीनों कुछ देर तक इंतजार करते रहे कि शायद डा॰ विनोद कुछ और कहें लेकिन जब सिर्फ घना सन्नाटे ही वहां तैरता रहा तो तीनों एक दूसरे को अजीब नजरों से देखते हुए बाहर आ गए। डा॰ विनोद ने दरवाजा बंद कर दिया। बाहर सब असमंजस में थे, डा॰ अनुज और वार्ड बॉय सिर्फ आंखो ही आंखों में कुछ देर बात करते रहे फिर वहां से सरक लिए। लड़की के साथ आए तीनों लोग डा॰ साहब की इस अचानक मेहरबानी से सकपकाए हुए ऑपरेशन थियेटर के बाहर जमीन पर ही बैठ गए। काउंटर पर बैठी लड़कियां भी आपस में कानाफूसी करते हुए अपने काम में मशगूल होने का नाटक करने लगीं। डाक्टर के इंतजार में बैठे कई मरीज और उनके घरवाले अपनी घडि़यों पर निगाह डालने लगे, कमर सीधी करने के लिए हॉल में चक्कर काटने लगे।
ऑपरेशन थियेटर के अंदर डा॰ विनोद को कुछ चक्कर से आने लगे तो दीवार से सट कर खड़े हो गए। खड़े रहना भी कठिन हो गया तो वहीं दीवार से टिक कर जमीन पर बैठ गए। पता नहीं कितने वर्षों बाद डा॰ विनोद अपनी आभिजात्य छवि को छोड़ कर जमीन पर बैठे थे। ऊपर उठने की सबसे भारी कीमत यही चुकानी पड़ती है कि वो जमीन पर नहीं बैठ सकता।
निगाह ऊपर उठायी ऑपरेशन टेबल पर पड़ी बेसुध लड़की पर टिका दी। बेहोश थी, लेकिन छत से गिरने के बावजूद कहीं भी कोई बाहरी चोट का निशान नहीं था। लग रहा था जैसे सो रही है। उम्र 12-13 से ज्यादा नहीं होगी, रंग सांवला, साधारण नैन-नक्श, दुबला-पतला शरीर, सलवार सूट का रंग उड़ गया था या मिट्टी लग गयी थी यह कहना मुश्किल था। इस सब के बावजूद उस लड़की में खूबसूरती की एक अद्भुत सुगन्ध थी जो सिर्फ जंगल में अनायास उग आए फूलों में ही होती है। एक नजर देखने पर ये खूबसूरती नहीं दिखती, सब साधारण दिखता है। लेकिन जब गहराई से देखा जाता है तो साधारण की जमीन से असाधारणता की अलौकिक कोपल फूटती दिखती हैं। कुछ पल पहले तक जिसमें कुछ नजर नहीं आता है अगले ही पल उससे निगाहें हटाना मुश्किल हो जाता है। जैसे बर्फ से अचानक तपिश निकलने लगे या सूखी रेत से कलकलाती जल धारा!
उसमें कुछ ऐसा था जिसने डा॰ साहब के भीतर बनी अहंकार, कठोरता, आभिजात्यता और स्वार्थ की भव्य इमारत की नींव को एक तीव्र भूकम्प की तरह पल भर में हिला दिया और इमारत भरभरा का ढह गयी। उनको लग रहा था वो खुद ही इस खण्डहर में तब्दील हो गयी इमारत के सामने बैठे हैं, नितान्त अकेले और असहाय। जिस अतीत से बचने के लिए उन्होंने अपने चारों और घमंड, दिखावे और शाही जीवन की दीवारें खड़ी कर ली थीं, इस मानसिक भूकम्प से सब की सब धराशायी हो गयीं और अतीत बवंडर की तरह उनको घेर कर खड़ा हो गया।
आगरे का पुराना मोहल्ला था वो, सटे हुए घर, बीच में संकरी गलियां, सीलन और नालियों की मिलीजुली गंध हर समय भरी रहती । धूप यहां कभी-कभार ही नीचे तक आती थी, ज्यादातर तो झज्जे पर ही बैठ कर लौट जाती थी। डाक्टर साहब उन दिनों 15-16 साल के विनोद हुआ करते थे। अमरूद खाते-खाते तिमंजले पर बिना रुके चढ़ जाते और रसोई से चुरा कर लायी गयी कागज की पुडि़या में बंधी चीनी फांकते हुए पतंगों की डोर खींचते तो लगता वो एक-आध बादल को नीचे खींच ही लेंगे।
पढ़ाई-लिखाई का कोई बोझ नहीं था, बस पास होना ही बहुत था और वो साल में एक महीने पढ़ के हो जाता था। इसलिए ढेर सारा समय था, टीवी था नहीं तो घर में टिकने की कोई जरूरत नहीं थी। छतों, दुछत्तियों, कोठों, गलियों में घूमने-फिरने के लिए काफी जगहें थीं। कही भी बतियाओं, कहीं भी उधम मचाओ किसी को खबर नहीं होगी। मुंडेरों पर बैठ कर चीलों को ताकते हुए गप्पे ठोकने का मजा ही अलग था। बंदरों को खदड़ने के लिए जगह-जगह रखे बांस कूदने के भी काम आते।
विनोद की उम्र ऐसी थी कि नर्म, गुनगने ख्याल चैबीसों घंटे दिमाग में तैरते रहते। हर समय अपनी देह और सोच से जुड़ा कोई न कोई सवाल दिमाग में चहलकदमी करता रहता उसके अधकचरे उत्तर कभी खुद ही पैदा हो जाते तो कभी कोई साथी दे देता। कभी-कभार रद्दी में बिकी गुप्त ज्ञान की पुरानी किताबों के कुछ फटे हुए पन्नों को संभाल कर रखे हुए कोई मित्र मित्रता का मान रखते हुए एक-आध पन्ना फाड़ कर दे देता तो कई दिनों तक के मौज-मजे का साधन हो जाता। उसे असंख्य बार पढ़ लिया जाता, सीधा-उल्टा हर तरफ से जांच-परख कर देख लिया जाता। उसको पढ़ते समय कई बार ख्याल उबलने लगते और भाप में बदल कर मन की दीवारों पर दबाव बनाने लगते जैसे फट कर बाहर आना चाहते हों। अपने ही शरीर की खुद पड़ताल करने का मन करता लेकिन फिर एक दोस्त का कथन याद आता कि अपने हाथ को अगर वहां लगाया तो बहुत जल्द मौत हो जाएगी, टीबी, पीलिया जैसी बीमारियां लग जाएंगी और किसी तरह जिंदा बच भी गए तो शादी नहीं हो पाएगी।
ऐसे ही ख्यालों से घिरे हुए एक दिन तिगड्डे पर सबसे ऊंची छत पर चढ़ गया। बरसात का मौसम था, शाम के आसमान में कई रंगों के बादल एक दूसरे से उलझते हुए टहल रहे थे। सामने ही ताजमहल दिख रहा था और कई बादल उसके गुम्बद पर अटके हुए लग रहे थे। तोतों के झुंड तेजी से निकल रहे थे, शायद वो बारिश होने से पहले अपने आशियानों में पहुंच जाना चाहते थे। मुंडेर के सहारे चलते हुए किनारे पर आया तो निगाह अपने आप ही बगल वालों के आंगन में चली गयी। उसे याद आया कि उनके यहां कुछ महीने पहले किराएदार आए हैं। काफी पैसे वाले लगते हैं, मुहल्ले में पहली बार किसी ने लम्ब्रेटा स्कूटर देखा है, जिस पर सवार होकर वो रोज सुबह ऑफिस को निकलते हैं। शायद कोर्ट में कोई ऑफिसर हैं। एक 13-14 साल की लड़की है, एक 7-8 साल का लड़का है और दोनों मियां बीबी हैं। एक भाई और आया हुआ है अपनी बीवी के साथ, सुना है गांव में काफी जमीन है, देख कर ही लगता है कि दबंग किस्म का व्यक्ति है। सुबह नहाने बाद तेल से सने बालों को काढ़ कर, सफेद कुर्ता-पायजामा पहनकर गली में टहलने के लिए भी निकलता है तो अपनी दुनाली कंधे पर टांग लेता है। कुछ नौकर-चाकर भी हैं जो संग में रहते हैं।
आंगन में झांका तो उनकी लड़की लता गुसलखाने से निकल रही थी। 13-14 साल की कमसिन उम्र, बिलकुल जैसे नयी-नयी कोंपले फूटती हैं। कोई असाधारण रूप से सुन्दर नहीं थी, रंग दबा हुआ था फिर भी उसमें कुछ ऐसा था कि विनोद उस पर से निगाह नहीं हटा पाया। गीले बालों को तौलिये से लपेट रखा था, फूलों की आकृति से सजे सलवार-कुर्ते पर जगह-जगह पानी की छींटे पड़ी हुई थीं। आंगन में आकर बालों को झाड़ने के लिए उसने तौलिया खोला तो उसकी निगाह उपर उठी। विनोद को लगा घटाएँ ऊपर आसमान के साथ-साथ नीचे आंगन में भी उतर आयीं हैं और उनसे झरती बूँदें आंगन से ज्यादा उसके मन को भिगो रही हैं। विनोद को अपनी तरफ ताकते देख पहले तो सकपकायी लेकिन फिर प्राकृतिक समझ के जोर मारते ही उसे अहसास हो गया कि विनोद की निगाहें उसके झरने के तरह फूटने को आतुर युवावस्था के आकर्षण में बंधी हैं। उसने विनोद से निगाहें हटा लीं और तौलिए से बाल झाड़ने लगी। एक पारदर्शी मुस्कान उसके होठों पर चुपचाप सरक आयी और मन में प्यारी-सी गुनगनाहट का अनुभव होने लगा। बाल झाड़ने के बाद उसने दुबारा ऊपर देखा तो उसकी मुस्कान इतनी सघन हो चुकी थी कि बिना उसके मुस्कान दिखे विनोद के मन में यह अहसास झनझनाने लगा कि लता को उसके देखने से कोई आपत्ति नहीं है।
उसके बाद से विनोद के लिए आखों का टकराव दुनिया की सबसे प्यारी घटना बन गयी। जब, जहां, जैसे मौका मिलता वो हर समय इसी कोशिश में रहता कि किसी तरह उसकी आंखे उन आंखों से टकरा जाएं जिनका सपना वो सोने के बाद भी देखता रहता है। धीरे-धीरे दूरी कम हो गयी और अब रोज शाम को ये दो जोड़ी आंखें छत पर आ जाती और एक दूसरे का इंतजार करती रहती। एक बार मिल जाने पर ये तब इधर-उधर देखती जब कोई कारण होता। वरना लगातार एक दूसरे से ही उलझती रहती।
कई दिनों के बाद जब पहली बार वो दोनों कुछ बोले तो दोनों को लगा उनकी जान पहचान तो वर्षों से है लेकिन बात पहली कर रहे हैं। नाम, कहां के हो, कौन-सी क्लास वगैरह से शुरू हुई बाते धीरे-धीरे हर बात पर होने लगीं। दोनों अपने-अपने परिवार के लोगों की हकीकतें भी आपस में साझा करने लगे। जब मौका लगता सब की निगाह बचा कर छत पर आ जाते। कभी लता कूद कर विनोद की तरफ आ जाती तो कभी विनोद उसकी तरफ कूद जाता। मुंडेर के कोने में बात करते रहते और जैसे ही कोई पदचाप झीने में सुनायी पड़ती सर्राटे से कूद कर अपनी-अपनी छतों पर आके छुप जाते।
विनोद को पता चल गया कि उसके जैसे-तैसे बाप-दादाओं के मकान और थोड़ी-बहुत जमा-पूंजी से गुजर-बसर कर रहे उसके बेरोजगार पिता के सामने लता के पिता धनकुबेर हैं। कोर्ट में प्रशासनिक अधिकारी उसके पिता तनख्वाह से ज्यादा ऊपर से कमा लेते हैं। लता परिवार वालों की कुछ जमीन जमींदार उन्मूलन कानून के तहत चकबंदी में जा चुकी है लेकिन फिर भी उन्होंने कुछ फर्जी नामों से काफी जमीन बचा रखी है जिसकी देखभाल लता के चाचा करते हैं। जिसमें गेंहू, आलू, सरसों, मौसमी सब्जियों की खेती करके और वहां लगे ढेरों आम, पपीते, नींबू, कटहल, अमरूद और बेर के पेड़ों से आने वाली फलों की बड़ी खेप बेच कर वो भारी मुनाफा कमाते। अपने खेत में लगे ट्यूब वैल का पानी बेच कर ही वो इतनी कमाई कर लेते थे हर साल पत्नी के सीतारामी, कंगन, हथफूल जैसे अनेक जेवर बन जाते और बनारसी सिल्क की कई साडि़यां उनके लोहे के बक्सों में कैद करने के लिए आ जाती। इसके बदले में हप्ते में एक-दो बार पड़ने वाले झापड़ और रोज शाम को रम के कुछ पेग हलक से नीचे उतरने के बाद दी गयी कुछ लगी-बंधी मां-बहन की गालियां उसे इतनी बुरा सौदा नहीं लगती कि वो कुछ ज्यादा हल्ला मचाए।
मासिक धर्म चालू हो जाने के कारण लता का ज्ञान विनोद से कई गुना ज्यादा था। कई बार वो विनोद के सवालों का जवाब नहीं दे पाती थी लेकिन फिर भी उसने विनोद को काफी कुछ समझा दिया था। लता यह भी जानती थी कि अगर उसके घर में किसी को इस बात की भनक भी लग गयी कि वो विनोद से इस तरह मिलती है तो उन्हें उसकी खाल उखाड़ने में पल भर नहीं लगेगा। फिर भी पता नहीं ये कैसी चौबीसों घंटे चलने वाली जलन थी जिससे राहत पाने के लिए वो विनोद से मिलने के मौके तलाशती रहती थी। शाम को मां के साथ रोटियां सिकवाने के बाद ही उसे छत पर आने का मौका मिलता था। चाची शायद ही कभी घर के काम में हाथ हाँथ बंटाती थी क्योंकि उनकी तो बीमारी ही नहीं खत्म होती थी, कभी घबड़ाहट, तो कभी सरदर्द। जब भी देखो उनके सर पर सर दर्द से राहत पाने के लिए कपड़े की पट्टी ही बंधी रहती। अगर कभी कुछ दिनों के लिए बीमारी से छुटकारा मिलता तो फिर उपरी साए, बुरी हवाएं और उनसे जलने वालो द्वारा किए गए टोटकों का असर हो जाता। कभी काले कपड़े पहने कोई औरत छाती पर आके बैठ जाती और उनकी सांस रुक जाती तो कभी खड़े-खड़े दौरा पड़ जाता और जमीन पर लोट लगाने लगती। इसी कारण साल में आधा समय शहर में रखा जाता क्योंकि ये सब चीजें गांव में जाने पर बढ़ जाती थीं।
दोनों छत पर मिलते समय बहुत सावधानी बरत रहे थे फिर भी लता के घर में कुछ सन्देह के कीड़े पनप गए थे। कोई कुछ कह नहीं रहा था क्योंकि बिना सबूत के वो दोनों साफ मुकर जाते और आगे के लिए और सावधान हो जाते। लता को बिलकुल भी नहीं पता था कि उसके घरवालों को उस पर कुछ-कुछ शक हो चुका है। विनोद के दोस्तों को तो भनक लग गयी थी लेकिन अभी दुश्मनों तक बात नहीं पहुंची थी इसलिए उसके घरवाले अभी बेखबर थे।
उस शाम मौसम कुछ अजीब था। दिन में अच्छी बूंदा-बांदी के बाद शाम को बादलों के टुकड़े टूट गए थे और ढलते सूरज की किरणें बादलों पर सातों रंग बिखेर रही थी। एक उमसभरी बेचैनी हर तरफ थी। विनोद और लता दो दिन बाद मिल रहे थे। हमेशा की तरह दोनों मुंडेर की दीवार से टेक लगा कर बैठे थे।
‘‘दो दिन कहां थी?’’, विनोद की आखों में आज कुछ अलग ही रंग तैर रहे थे। उसके शब्द उखड़ रहे थे, उसका हलक सूख रहा था। कुछ अजीब से विचार उसके मन में लुपलुप कर रहे थे।
‘‘कुछ नहीं वैसे ही, स्कूल का काम, फिर घर का काम, फुरसत ही नहीं मिली!’’, लता ने जमीन पर पड़ी पत्ती उठा कर उसको मोड़ते हुए कहा।
‘‘तुझे पता है जब तुझसे नहीं मिलता हूं तो मेरा क्या हाल हो जाता है?’’, विनोद ने उसका हाथ पकड़ लिया।
‘‘क्या हो जाता है?’’ लता ने अपना हाथ ढीला छोड़ दिया और उसकी आंखों में अपनी आंखें टिका दीं। विनोद ने उसका हाथ कस के दबा दिया। आज उसके अंदर कुछ नयी इच्छाएं रह-रह कर बिजली की तरह चमक रही थीं। लता की आखों में तैरते अनजाने भावों को पढ़ते-पढ़ते उसके हाथों में हरकत हुई और किसी अनजान सी कामना के वशीभूत होकर वो हाथ सरक कर लता के सीने पर आ गए। विनोद को लगा इन कच्चे उभारों को थाम कर उसने पूरी धरती को ही अपनी हथेली पर सजा लिया है। लता जड़ सी हो गयी, कुछ क्षणों में उसकी चेतना लौटी तो अपने भीतर करवटें लेती भविष्य की एक भरीपूरी औरत के जगने का सुखद अहसास उसकी देह के रोम-रोम में भर गया।
‘‘साले!! हरामी!!’’, आग की लपट जैसा तमतमाता और तूफान की तरह चीखता ये स्वर विनोद के कान में पड़ा तो वो लगभग उछल गया। लता के चाचा बेहद चालाकी से अपने घर की सीढि़यों से आने की बजाय विनोद के घर की सीढि़यों से आए थे। विनोद को जैसे लकवा मार गया, उसकी टांगों में इतनी ताकत भी नहीं बची थी कि वो खड़ा हो सके, वो बेदम बैठा रहा।
‘‘कुत्ते की औलाद हमारे घर की इज्जत पर हाथ डालता है? आज तेरे पुरखों की आत्माएं भी नीचे नहीं उतर आयी तो मेरा नाम ठाकुर वेद प्रकाश नहीं। बहनचोद न अपनी जाति देखी, न औकात और हमारी इज्जत पर हाथ डालता है।’’ लता का चचा गुस्से से सचमुच कांप रहा था। इतनी देर में नीचे से लता की मम्मी, चाची और पिता भी आ गये। साथ में दुनाली और लट्ठ लिए नौकर भी थे।
‘‘भाभी! लता को लेकर नीचे जाओ इससे बाद में निबटेंगे!’’
लता छोटे-छोटे बच्चों की बुक्का फाड़ कर रोने लगी। वो समझ गयी थी कुछ बहुत बुरा होने वाला है। वो अब भी नहीं समझ पा रही थी कि इतनी प्यारे, खूबसूरत और मुलायम से अहसास के लिए सब लोग इतना भयावह और क्रूर सोच क्यों रखते हैं? उसको यह भी लग रहा था उसके यहां से हटते ही विनोद के साथ कुछ बहुत भयानक होगा। वो जमीन पर बैठ गयी। जब वो हाथ खींच कर भी नहीं उठी तो उसकी मम्मी और चाची उसे चीखते-चिल्लाते हुए लगभग गोद में उठा कर नीचे ले गयीं।
‘‘भाईसाहब इसके हाथ अगर आज साबुत बच गए तो हम कहीं मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहेंगे। मेरे सामने इसने हमारे घर की इज्जत पर हाथ डाला है।’’ लता के पिताजी कुछ बोल नहीं रहे थे लेकिन उनके चेहरे पर अंगारों जैसा भाव और आंखों से रह-रह कर निकलती चिंगारियां सब कुछ दर्शा रही थीं।
‘‘हरामी के हाथ पकड़ो’’, लता का चाचा दहाड़ा और नौकर से दुनाली अपने हाथ में ले ली। दो नौकरों ने उसके हाथ पकड़ कर जमीन पर टिका दिए। पहले विनोद ने कोई विरोध नहीं किया लेकिन जब लता के चाचा को दुनाली हाथ में लेते हुए देखा तो विनोद अपने को छुड़ाने के लिए तड़पने लगा। लता के चाचा ने दुनाली को उल्टा पकड़ा और उसका बट पूरी ताकत से विनोद के हाथ पर दे मारा। हड्डियां कट्क से चटक गयीं और खून की कई सारी छोटी-छोटी धाराएं जमीन पर बहने लगी। दर्द का तूफान उंगलियो से उठ कर विनोद के पूरे शरीर में दौड़ने लगा। वो चीखने लगा लेकिन लता के चाचा ने दूसरे हाथ की उंगलियों पर भी बट को पटक दिया। दर्द के कारण विनोद की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा। नौकरों ने उसे छोड़ दिया।
‘‘बस छोड़ दो! मर-मुर गया तो हमारे सर हत्या लगेगी।’’ लता के पिता ने कहा। चाचा भी पीछे हट गया था और और दुनाली अपने कंधे पर टांग ली। सब उसे छोड़ कर नीचे जाने लगे तो सीढि़यों के पास तक पहुंच कर लता का पिता लौट कर आया और कस के एक लात विनोद को जमाते हुए घ्रणा से लथपथ स्वर में बोला, ‘‘साले मेरी बेटी को हाथ लगाता है!’’ फिर सब नीचे उतरते गए।
बेहोशी और दर्द के सागर में डुबते उतरते हुए विनोद को आखिरी शब्द किसी तरह छत में लता के चाचा द्वारा बाहर से लगायी कुंडी को भीतर से तोड़ कर आयी अपनी मां के सुनायी दिए, ‘‘क्या आग लगी थी तुझे जो अपनी ये गत बनवा ली। हमें भी कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा। हाय राम!!’’
विनोद को अपने हाथ में दो अहसास गड्गमड्ड होते हुए महसूस हुए। एक मुलायम सा अहसास था हाथ में भरे हुए लता के धड़कते हुए अर्द्धविकसित उभारों का जो उसके पूरे अस्तित्व को सुख के कंपन से धड़का रहा था और दूसरा अहसास था हाथों से दौड़ती भयानक पीड़ा की तरंगों का जिसके आगे मौत भी सहज थी। दोनों अहसास आपस में घुल गए और विनोद बेहाश हो गया।
उसके बाद जैसे जिंदगी सिर्फ कैलेन्डर में आगे बढ़ते दिनों की संख्या हो गयी। हॉस्पिटल से घर आने में उसे एक महीना लगा। उसके बाद पूरी तरह ठीक होने में लगे छः महीनों ने उसकी जिंदगी को पूरी तरह ठूंठ कर दिया। खाने-पीने यहाँ तक दैनिक कर्म तक करने के लिए वो जिस तरह दूसरों पर निर्भर हो गया उसने उसके अंतर्मन को पूरी तरह चटका दिया। वह सर जिन्दा था न उसकी जिन्दगी में उम्मीदों की खुशबू थी न कोई जीने का अहसास। बस सांस लेनी थी और जिंदा रहना था। उसके माता-पिता ने घर बेच दिया और अपने इकलौते बेटे को लेकर गांव आ गए। बाप-दादाओं की थोड़ी सी जमीन थी और मकान बेच कर मिले पैसे जिससे गुजर-बसर चल निकली। गांव के स्कूल में ही विनोद को भर्ती कर दिया।
विनोद को गांव की सौंधी महक से भरी मिटटी, हरियाली, ताजी हवा, दूर-दूर तक फैले हरे-भरे खेत और खेतों के बीच बहती खूबसूरत नहरों में भी सिर्फ रेगिस्तान ही नजर आता था। उसके पास दो ही रास्ते थे, एक अपने को खत्म कर देना या दूसरा पढ़ाई करना। उसने पहले विकल्प के लिए कई बार नहर के आस-पास चक्कर लगाए, कीड़े मार दवाई की शीशी हाथ में ली और गांव के पास से गुजरती रेल की पटरी पर काफी देर तक बैठ के भी देखा। लेकिन फिर पता नहीं क्यों उसने पढ़ने का निर्णय लिया। उसके पढ़ने के पागलपन के सामने स्कूल की टूटी छत, ढीठ और मक्कार मास्टर, फटी किताबें, गंदी स्कूल ड्रैस और घिसी हुई छोटी-छोटी पैंसिले सबकी कोशिशें बेकार साबित हुईं और वो पढ़ता गया।
उसका कोई दोस्त नहीं था, कोई दोस्त बनने की कोशिश भी करता तो वह अपने को घोंघे की तरह कवच में समेट लेता। अंत में निराश हो कर वही उसे छोड़ देता। उसकी जबरदस्त पढ़ाकू प्रवृत्ति के कारण मास्टर भी उससे खौफ खाते थे और सिर्फ काम-काम की बात ही करते। स्कूल के ज्यादातर विद्यार्थी अपने शरीर और अपने विपरीतलिंगी के शरीर के बारे में बतियाने और उसका अनुभव करने के लिए पगलाए रहते लेकिन उसे दिन रात बस एक ही चीज सूझती थी, पढ़ाई, पढाई और सिर्फ पढाई उसे लगता था कि वो एक निरीह जन्तु है और पूरी दुनिया जबरदस्त शिकारी है बस पढ़ाई ही एक ऐसा खतरनाक डंक है जिससे वो दुनिया पर पलटवार कर सकता है।
उसे हर हालत में पढ़ना था, क्योंकि पढ़ना ही उसका जीवन से जुड़ा हुआ एक मात्र तन्तु था। रिश्ते-नातों की सब डोरें उसने काट दी थीं, मन की जमीन इतनी सूखी और कठोर हो गयी थी कि उसमें प्यार के फूल खिलना तो दूर भावनाओं का एक अंकुर तक नहीं फूट सकता था। किताबों में लिखे सूखे बेजान शब्दों से ही उसे प्यार था और दिन रात उन्ही से खेलता था। परीक्षाएं उसके लिए बेमानी थी, उनका मतलब सिर्फ इसलिए था कि नयी किताबें आ जाएं। जितनी भी तरह की छात्रवृत्तियां थीं वो सब उसे बिना प्रयासों के मिलती गयीं। जिस भी कक्षा में वो होता उसके पढ़ाई के पागलपन के सामने बड़ी-बड़ी प्रतिभाएं पानी मांग जाती थीं। पढ़ने में आने वाली बाधाओं से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था।
समय के साथ-साथ उसके मन की जमीन सूखती गयी और धीरे-धीरे वो कंक्रीट की सतह में बदल गयी। अब उस पर न किसी आघात का असर होता था न ही दया, ममता, स्नेह, करुणा जैसी भावनाओं का मतलब था। सफलता का उसके लिए एक ही मतलब था, परीक्षाओं को ऐसे पास करना कि बाकी लोग उसका स्वप्न भी नहीं देख पाएं, और साथ में ढेर सारे पैसे और ताकत जमा करना। दिल्ली चला गया, ट्यूशन पढ़ा-पढ़ा कर काफी पैसे जमा करने के बाद उसने अपना सेन्टर दूसरे टीचर्स किराए पर दे दिया दिया और खुद सीपीएमटी में पास होकर एम.बी.बी.एस. करने लगा। सभी परीक्षाओं में वो गोल्ड मैडलिस्ट ही बना रहा। एम.बी.बी.एस. के बाद कुछ महीने प्रैक्टिस और फिर ओर्थोपेडिक्स की पढ़ाई करने के लिए अमेरिका का रुख किया। न कभी मां-बाप को पूछा, न कभी किसी से दोस्ती की। सिर्फ औपचारिक सम्बन्ध रखे। लौट के यहां आकर बैंक से लोन लिया, हॉस्पिटल की नींव रखी, और शहर के सबसे प्रतिष्ठित डाक्टरों में से एक की बेटी से शादी करके अपना परिवार भी बसा लिया।
उसके बाद पैसा कमाने का जो झंझावत उसने खड़ा किया वो थमा नहीं। मामुली हॉस्पिटल से प्रदेश के सबसे आधुनिक ट्रोमा सेंटर में से एक बना लिया। हाथों में लगी हुई चोट ऊपर से तो ठीक हो चुकी थी लेकिन अपनी आत्मा की गहराइयों में धंसी उसकी टीस भुलाने के लिए वो हाथ किसी हत्यारे के हाथों से भी क्रूर हो गए। ये हाथ जान तो बचाते थे लेकिन तभी जब जिसकी जान बचानी हो उसके पास नोटो का दरिया बहता हो या वो अपना सब कुछ बेच कर इलाज कराने की मंशा रखता हो। मरीज की जान, दर्द, चीखों, तड़प का उस पर रत्ती भर असर नहीं होता था।
लेकिन आज ये कंक्रीट की सतह चटक गयी और उसमें दबा कर रखे अतीत के सभी ताबूत खुल गए और उनमें से पुरानी यादों के सभी कंकाल बाहर आ गए। डा॰ विनोद को लगा वो किसी अद्रश्य शक्ति के वशीभूत हो गए हैं और किसी जांबी की तरह लड़खड़ाते हुए उठे। जब कोई व्यक्ति वर्तमान से पूरी तरह कट जाए और पूरी तरह अपने अतीत के वश में हो जाए तो वह जोम्बी हो जाता है।
लड़खड़ाते डा॰ विनोद ऑपरेशन टेबल के पास खड़े हो गए। सर से पांव तक ऑपरेशन पर टेबल पर पड़े उस शरीर को घूरा। फिर वही उमस भरी बेचैनी वातानुकुलित ऑपरेशन थियेटर में समाने लगी। बंद दीवारों के भीतर बादलों के टुकड़े तैर आए और सूरज के सातों रंग उन पर उछटने लगे। 40 साल की उम्र, लम्बा वैवाहिक जीवन, दो बच्चों के बाप के भीतर एक किशोर छटपटाने लगा, जैसे कोकून के अंदर कोई कीट फड़फड़ाता है। हाथ किसी अदृश्य शक्ति के वशीभूत हो कर उस लड़की की ओर बढ़ा और उसके सीने पर जाकर टिक गया। उनके हाथ के नीचे समाए कच्चे उभार में उसके जीवन होने के सबूत के रूप में धड़कन महसूस हो रही थी। मुलायम गर्माहट कपड़ों से रिस कर उनके हाथ को तर करने लगी।
डा॰ विनोद के हाथ की मजबूत पकड़ का प्रभाव था या कोई संयोग, वो लड़की खांसी, इससे पहले कि डा॰ विनोद अपना हाथ हटा पाते, उस लड़की की पूरी देह कांपी, ऐंठी और अटकती सांसों और गहरी खांसी के साथ उसकी नाक से खून की धार भराभरा कर बह आयी। डा॰ विनोद के हाथ लाल-लाल खून से सन गए। उन्होंने झटके से अपना हाथ हटा लिया।
इस खून की लाली में पता नहीं क्या खास बात थी कि खून के दरिया से भी बेहिचक निकल जाने वाले डा॰ विनोद अपना मानसिक सन्तुलन खो बैठे। उनके दिमाग में फिर सब गड्ड-मड्ड होने लगा। किशोरावस्था में स्त्री देह से परिचय का पहला नर्म-नाजुक अहसास, फिर वो भयानक पीड़ा और अब ये लावे की तरह हाथ को जलाता खून। वो जमीन पर गिर पड़े और बदहवासी में चिल्लाने लगे, ‘‘लता मर गयी! लता मर गयी!!’’ उनका स्वर पता नहीं किस पाताल से निकल रहा था और घुम कर बूमरैंग की तरह उसी पाताल में समा जा रहा था।
डाक्टर साहब की आवाजें सुन कर डा॰ अनुज और सिक्योरिटी गार्ड ने किसी तरह चाबी लाकर बाहर से दरवाजा खोला। खून से सनी लड़की को स्ट्रेचर पर रख कर इन्टेन्सिव केयर युनिट में पहुंचाया। डाक्टर साहब को भी किसी तरह स्ट्रेचर पर लिटा कर अलग वार्ड में भेजने की व्यवस्था की।
जब बेहोशी में बड़बड़ाते हुए डाक्टर साहब को मरीजों के बीच से स्ट्रेचर पर ले जा रहे थे सब भौंचक्के से उन्हें देख रहे थे। जमीन पर बैठा उस बच्ची का बाप अपने उलझे हुए खिचड़ी बालों में हाथ फिराता हुआ चकित भाव से सोच रहा था कि डाक्टर साहब बार-बार उसकी पत्नी का नाम क्यों ले रहे हैं। वो भी तब जब उसकी पत्नी ने शादी के एक साल बाद ही इस बच्ची को पैदा करने के बाद नामालुम किस कारण से आत्महत्या कर ली थी!!