Saturday, August 23, 2014

एक काॅल गर्ल का इंटरव्यू

(सिगरेट, शराब या असुरक्षित सेक्स प्राणघाती भी हो सकता है)

जहां इंटरव्यू होना था वह एक आलीशान कमरा था। फर्श पर बेहतरीन कार्पेट, दीवारों पर नायाब पेटिंग्स, छत पर टंगा भव्य झाड़फानूस और अनेक खूबसूरत लाइटें; साथ में भव्य सोफे और देवदार की कांच लगी नक्काशीदार दर्शनीय मेज। दीवार पर बनी लकड़ी की अल्मारियों में किताबें, शोपीस और खूबसूरत मूर्तियां।

जब अनीता जी इंटरव्यू के लिए आकर बैठी तो लगा कोई महारानी बैठी है। मैरून रंग की बेशकीमती सिल्क की साड़ी, मैचिंग स्लीवलेस ब्लाउज, गले में छोटा सा लेकिन रत्नजडि़त हार और एक हाथ में राडो की घड़ी तो दूसरे हाथ में सिर्फ एक हीरे का कंगन। तीखे नाक-नक्श और संतुलित मेकअप, करीने से कटे कंधों पर बिखरे घने बाल, व्यायाम से साधा हुआ सुगठित शरीर और साथ में इतनी गहरी मुस्कान कि पता लगाना मुश्किल, बनावटी है या असली।

देखिए जरा समय के पाबंद रहिए और समय से अपना इंटरव्यू खत्म कीजिए। मैं समय की भारतीय अवधारणा में विश्वास नहीं रखती, मेरे लिए एक-एक मिनट कीमती है। - अनीता जी ने घड़ी देखते हुए कहा। मुस्कराहट के साथ स्वर में ऐसी सख्ती दुर्लभ होती है।

मैंने पैड संभाला और मोबाइल का रिकाॅर्डर आॅन करके मेज पर रख दिया। मेज पर रखा काॅफी का कप उठा कर एक सिप लिया और पहला सवाल पूछा।

जी बिलकुल! तो मेरा पहला सवाल है कि आप इस प्रोफेशन में कैसे आयीं?

देखिए मेरा इस प्रोफेशन में आना कोई बड़ी घटना नहीं है। जब दुनिया मुद्रा, आई मीन करेंसी, के चारों ओर घूम रही है तो हर इंसान की ये मजबूरी है कि वह कोई ऐसा काम करे जिसके बदले में उसे पैसे मिलें वर्ना वो चाहे आईन्स्टीन हो या मोजार्ट उसे धकिया कर हाशिए पर फैंक दिया जाएगा। मुद्रा एक प्रतीक थी, सुविधा के लिए बनायी गयी थी। लेकिन प्रतीक की जगह वह खुद ही सब कुछ बन बैठी, जैसे आप अपने पिता की मूर्ति बना लें और उसे ही अपने बाप समझें। और पैसे मिलने का एक ही तरीका है कि हम अपना कुछ बेचें। जब हम बाजार में बेचने निकलते हैं तो ज्यादातर दुकानें कबाडि़यों की नजर आती है जो ’क्राइम एंड पनिशमेंट’ और ‘रंगीली रातों’ को एक ही भाव खरीदते हैं। ऐसे में फिर आपके पास यही रास्ता बचता है कि आप धूर्त हो जाएं और वो बेचें जो आपके पास है ही नहीं या किसी और का छीनें। इसलिए मुझे लगा अपना जमीर बेचने से अच्छा है कि हम अपना जिस्म बेचें। कम से कम अपने खुद के सामने तो नजर उठा कर बात कर सकेंगे। मैंने इस प्रोफेशन में आने का डिसीजन लिया और मुझे इस पर गर्व है।

आपको गर्व है?? आपको किसी तरह का शर्म का अहसास नहीं होता?

क्या बकवास कर रहे हैं आप? इसमें शर्म की क्या बात है? शर्म की बात तो तब होती जब मैं किसी सरकारी नौकरी में जाकर देश की बर्बादी में हाथ बंटाती या लुटेरे कारपोरेट के समूह में शामिल हो जाती। मल्टी नैशनल कंपनी में अपना दिमाग बेचकर जिंदगी होम करने वाले हाइली पेड बंधुआ मजदूरों से मैं लाख गुना बेहतर हूं। अपनी मर्जी से काम करती हूं, अपनी शर्तों पर काम करती हूं। किसी को धोखा नहीं देती। मैं एक एन्ट्रप्रेन्योर हूं, इसमें शर्म की नहीं गर्व की बात है। कानूनी काम करती हूं और पूरा टैक्स भरती हूं।

कानूनी?

जी हां कानूनी! अगर आपकों कानूनों की जानकारी नहीं है तो पहले थोड़ा पढ़ कर आएं फिर इस पर बात करेंगे।

अच्छा ये बताइए आपकी धर्म और ईश्वर के बारे में क्या धारणा है? आप किसे मानती हैं?

निहायत वाफियात सवाल है। इससे बेहतर सवाल होता कि आप ये पूछते कि मैं कौन-सा सेनेटरी नैपकिन या किस कंपनी की हेयर रिमूविंग क्रीम इस्तेमाल करती हूं। देखिए, धर्म एक नितांत व्यक्तिगत चीज है और उसका कोई छोटे-से-छोटा भाग भी प्रकट हो रहा है तो वह अश्लीलता है।

आपने कभी शादी, परिवार के बारे में सोचा है?

जी हां कई बार सोचा है लेकिन हर बार मन नकारात्मक भावों से भर गया है। देखिए जिस ढंग से हमारे यहां शादियां होती हैं वो बड़ा घिनौना है। जाति, धर्म, लालच और अन्याय उसमें इस तरह भरा है कि किसी जागरुक व्यक्ति के लिए शादी करना आसान नहीं है। सामाजिक मान्यता प्राप्त और थोड़ी-बहुत सामाजिक सुरक्षा और पेंशन वगैरह की सुविधा प्राप्त वेश्याओं को पत्नी कहा जाता है। लेकिन उनके पास काॅल गल्र्स जैसे अधिकार नहीं होते। रही परिवार की बात, तो मेरा परिवार बहुत बड़ा है और उसमें ज्यादातर सदस्य जैनेटिक रूप से नहीं जुड़े हैं। जैनेटिक परिवार तो मजबूरी और स्वार्थ की डोर से बंधे होते हैं।

देश के हालात पर आपकी राय?

देखिए इस सवाल की इतनी बेइज्जती हो चुकी है कि मैं इसका जवाब नहीं देना चाहूंगी। हर आदमी चाहे वो कितना ही जाहिल और निकम्मा क्यों न हो इस सवाल का जवाब एक्सपर्ट की तरह देता है।

समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी के बारे में कुछ कहना चाहेंगी आप?

हमारे समाज के ऊपर दो सबसे बड़े घाव हैं - मौत और सेक्स। इन्हीं दो से भागता है और इन्हीं दोनों के फोबिया और मेनिया के बीच पेंडुलम की तरह झूलता रहता है। पूरी जिंदगी इन दो पाटों के बीच पिस कर रह गयी है। जो इलाज किए गए वो बीमारी से भी ज्यादा खतरनाक निकले। लोगों को नियंत्रित करने के लिए धर्म ने सेक्स का सहारा लिया और खाने, पीने, सोने जैसी साधारण और सहज चीज को टैबू करके उसे असाधारण ताकत दे दी और ‘फ्रैंकस्टीन’ बना दिया। नतीजा ये हुआ कि हमारी गालियों से लेकर विज्ञापनों या फिल्मों तक, मंदिरों से लेकर घरों तक हर चीज सेक्स से सन गयी। हमारी पूरी पीढ़ी ही इन्टरनेट के सामने बैठ गयी दूसरों को सेक्स करता हुआ देखने के लिए। उससे भी तृप्ति नहीं मिली तो आज वीभत्स से वीभत्स तरीके खोज रही है सेक्स के। इन्टरनेट के लिए सैक्स कर रही है! मौत के लिए तो मैं कुछ नहीं कर सकती लेकिन सेक्स को लेकर बने इस कैंसर के लिए मैं कुछ सकारात्मक करने की कोशिश करती हूं। एक हीलर की तरह काम करती हूं। कई लोगों को मैंने ठीक किया है। सीनियर सिटीजन्स और डिफरेन्टली एबल्ड लोगों के साथ भी मैंने कई बार बिना किसी फीस के काम किया है।

बलात्कार के मामलों पर आपका क्या कहना है?

ये सवाल भी अपनी गरिमा खो चुका है। सब के सब या तो बलात्कार कर रहे हैं या बलात्कार पर अपनी राय दे रहे हैं। एक बीमार समाज का सबसे खास लक्षण बलात्कार होता है। जब बीमारी है तो लक्षण भी रहेंगे। फिलहाल बीमारी को दूर करने की मंशा मुझे तो कहीं दिखती नहीं।

अच्छा इंटरव्यू के लिए आपका धन्यवाद। मेरा किसी से एपाॅइन्टमैंट है, मुझे अब जाना होगा। आप काॅफी और लेंगे? - अनीता जी घड़ी देखते हुए बोलीं।

नहीं काॅफी तो नहीं! लेकिन मैडम कुछ सवाल रह गए हैं।

कोई बात नहीं! उन्हें अगली बार के लिए रखिए। नमस्ते। हैव अ नाइस डे।     

Thursday, June 19, 2014

काया नहीं तेरी - 5

उपन्यास अंश -

‘‘काया!!! कैसी हो? फोन क्यों नहीं किया इतने दिन?’’ मैंने फोन को कस के हाथ में पकड़ लिया जैसे उसके गिर जाने का डर हो।

‘‘तुम मेरे फोन का इंतजार कर रहे थे?’’

‘‘तुम्हारे इस वाहियात का सवाल का मतलब?’’ मैं चिढ़ गया।

‘‘कैसे हो?’’

‘‘अअ.....अच्छा हूं!!’’ मेरी चिढ़ लीची के खुरदुरे छिलके की तरह उतर गयी और मेरी असलियत मुलायम गूदे की तरह बाहर आ गयी।

‘‘मैं नहीं जानती की ऐसा क्यों हो रहा है ... मेरी कुछ समझ नहीं आ रहा है ... मैं ढेरों लोगों से मिली हूं ...लेकिन जैसा तुमसे मिल कर लगा वैसा मुझे किसी से मिल कर नहीं लगा .... मैं वाकई में तुमको मिस कर रही हूं ... शायद इसकी वजह यह है कि मैंने तुम्हारी आखों में अपना जो चेहरा देखा वो एक औरत का था ... ऐसा चेहरा मुझे कहीं और देखने को नहीं मिला!!’’

‘‘ ..... ’’, मैं कुछ बोल नहीं पाया। भावनाओं से गीले हो गए शब्द फिसल रहे थे, पकड़ में ही नहीं आ रहे थे। मैं सोचने लगा मेरे मन में काया के लिए जो इतना जबरदस्त आकर्षण उत्पन्न हो गया है वो प्रेम है, सेक्स है या कभी किसी विपरीतलिंगी द्वारा मुझमें दिलचस्पी न लेने का परिणाम है। जो भी है, यह इतना प्रबल था कि इसने मेरे मन को गहरी काली घटाओं की तरह घेर लिया। बेचैनी की सारी धूप गायब हो गयी थी, अनजानी-सी ठंडी हवा भीतर-ही-भीतर चलने लगी थी। बादलों की तरह मन में कई सारे रंग भर गए थे लेकिन सब अच्छे लग रहे थे। रह-रह कर एक मीठा-सा अहसास बरस जाता और मेरे अन्तर को तर कर जाता।

अगर ये धोखा भी है तो क्या बुरा है? अखिल ब्रह्मांड में समुद्र के किनारे की रेत के एक कण जितनी हैसियत वाली अपनी पृथ्वी में असंख्य जीवित होते, मरते जीवों के बीच मेरी क्या औकात है? अपने आधे-अधूरे शरीर के साथ अनजानी परिस्थितियों की फिसलपट्टी पर फिसलते हुए, काल्पनिक रिश्तों के बीच सूखे पत्तों की तरह झड़ते जिंदगी के दिनों के बीच अगर कोई चीज मुझे इतना सूकून दे सकती है तो उसका धोखा होना भी कोई बुरा सौदा नहीं है। कम-से-कम जितने दिनों तक यह चल रहा है उतने दिन तक तो इससे रिसता हुआ रस मेरी अनन्त प्यास को बुझाता रहेगा। और स्थायी तो कुछ भी नहीं है!! जहां धोखा नहीं है वहां भी क्या स्थायित्व है? स्थायित्व की तलाश मानवता का सबसे बड़ा रोग है, जो हमे ठीक से जीने ही नहीं देती। हम चीजों को महसूस करने की बजाय उनके अस्थायित्व के भय से ग्रस्त होकर उनका अहसास ही नहीं कर पाते। या कई बार इसके विपरीत यह भूल कर कि हर चीज अस्थायी है उनको बिना छुए, बिना उल्टे-पल्टे उन्हें छोड़ देते हैं और इस बात का अहसास तब होता है जब उनके खत्म होने का वक्त आ जाता है।

‘‘चुप क्यों हो गए? मेरी बात से नाराज हो?’’

‘‘नहीं .... नहीं!! तुम्हारी बात से नाराज नहीं हतप्रभ हूं!! समझ नहीं आ रहा क्या कहूं’’, मैंने अपनी बात खुल कर कह दी।

‘‘मैं तुमसे मिलना चाहती हूँ!! तुम बताओ कब आऊं?’’

‘‘मिलने????’’ मेरा गला सूख गया।

‘‘क्यों? तुम नहीं चाहते मैं मिलने आऊं?’’

‘‘नहीं! नहीं!! मैं चाहता हूं तुम मिलने आओ ..... बल्कि मेरे पास से जाओ ही नहीं ... लेकिन थोड़ा मैनेज करना होगा ... घरवालों का रिएक्शन पता नहीं कैसा होगा?’’

‘‘तुम बच्चे नहीं हो!! अपनी जिंदगी के तीन दशक गुजार चुके हो, क्या तुम अपने फैसले भी नहीं ले सकते?’’, अचानक काया के स्वर मे आयी तल्खी मुझे महसूस होने लगी।

‘‘बात बच्चे होने की नहीं है, हममें कौन अपने ढंग से जीवन जी सकता है? चाहे पांव कब्र में लटके हों फिर भी हरेक को सोचना पड़ता है कि मैं ऐसा करूंगा तो क्या प्रतिक्रिया होगी, मैं वैसा करूंगा तो मेरे परिवार के लोग, मेरा पास-पड़ौस सब क्या कहेंगे।’’

‘‘पागलपन है ये! पागलपन! जहां सही-गलत का फैसला सही-गलत के हिसाब से नहीं लोगों के रिएक्शन के हिसाब से होता हो वो जगह एक बहुत बड़ा पागलखाना है जहां पागलों के कैद करने के लिए सलाखें और बेड़ियां भी नहीं है। अपनी आजादी के लिए सब कुछ दांव पर लगाना पड़ता है, हम जो हैं वही होने के लिए बहुत बड़ा खतरा उठाना पड़ता है। माना कि हम सब फांसी की सजा पाए मुजरिम हैं जिन्हें एक न दिन मौत को गले लगाना ही है लेकिन फांसी पर चढ़ने से पहले कैद में रहने के लिए हम क्यों अभिशप्त हैं? क्यों हम इस जेल में जिंदगी गुजारना चाहते हैं? माना कि जेल में रोटी की गारंटी है, शायद सुरक्षा भी बाहर से अधिक हो लेकिन ये जिंदगी नहीं है। असुरक्षा के डर से जिंदगी को बोनसाई बना लेना पाप है, गमलों में बरगद नहीं फलते-फूलते! पिंजड़े में जो कुछ हमें मिल रहा है उसे खोने के डर से पंख भी नहीं फड़फड़ाना! क्या इसे तुम जिंदगी कहते हो!’’ उसके स्वर आवेश से कांपने लगा।

‘‘हे भगवान!! इतनी भारी-भरकम बाते तुम्हें किसने बतायीं?’’

‘‘जिंदगी ने बतायीं! क्योंकि मैं जिंदगी से सीधे बात करती हूं, किसी को बीच में नहीं आने देती। जिंदगी जितनी लिजलिजी हो उतनी आसान होती है, जहाजों को किनारे पर खड़ा कर दो, कोई खतरा नहीं, कोई समस्या नहीं। लेकिन जहाज की जिंदगी किनारों पर नहीं होती, अगर वो किनारों पर खड़ा हो जाए तो समझ लो वो मर चुका है बस अपनी मृत्यु की घोषणा का इंतजार कर रहा है। मेरे लिए कितना आसान होता अगर मैं भी अपने को एक लड़का मान कर जिंदगी जीने को तैयार हो जाती? मेरा परिवार मेरे साथ होता, मेरा समाज मेरे साथ होता, कोई मजबूर लड़की परम्पराओं के नाम पर मेरे साथ जिंदगी काट लेती, सब कुछ आसान होता और फिर एक दिन मैं एक सामान्य आदमी की तरह मर जाती और सब खत्म हो जाता। लेकिन उस जिंदगी में मौत आने से पहले हर दिन मैं अपने आप को कितनी बार मारती यह मैं ही जानती हूं। मेरी हंसी भी मेरे तड़पते वजूद की भाप की तरह होती, मेरी पूरी जिंदगी मेरी नहीं किसी और की होती। क्या कोई अपनी सुविधाओं और सुरक्षा के लालच के कारण पूरी जिंदगी किसी ऐसे व्यक्ति के साथ गुजार सकता है जो उसे बिलकुल भी पसंद नहीं है?’’

‘‘ओ. के.!! तुमने तो मेरी बोलती बंद कर दी!! मैं आज शाम तक तुमको काॅल करता हूं और फिर बताता हूं कि हम कब मिलते हैं!’’

‘‘ठीक है! मैं तुम्हारे फोन का वेट करूंगी!’’ उसने फोन काट दिया। मैंने रिसीवर रख दिया और एक गहरी सांस ली। ये किस बवंडर से मेरा पाला पड़ा है? इसके सामने तो कुछ भी टिकना मुश्किल है!! उसी समय अचानक मम्मी कमरे में आ गयीं। मैं घबरा गया, जैसे कोई चोरी कर रहा हूं, मुझे लगा कहीं मेरे चेहरे कुछ ऐसे भाव तो नहीं हैं जो मेरी चुगली कर दें। मैंने कोशिश करने लगा कि मेरे चेहरे के भाव बदल जाएं। मम्मी के चेहरे पर सुबह वाला सूखापन नहीं था। पहले जैसी आत्मीयता वहां दोबारा आ चुकी थी। शायद उन्हें लग रहा होगा कि मामला ठंडा पड़ चुका है अब उसके बारे में परेशान होने की जरूरत नहीं है।

‘‘बेटा आज शाम को मुझे और तुम्हारे पापा को शादी में जाना है!’’

‘‘किसकी?’’ मैंने भी ऐसे बात की जैसे कुछ हुआ ही न हो।

‘‘आशा स्टोर वालों की लड़की की। तुम अकेले रह लोगे या पड़ौस में बोल जाऊं’’

‘‘प्लीज मम्मी!! आप किसी से नहीं बोलना मुझे नहीं अच्छा लगता किसी का यहां रहना। कोई प्राॅब्लम नहीं है मैं अंदर से लाॅक कर लूंगा आप आराम से जाओ! कितने बजे जाना है?’’

‘‘शाम को छः बजे तक निकल जाएंगे!’’
‘‘लौटना कब तक होगा?’’

‘‘कम-से-कम ग्यारह तो बजेंगे ही। तुम्हारे पापा को स्कूटर चलाना आता तो टाइम बच जाता लेकिन रिक्शे-टैम्पो से लौटने में इतना समय तो लग ही जाएगा।’’

‘‘ठीक है! आप आराम से जाओ!’’

‘‘खाना में बना कर यहीं मेज पर रख जाउंगी!’’, मम्मी मुझे देख के मुस्करायीं और कमरे से निकल गयीं। झनझनाते हुए विचार मन में उठने लगे और मैंने फोन उठा कर अपने पास रख लिया।

Tuesday, June 17, 2014

काया नहीं तेरी - 4


उपन्यास अंश-

इस बिना चांद की चांदनी ने कमरे का माहौल कुछ अजीब सा कर दिया, आवाजें शांत हो गयी थी, लगा जैसे समय कहीं अटक गया है, या थक कर कुछ देर सुस्ता रहा है। मुझे अपनी ही सांसे सुनाई देने लगी, जिंदगी अंदर जा रही थी और मौत बाहर आ रही थी, और जिंदगी और मौत के बीच में भी कहीं अटका था। किसी जंगली खरपतवार के पत्ते से निकली एक अनजानी सी सरसराहट की तरह जिसे किसी ने नहीं सुना। लेकिन मुझे वो सरसराहट बहुत तेजी से सुनाई देने लगी, किसी तूफान की तरह, एक तूफान जिसमें मेरा पूरा अस्तित्व उड़ा जा रहा था। काया का ख्याल मांसल रूप ग्रहण करने लगा, जैसे कोई बादल अचानक ठोस हो जाए या कोई खूशबू मेरे गले में लिपट जाए। काया ने अपने बाल मुझ पर गिरा लिए और उसके होंठ मेरे इतने पास आ गए कि मुझे लगा बस अब उसके होंठ पिघल जाएंगे और मेरे पूरे शरीर पर फैल जाएंगे। उसका हाथ नीचे फिसला और मुझे लगा उसने मेरे सबसे पुराने घाव पर अपना हाथ रख दिया है। उसके हाथ एक जादुई मरहम के तरह थे, जहां छूते प्यास के खुरंट हट जाते और घाव ठीक हो जाते।

किसी मर्द की असलियत पता करनी हो तो उसके दिमाग को तब पढ़ो जब वह किसी के साथ न हो बस अपने शरीर के साथ हो। उस समय वो बिलकुल पारदर्शी होता है और उसके दिमाग की एक-एक पर्त उधड़ जाती है। उसके शरीर का पोर-पोर खुल जाता है और वो तरल में बदल कर बहने लगता है, उसे लपेटे हुए सारी चादरें खुल जाती हैं, चेहरों पर चढ़े हुए सभी चेहरे एक-एक करके बर्फ से बने मुखोटों की तरह इस तरल में बहते जाते हैं, फिर जो बचता है वह सिर्फ एक बहता हुआ यथार्थ होता है।

जब ये तूफान रुका तो मैं हैरान रह गया मेरे हाथों से काया की देह की खुशबू आ रही थी और मेरे होठों पर अब भी उसके चुम्बन के अहसास की कुछ बूंदे टिकी हुई थीं। मुझे पहले कभी ऐसा अनुभव नहीं हुआ था। अनगिनत बार मैंने अपने शरीर के साथ प्रयोग किए थे, सूखी गर्म रेत पर मछली की तरह छटपटाते अपने अहसासों को राहत देने के लिए मैंने कई बार उन्हें मृगतृष्णा के पानी से निहलाया है लेकिन आज जैसा अनुभव पहले कभी नहीं हुआ था। मुझे अपने वजूद का पता ही नहीं चल रहा था ऐसा लगा कि मैं काया में समा कर काया ही हो गया था। अब काया के बगैर तो अपना समय काट रहा था लेकिन काया के ख्याल के बगैर रहना अब असंभव था।

सुबह हुई तो सब कुछ अलग सा था। काया के फोन का इंतजार था लेकिन उसका फोन न आने की कोई बेचैनी नहीं थी। गमलों में लगे पौधों के पत्ते कुछ ज्यादा हरे और जीवन्त लग रहे थे और उन पर पड़ती चमकती सुनहरी धूप कुछ ज्यादा ही खिल रही थी। रोज सुबह मेरे पास आने वाली मम्मी अब भी मेरे पास नहीं आयीं। लेकिन पता नहीं क्यों मुझे उसका अफसोस नहीं हुआ और मैं लगभग गुनगुनाता हुआ दैनिक कर्म निबटाने के लिए बाथरूम की ओर चल दिया। आज हर चीज कुछ ज्यादा ही शिद्दत से महसूस हो रही थी। शरीर पर पड़ता ठंडा पानी, साबुन की खुशबू और बाल्टी में गिरती पानी की धार की आवाज, अपने ही शरीर पर फिसलते मेरे अपने हाथ!!

नहा कर आया तो मम्मी नाश्ता रख कर जा चुकी थी। कोई और वक्त होता तो मैं नाश्ते को उठाकर फेंक देता लेकिन उस समय मुझे बिलकुल भी बुरा नहीं लगा और मैंने चुपचाप सैंडविच और काॅफी इत्मीनान से खा-पी लिए और फिर बिस्तर पर मसनद की टेक लगा कर बैठ गया। शायद कभी अकबर या अशोक ऐसे ही बैठते होंगे ... लेकिन मैं उनकी तरह हिंसा तो नहीं फैला रहा हूं!!

खिड़की से दिख रहा आसमान का टुकड़ा खूब चमक रहा था। बारिश के बाद जब बादलों के फटने पर जो साफ-सुथरी धूप खिलती है तो उसकी चमक आंखों को चैंधिया देती है। तितलियां तो अब नहीं दिखती लेकिन कुछ पंतगे खिड़की के आस-पास मंडरा रहे थे। उसी समय फोन की घंटी बजी, मैंने फोन उठाया और कुछ पलों के सन्नाटे के बाद काया की आवाज सुनायी दी ‘‘हैलो!’’

Sunday, June 15, 2014

काया नहीं तेरी - 3

उपन्यास अंश -

‘‘सही कर रही हैं आप’’, अब मैं उसे क्या बताता कि सिर्फ व्हील चेयर होने से कोई घूमने नहीं जा सकता उसके लिए अच्छे भले ताकतवर कम-से-कम दो इंसान चाहिएं।

लगभग छह-सात दिन काम चला था और मैं इस एक सप्ताह में उसके बहुत नजदीक आ गया। किसी इंसान के नजदीक जाना वैसे ही होता है जैस किसी पहाड़ की चोटी से नीचे झांकने के लिए बिलकुल किनारे तक सरक आना। इसमें डर तो लगता है लेकिन जो नजारा दिखता है वो पीछे से कभी नहीं देखा जा सकता है। इस एक सप्ताह में काया के भीतर की कई पर्तें मेरे सामने खुली। वो अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी। उसने बताया कि जब 6-7 साल की उम्र में पहली बार उसने अपने चचेरी बहन के कपड़े पहन लिए और उन्हें उतारने को तैयार नहीं हुआ तो किस तरह से उसकी बुरी तरह पिटाई हुई थी। उस दिन से शुरू हुआ अपमान और हिंसा का व्यवहार आज तक चालू है, भले ही कम हो गया है लेकिन खत्म नहीं हुआ।

‘‘मैं नहीं जानती ये क्या है! लेकिन मैं एक अनन्त बेचैनी का शिकार हूं, मैं ये नहीं हूं जो मै दिख रही हूं। जितना मैं लड़की बनती हूं उतनी ही मुझे राहत मिलती है, ये चूड़ियां, ये बिन्दी, ये मेकअप, ये सलवार-सूट, अकेले मैं तो मैं साड़ी भी पहनती हूं, सब मेरे अंदर बने हुए कभी ठीक न होने वाले जलन भरे हुए घाव पर ठंडे मरहम की तरह काम करते हैं। मैं नहीं जानती इसका क्या कारण है लेकिन मुझे अपने शरीर का रोम-रोम एक औरत की तरह महसूस होता है, एक औरत जो प्यार पाना चाहती है, प्यार करना चाहती है, खुश रहना चाहती है, खुशी देना चाहती है ...’’ ये शब्द उसने उस दिन कहे थे जब काम खत्म हो गया था। और वो सब हिसाब-किताब कर चुकी थी। सब लोग बाहर थे जब उसने ये बातें मुझसे कहीं हम दोनों कमरे में अकेले थे। अपनी बात खत्म करके उसने मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर कस के थाम लिया। पहली बार किसी स्पर्श में मुझे इतनी मजबूती और कोमलता का एक साथ अहसास हो रहा था। मुझे लगा ताजा खून मेरे हर अंग में दौड़ गया और मुझे अपने कमजोर पैरों तक में सनसनाहट का अहसास होने लगा। किसी की मुझमें दिलचस्पी है, वो भी उसकी जिसका आकर्षण सोते-जागते मुझे गुदगुदाता रहता है।

उसी समय पापा अंदर आए और काया को मेरा हाथ पकड़े हुए देख लिया। उनको देखते ही काया ने झटके से मेरा हाथ छोड़ दिया लेकिन पापा के चेहरे के पहले कुछ आश्चर्य और फिर उसके बाद आए तेज गुस्से के भाव ने जता दिया कि उन्होंने सब देख लिया है। काया तेजी से बाहर चली गयी, पापा कुछ देर किंकर्तव्यविमूढ़ से वहां खड़े रहे फिर तेज कदमों से बाहर चले गए। उसके बाद उस दिन मेरी किसी से कोई बात नहीं हुई, एक ठोस खामोशी चारों तरफ तनी रही। रात को मम्मी खाना बिना एक भी शब्द बोले मेरे पास रख गयीं और खा लेने के बाद खाली बर्तन उठा कर ले गयी। सब ऐसा व्यवहार कर रहे थे जैसे किसी का एक्सीडेंट हो गया हो या कोई मर गया हो।

अगले दिन सुबह में उठा तो देखा पापा बाहर क्यारी और गमलों में पानी दे रहे थे। बोगनविलिया, सदाबहार, मोरपंखी के पत्ते, तने और फूल सब पानी से धुल कर चमक रहे थे, उन पर धूप के कुछ बेतरतीब टूकड़े बिखरे हुए थे। निगाह ऊपर उठायी तो देखा बंदरों के कुछ बच्चे सामने की छत पर तने तारों पर धमाचैकड़ी कर रहे थे। इतनी देर में मम्मी चाय का गिलास लेकर कमरे में आ गयीं, मुझे पकड़ाया और मेरे पास कुर्सी खींच कर बैठ गयीं। कुछ देर तक शांत रह कर उन्होंने अपने शब्दों को जमा किया और यथासंभव संयत स्वर में बोलना चालू किया, ‘‘बेटा, तुम समझदार हो, इतना पढ़ते-लिखते हो, अच्छी खासी उम्र पार कर चुके हो फिर ऐसी हरकत की तुमसे कैसे हो गयी?’’

‘‘कौनसी हरकत?’’, मैंने जानबूझ कर अनजान बनते हुए कहा।

‘‘तुम जानते हो बेटा, मैं क्या कह रही हूं! अनजान बनने की कोशिश मत करो। काया या जो भी उसका नाम है, यहां काम करने आया था और इससे ज्यादा कुछ नहीं। तुम नहीं जानते क्या इस तरह के लोग कैसे होते हैं?’’

‘‘कैसे होते हैं मम्मी? क्या फर्क होता है उनमे? क्या उनके शरीर में दिल से खून पम्प नहीं होता?’’

‘‘हे भगवान! तुम कैसी पागलपन की बातें कर रहे हो? मैंने सिर्फ सुना था कि ऐसे लोग बड़ी आसानी से लोगों को फंसा लेते हैं, लेकिन तुमको? मुझे भरोसा नहीं हो रहा????’’

‘‘कोई किसी को नहीं फंसा रहा मम्मी, उसे मुझे फंसा कर क्या मिलेगा?’’

‘‘ऐसा तुम समझते हो, क्योंकि तुम्हें लगता है दुनिया बस तुम्हारे पलंग के पैताने और सिरहाने के बीच खत्म हो जाती है। लेकिन हकीकत ये है कि दुनिया कमीनेपन और धूर्तता से भरी है जिसे तुम जैसे दिमागी रूप से बच्चे नहीं समझ सकते। अगर ये किताबे पढ़ कर अकल आती होती तो बड़ी-बड़ी लाइबे्ररियों में अक्ल फर्श पर बहती रहती। मैं समझती गयी हूं कि तुमसे बात करना बेकार है, तुम्हारी हालत तो ऐसी है कि किसी ने प्यार के दो बोल बोले और तुम उस पर निहाल हो जाआगे। जब परिणाम भुगतने का समय आएगा तो सिर्फ तुम नहीं रोओगे साथ में हमें भी रोना होगा। इसलिए अब हमें खुद देखना होगा कि हम क्या करें। तुम बस इतनी कृपा करो कि काया का फोन आए तो मत उठाना!’’, मां ने झटके से कुर्सी पीछे की और खाली गिलास उठा कर कमरे से बाहर निकल गयी।

मम्मी की बात से मुझे उम्मीद हो गयी कि काया फोन कर सकती है। मैंने फोन को पास सरका कर रख लिया और इंतजार करने लगा शायद उसका फोन आ जाए। उसके बाद हमारे बीच खामोशी और सघन हो गयी। दिन भर मेरी किसी से बात नहीं हुई। मैंने दोस्तोव्योस्की की ‘बोड़म’ उठा कर पढ़ने की कोशिश की लेकिन मन नहीं किया, कीट्स और बायरन की कविताओं में दिमाग लगाने की कोशिश की लेकिन वो भी बेकार रहा। आखिरकार मैंने किताबों को समेट दिया और राइटिंग बोर्ड उठा कर कुछ लिखने की चेष्टा की लेकिन काफी देर तक पेन हाथ में घुमाने के बाद भी जब कुछ नहीं लिख पाया तो राइटिंग बोर्ड भी उठा कर रख दिया। और मसनद पर सर टिका का छत को घूरने लगा।

काया का ख्याल लगातार मेरे दिमाग में था। हो सकता है सच में वो मुझे बेवकूफ बना रही हो। लेकिन उससे क्या फर्क पड़ता है? इस बहाने कुछ समय उसके साथ रहता हूं, उसके साथ की आत्मीयता को सिप ले-ले कर तसल्ली से पीता हूं, उसे अपनी सुनाता हूं, उसकी सुनता हूं, उसके स्पर्श को ठंड से जकड़े हाथों पर पड़ती गुनगनी धूप की तरह और धूप से जलती पीठ पर बर्फ के टुकड़े की तरह महसूस करता हूं। लेकिन वो काॅल तो करे!!

कई काॅल आए, टेलीफोन के बकाया बिल के बारे में, इन्श्योरेंस करवाने के लिए, यहां तक कि रांग नंबर भी आया लेकिन काया का फोन नहीं आया। मेरी किसी से कोई बातचीत नहीं हुई। मैं पूरे दिन कमरे में अकेला रहा, कभी छत को ताकता तो कभी किसी दीवारों पर ख्यालों की तरह रैंगती छिपकलियों को देखता रहा। मम्मी-पापा कोई भी मेरे कमरे में नहीं आया, बस मम्मी चुपचाप खाना रख गयीं। ढीला-सा उदास दिन सीलन भरी दीवार की पर्त की तरह उखड़ कर गिर गया। रात के खाने के बाद लेट गया। लाइट बंद कर ली। लाइट बंद करते ही बाहर आसमान अचानक चमक से उठा जैसे इंतजार कर रहा हो कि कब मैं लाइट बंद करूं और अपनी लाइट जलाए। चांद तो कहीं नहीं दिख रहा था लेकिन चांदनी चारों तरह फैली हुई थी और ढेर सारी चांदनी खिड़की से बह-बह कर अंदर आने लगी और फर्श पर बिखर गयी। 

Monday, June 2, 2014

काया नहीं तेरी - 2

उपन्यास अंश -

सैंकड़ो साल पहले कबीर को कैसे पता चल गया कि काया मेरी नहीं है? और मैंने कबीर से पूछा कब कि बताइए काया मेरी है या नहीं जो उन्होने मुझे जवाब दे दिया कि काया नहीं तेरी? और काया मेरी क्यों नहीं? सिर्फ इसलिए कि कोई नहीं चाहता कि काया मेरी हो?

हद है काया अगर मेरी हो तो किसी को क्या तकलीफ है? अरे मेरा उनसे लेना नहीे, देना नहीं, मैं अपनी जिंदगी जैसी भी है खुद जी रहा हूं, उनकी जिंदगी जैसी है वो जी रहे हैं, मैं कोई उनसे जिंदगी एक्सचेंज करने को तो कह नहीं रहा। क्या मैं किसी के मुंह का निवाला छीन रहा हूं? किसी के जीने में बाधा डाल रहा हूं, किसी तरह से तंग कर रहा हूं? उनकी दीवार पर जाके मूत रहा हूं? आखिर परेशानी क्या है? उनका मुझसे कोई सरोकार नहीं है, उनको मेरी परेशानियों से कुछ मतलब नहीं है लेकिन अगर मेरी खुशी का कहीं से कोई कारण बनता है तो उनके माथे पर बल पड़ जाते हैं। विकलांग होकर इस तरह जीना चाहता है? हंसना चाहता है, खेलना चाहता है, पढ़ना चाहता है, प्रेम करना चाहता है? अरे हम अपने बीच सांसे लेने दे रहे हैं, और तू उंगली पकड़ कर पहुंचा पकड़ना चाहता है? अरे जिंदा है ये क्या कम है कि जो अपने शरीर के हर अंग को महसूस करना चाहता है? विकलांग बस जिंदा रहें यही बहुत है, खाने को मिल रहा है, शरीर ढकने का मिल रहा है, सर ढकने को छत है, ढेर सारी दया मिल रही है ... यही औकात से बढ़ कर है, प्रेम, सेक्स, मित्रता, सम्बन्ध, भावनाएं जैसी विलासताओं के बारे में सोचना भी महापाप है। धर्म ग्रन्थ पढ़ो, अपने पूर्व जन्म के किए पापों के लिए भगवान के सामने गिड़गिड़ाओ कि अगले जन्म में तुम्हारे पापों का दण्ड नहीं मिले और तुम सामान्य शरीर के साथ जन्म ले सको।

चलो दूसरों का तो समझ आया लेकिन मेरे अपने घरवाले? मेरे माता-पिता जो मेरा मुंह देख कर जीते हैं, सुबह से शाम तक सिर्फ मेरे बारे में ही सोचते हैं, अपनी मौत से ज्यादा इस बात से घबराते हैं कि उनके मरने के बाद मेरा ख्याल कौन रखेगा, उनको काया से क्या तकलीफ है? उनको मालूम है काया के पास होते ही मेरा पूरा वजूद थिरकने लगता है, मैं अपनी देह के बंधन से मुक्त होकर अनंत की सैर करने लगता हूं, कभी बर्फ से ढकी चोटियों पर फिसलने लगता हूं तो कभी घास के बड़े-बड़े मैदानों में लोट लगाने लगता हूं, कभी समुद्र की मदहोश लहरों पर तैरने लगता हूं तो कभी ठंडी रेत के टीलों में धंसने लगता हूं, कभी पखेरू की तरह किसी ऊंचे पेड़ पर जा बैठता हूं तो कभी फूलों की घाटी में उतर कर खुद भी एक फूल बन कर एक नाजुक-सी डाली पर उग आता हूं।

फिर भी उन्होंने अपनी पूरी ताकत इस बात के लिए झोंक रखी है कि मैं किसी भी तरह काया से नहीं मिल पाऊं। काया को अपमानित करने, मुझे कोसने से लेकर जादू-टोना तक करवाने के हर तरह के उपाय उन्होंने आजमा लिए हैं। काया की रीढ़ गली हुई नहीं है, उसने मुझसे मिलना छोड़ दिया है। मैं जानता हूं भले वो और किसी से भी प्यार करती होगी लेकिन जब कभी वो अकेली होती होगी तो एक आंसू तो मेरे नाम का बनता है यार! माना कि मैं विकलांग हूं लेकिन क्या दिल, भावनाएं, सोच, विचार भी विकलांग होते हैं? ये सब सीमित हो सकते हैं लेकिन विकलांग नहीं। हो सकता है मुझे सामान्य लोगों की तरह रिश्ते बनाने का हक नहीं है लेकिन अपने को सुलगाने, भीतर-ही-भीतर अपने को सेकने का हक तो मुझे भी है। शायद मेरे भीतर का यह दर्द ही रिस कर मेरी हड्डियों में आ गया है।

सोचने की जरूरत नहीं, बिना सोचे बता सकता हूं कि पहली बार काया से कब मिला था। बाथरूम के टूटे हुए फर्श की मरम्मत के लिए आयी थी। उसका नाम कई बार सुना था लेकिन कभी किसी ने उसे देखा नहीं था। किसी को उम्मीद नहीं थी कि वो हमारे घर आएगी, जिससे टाइल खरीदी थीं उसी से किसी बढि़या फर्श बनाने वाले को भेजने की कही थी और उसने काया को भेज दिया। उसे देखते ही सब सन्न रह गए। ये तो कोई नहीं कह सका आप वापिस चले जाओ लेकिन सब को धक्का सा लग गया और सब यही सोचने लगे कि किसी तरह जल्दी से काम खत्म हो और वो यहां से टले।

जैसे ही पहली बार हमारी नजरें एक-दूसरे से टकराईं उसने एक बड़ी गहरी मुस्कान के साथ मेरी ओर देखा। मैं व्हील चेयर पर था इसलिए काफी कमफर्टेबल था क्योंकि अगर व्हील चेयर पर न होउं तो सामने वाले पता नहीं चल पाता कि मैं विकलांग हूं और फिर उसके सामने चलने फिरने में दिक्कत होती है। लेकिन व्हील चेयर पर होने पर देखते ही पता चल जाता है कि मेरे साथ कुछ समस्या है और फिर कुछ छुपाने जैसा नहीं रहता।

उसकी गहरी मुस्कान एक नर्म, मासूम नश्तर की तरह मेरे भीतर उतर गयी। शायद आज से पहले कोई मुझे देखकर इस तरह मुस्कराया ही नहीं। मैं देर तक उसे देखता रहा। अद्भुत थी वो, अनूठी ... न जाने औरत थी या मर्द!! एक पुरुष की देह में कैद एक औरत की आत्मा्! आधी-अधूरी नहीं बल्कि एक भरपूर औरत, जो अपने औरतपने के हर क्षण को पूरी तरह जीना चाहती थी, बिना किसी शर्म या हीन भावना के। उसकी सोच ने उसके शरीर पर भी अपनी छाप छोड़ दी थी, उसके पूरे व्यक्तित्व में एक ऐसी कमनीयता, नारीत्व का ऐसा गहरा अहसास था जो मुझे कई बार पूरी औरतों में नहीं दिखता।

हाथों में चूडि़यां, कानों में बुंदे और बलखाती लटें, वाकई वो बला की खूबसूरत थी, कम-से-कम मुझे तो लगती ही थी। तराशी हुई तीखी नाक के नीचे पतले होठों पर लगी हुई लाल लिपिस्टिक और डिजायनर चूड़ीदार और सलवार। चाल में एक नाजुक लचक और बोलने में अद्भुत मिठास। इस बात को कहने में मुझे कोई हिचक नहीं है कि उसे देखते ही मुझ पर जो असर हुआ वो अब तक किसी को देख कर नहीं हुआ। जैसे किसी क्यारी में बहुत दिन से किसी ने पानी न डाला हो, मिट्टी चटक गयी हो, खरपतवार भी जल कर मर गयी हो, कैंचुए भी या तो मर गए हों या भाग गए हों, और फिर अचानक उसमें कोई ठंडा पानी उगलता हुआ पाइप लगा दे।

मैंने उसके बारे में पहले सुन रखा था लेकिन जो कुछ मैं जानता था उसका उसकी वास्तविकता से कोई नाता नहीं था। वह क्या है, कौन है यह मैंने उससे मिल कर ही जाना। कभी भी किसी इंसान को उन बातों से नहीं जाना जा सकता जो उसके बारे में होती हैं, और काया को तो बिलकुल ही जाना जा सकता। हमारी शुरूआती बातें जब चालू हुईं जब पत्थर लगाने वाले मजदूरों, मिस्त्रियों की निगरानी खड़े-खड़े करते हुए उसकी टांगे दुख जाती और कुछ पल सुस्ताने के लिए वो पानी का गिलास लेकर मेरी चारपाई के किनारे पर बैठ जाती थी।

‘‘किताबें आपके सिरहाने रखी रहती हैं!! मतलब आपको पढ़ने का शौक है? मुझे भी किताबें अच्छी लगती हैं लेकिन मैंने ज्यादा कुछ पढ़ा नहीं है।’’, वह अपनी उसी आत्मीय मुस्कान के साथ बात करती थी।

‘‘हां, मुझे किताबों से बहुत प्रेम है, पढ़ भी नहीं रहा हूं तो सिर्फ उनके पास होने से ही मुझे अच्छा लगता है। आपको पता है किताबों से खुशबू आती है, पन्नों की भी और शब्दों की भी!!’’, मैं तो बोलने के लिए तैयार ही बैठा था। किताबों के बारे में बात करने वाला मुश्किल से ही मिलता है।

‘‘आप बाहर क्यों नहीं आते-जाते? आपका मन बहलेगा और लोगों मिलना-जुलना भी होगा? पहले मुझे भी किसी से मिलना अच्छा नहीं लगता था, महीनों कमरा बंद करके बैठे रहती थी। लेकिन फिर मुझे लगा कि भले ही और लोग मुझे देख कर दरवाजे बंद कर रहे हों लेकिन कम-से-कम मुझे तो अपने दरवाजे खोल कर रखने चाहिए।’’

Tuesday, May 6, 2014

काया नहीं तेरी!!

(उपन्यास अंश)

मैंने खिड़की से देखा, बाहर रात काली नहीं दिख रही थी। किसी पके हुए फोड़े की तरह तमतमा रही थी, एक अजीब सी लालिमा उसके कालेपन में घुली हुई थी। कुछ देर तक बाहर देखने के बाद मैंने सोचा अब करवट लेने की कोशिश करनी चाहिए। कई बार गहरी-गहरी सांसे ली, अपने शरीर की पूरी ताकत को समेटा, जैसे ढीले पड़े लकड़ियों के गट्ठर को किसी तरह लपेटा जाए, पलंग के किनारे को हाथ से पकड़ा और सीधे से टेढ़ा होने के एवरेस्ट पर चढ़ने जैसा प्रयास आरम्भ किया। ताकत लगाते ही दर्द पूरे शरीर में बह चला जैसे अचानक कोई धीरे-धीरे करके कोई पुराना खुरंट उखाड़ रहा हो। एक बार मन में आया कि करवट बदलने का विचार त्याग दूं लेकिन मैं रूका नहीं और लगातार करवट बदलने के लिए जोर लगाता रहा। दर्द बढ़ रहा था, मेरी सांस फूल रही थी लेकिन करवट थी कि खत्म नहीं हो रही थी। सोचने की बात यह थी कि मुझे मौत पहले आएगी या करवट? वैसे ये प्रश्न फालतू का था क्योंकि करवट तो में कई बार बदलता था मौत तो एक बार भी नहीं आयी?

    आखिरकार करवट बदल गयी, कब बदली मुझे नहीं पता चला लेकिन करवट बदलते ही जैसे ही शरीर को ढीला छोड़ा दर्द एकदम गायब हो गया। सांस भी तेजी से सामान्य होने लगी, बस हल्के-हल्के दिल की धड़कन महसूस हो रही थी जैसे दिल ढीला हो गया हो और धड़कता हुआ इधर-उधर लुढ़क रहा हो। हद है! क्या बीमारी है? इसे मेरे हिलने-डुलने ही शिकायत है? मेरा शरीर न हुआ हमारा समाज हो गया, जो यथास्थिति का हद दर्जे का दीवाना है और जरा सा हिलाना-डुलाने पर बौखला जाता है।

वैसे क्या बीमारी होगी? डाक्टर ने कहा है कि पोलियो के कारण चल न पाने से मांसपेशियां अपनी ताकत खो बैठी हैं। कमाल है ताकत खो बैठी है तो इस जरा सा जोर डालते ही यूं हाहाकार-सा क्यों मचा देती हैं? मांसपेशियां ताकत खो बैठी है या अब चला-चली की बेला आ गयी? अभी तो कुछ जिया भी नहीं और सब खत्म होने का समय आ गया? अभी तक मैंने किस-किस चीज का अनुभव नहीं किया? अरे अभी तो कुछ भी नहीं किया .... सेक्स का अनुभव नहीं किया, इन दो कमरों के बाहर की दुनिया नहीं देखी, न जाने कितनी किताबें अभी तक नहीं छुई तक नहीं, कितने लोगों से मिलना रह गया है ..... वैसे अगर मौत आने का टाइम आ गया तो क्या करना चाहूंगा? सेक्स करना? लेकिन किससे? अरे जब मरने से पहले सिर्फ एक बार पता करना हो कि सेक्स क्या होता है तो क्या फर्क पड़ता है किससे? या जर्मेन ग्रीयर से मिलना? या 100 ईयर आॅफ साॅलिट्यूट दुबारा पढ़ना? इन्हीं सब बातों के बारे में सोच रहा था कि सच में मौत आ गई ..... पेट की निचले भाग में भोंथरी सी सुई चुभने का अहसास हुआ और उसी के साथ पिशाब का दबाव महसूस होने लगा।

ये सच में जीवित मौत है, बाथरूम तक जाना और फिर दुबारा बिस्तर पर चढ़ना। कई बार मुझसे कहा है कि बिस्तर पर ही फारिग होने का इंतजाम कर देते हैं लेकिन मैंने ही इंकार कर दिया। मैं उसके पाश्र्व प्रभावों से भलीभांति परिचित था, मम्मी-पापा जो अपना काम ही इस बुढ़ापे में जैसे-तेसे ढेल कर कर रहे हैं वो वो मुझे बिस्तर पर मूतने का इंतजाम कैसे कर पाएंगे।

कठोर प्रयासों के साथ एक-एक सेंटीमीटर का सफर करते हुए बाथरूम तक जाना और फिर वहां एक सीढ़ी चढ़ना और नाली तक पहुंचना। मुझे जमीन पर लेट कर जाने में भी कोई आपत्ति नहीं है, क्योंकि कोई मुझे नहीं देख रहा है लेकिन लेट कर तो एक-एक मिली मीटर भी नहीं घिसट पाउंगा। दर्द, फूलती सांसों और साथ छोड़ती मांसपेशियों के साथ ऐसा लगता है कि मेरे पेट के निचले भाग में कोई टाइम बम फिट है और किसी भी तरह उसे सही जगह पर पहुंचने से पहले फटने से बचाना है। यदा कदा उसमें से चिंगारी फूटती रहती हैं लेकिन फिर भी मुझे उसके विस्फोट को रोकना होता है।

दुबारा पलंग पर आकर लेटा तो लगा एक पूरा जीवन बीत गया, जिसमें दर्द, कष्ट, परेशानियां, असफलताएं, सफलताएं सब कुछ था। बिस्तर पर चढ़ने का आखिरी क्षण तो पूरा रोमांचक होता है जिसमें कई प्रयासों के बाद सफलता हाथ लगती है। दिमाग विचारशून्य हो गया हो गया और मुझे इस बात का अफसोस होने लगा कि किस तरह हम अपने जीवन को टेक फाॅर ग्रान्टेड ले लेते हैं? कहीं दर्द नहीं हो रहा और हम अपने दैनिक काम खुद कर ले रहे हैं क्या जीने के लिए इससे बड़े किसी सुख की आवश्यकता है?

अब जितनी जल्दी हो सके नींद आ जानी चाहिए, ताकि ये रात बीत सके। लेकिन अभी दवाई खानी है, मम्मी ने गिलास में पानी भर कर रख दिया है। थोड़ा टेढ़ा हूं इस तरह से दवाई खायी जा सकती है। स्लो मोशन में दवाई मुंह में डाली और पानी मुंह में उड़ेला, थोड़ी गड़बड़ हो गयी और जितना पानी मुंह के अंदर गया उतना ही बाहर आ गया।

‘‘शिट्!!’’ बिस्तर गीला हो गया और दवा की गोली मुंह में ही घूम कर रह गयी। गोली की कड़वाहट मुंह में घुल गयी और जीभ के पीछे तक कसैला हो गया। दुबारा पानी मुंह में उड़ेलना रिस्की हो सकता है गोली को यूंही निगलने की कोशिश करनी होगी। उंगली से गोली पीछे धकेली, निगलने की एक-दो कोशिश कीं और गोली चुपचाप अंदर चली गयी।

अब आराम से लेट सकते हैं और नींद का मौत की तरह इंतजार कर सकते हैं। देखते हैं पहले कौन आता है? वैसे दोनों में फर्क क्या है? सिर्फ इतना कि एक पास जाते समय हमें भरोसा होता है कि हम फिर इस बेतुके, अर्थहीन संसार में लौट कर आएंगे। आखिर कितने महीन अदृश्य आकर्षण के धागे से बंधे हैं हम इस संसार से, ये महीन धागे बार-बार हमें इस संसार में लौटने के लिए मजबूर करते है। बड़े-बड़े तूफानों को झेल जाना वाला ये धागा कई बार हल्के से छूने भर से टूट जाता है और फिर हम इस संसार में लौटने की अंतहीन लालसा से मुक्त हो जाते हैं।

सुबह चेहरे पर पड़ती चमकती धूप जिंदगी में वापस ले आयी। शायद मम्मी खिड़की का पर्दा खींचना भूल गयीं, वर्ना सुबह उठते ही पहले वो खिड़की का पर्दा खींच देती हैं। पापा टहल कर लौट आए थे और गेट के पास अपनी चप्पल झाड़ रहे थे। मम्मी का टहलना तो बंद हो चुका है, पापा भी कितने दिन तक अपने जबाव देते घुटनों के साथ टहर पाएंगे ये देखने की बात है। आते ही हमेशा की तरह पापा अपने बाबा आदम के जमाने के टू-इन-वन के पास पहुंच गए और वही भजन लगा दिया जो रोज सुबह मेरी जिंदगी हराम करता है।

‘‘काया नहीं तेरी .....’’ कबीर को मुझसे क्या दुश्मनी थी जो रोज सुबह पापा के साथ मिल कर मुझे चिढ़ाता है? ऊपर से ये भीमसेन जोशी, जिनकी आवाज हड्डी, मांस, मज्जा सब पार करके सीधे भीतर उतर जाती है। मुझे आज तक ये नहीं समझ आया कि पापा जानबूझ कर मुझे चिढ़ाने के लिए ये भजन लगाते हैं या उनको कभी इस बात का ध्यान ही रहता कि इस भजन में क्या कहा जा रहा है?

क्रमशः

Monday, February 17, 2014

रेल गाड़ी, रेल गाड़ी.... बीच वाले स्टेशन बोले…

बचपन में कभी रेल यात्रा पर निबंध नहीं लिख सका सोचता हूं आज इसे लिख डालूं! सुना है रेलवे विश्व का सबसे बड़ा नियोक्ता है और भारत का दिल पटरियों की खट-खट से ही धड़कता है। रेल यात्रा के आकर्षण ने इतना मजबूर कर दिया कि मैं रेल यात्रा के लिए उतारू हो गया। शुरुआत में ही टिकटों का मजेदार खेल देखने को मिला जब विकलांग प्रमाणपत्र रद्दी कागज साबित हुआ और पता चला कि छूट लेने के लिए तो कोई और प्रमाणपत्र होता है। फिर भी, यात्रा तो करनी ही थी! आखिर कुछ पाने  के लिए कुछ खोना भी पड़ता!!



आगरा के ब्रिटिश काल की याद दिलाते, ठंडी हवाओं से सिहरते फोर्ट स्टेशन पर रेल के इंतजार में माशुका के इंतजार से कम गरमाहट नहीं थी। वैसे स्टेशन पर आते समय भी ब्रिटिश काल के दर्शन हो गए थे जब किन्हीं एडीजी साहब के लिए स्टेशन के पास वाहन ले जाना रोका जा रहा था। इंतजार के बाद, थोड़ी सी लेट, धड़धड़ाती, हॉर्न बजाती, असीम ताकत से भरी रेल प्लेटफार्म पर आकर लगी तो मैं अपलक उसकी खूबसूरती निहारता रह गया। लेकिन जब बात व्हील चेयर चढ़ाने की आयी तो लगा कि रेल जी बेवजह ही नाराज है। सिर्फ एक लकड़ी के पटरे की व्यवस्था स्टेशन पर कर दी जाए तो व्हील चेयर सहज ही अंदर चढ़ जाएगी। लेकिन क्या कर सकते हैं संवेदनशीलता अभी सरकारी मशीनरी के लिए मंगल ग्रह पर बस्ती बसाने जैसा है। लेकिन इस बात पर किसी पर उंगली उठाना बेकार है, हमारे भीतर भरा संवेदनहीनता का पस जरा से अधिकारों का दबाव पड़ते ही चूने लगता है।

व्हील चेयर जैसे-तैसे चढी़ तो पता चला कि एसी डिब्बे में आप व्हील चेयर से अपनी बर्थ तक नहीं पहुंच सकते। अरे भाई विकलांग लोग कोई एसी में यात्रा नहीं करते है, उनके लिए अलग से डिब्बा लगता है न, उसमें जाइए। जब व्हील चेयर ले जाने के सभी प्रयास विफल हो गए तो आखिरी हथियार के तौर पर अपने रथ से कूद कर पार्थ को रण भूमि में आना पड़ा। सुबह के समय कुछ सोए, कुछ अधसोए लोग रेल के अंदर एक अजीब प्राणी को देख कर अचानक अचकचा गए। खैर, बर्थ तक पहुंच गए और ताजपोशी कर ली। उसके बाद समस्या थी कि व्हील चेयर कहां रखी जाए। कोच अटेंडेंट से जब यह प्रश्न किया तो पता चला वो एनलाइटेन्ड बंदा था। उसने सधे हुए स्वर में कहा - जब आप लाए हैं तो आप ही देखिए कि कहां रखी जाए। जीवन का यह सत्य तो बुद्ध भी नहीं बता पाए थे। उसके द्वारा दिए ब्रह्म सूत्र को कंठस्थ रखते हुए किसी तरह सीट के नीचे व्हील चेयर घुसायी और लोगों के आने-जाने का मार्ग बनाया।

परन्तु जब रेल चली तो उसकी लयबद्ध धमक और चाल से मन प्रसन्न हो गया। लगा कि वाकई रेल में कुछ ऐसा है जो दूसरे वाहनों में नहीं है। लोहे के लिबास में एक विराटता है जो पहियों पर अपनी मस्ती में दौड़ती जा रही है। उसकी ताकत के आगे बाधाएं खुद ही रास्ते से हट जाती हैं। वो जमीन से जुड़ी भी है और आजाद भी है।



चलने के कुछ देर बाद से ही जब वैंडरों ने चक्कर काटने शुरू किए तो पैन्ट्री कार में स्वच्छता और हाइजिन के पालन के बारे में सुनी हुई अनेक रोमांचक कथाएं याद आ गयी। लेकिन फिर भी रेल में यात्रा करना और पैन्ट्री कार का खाना नहीं खाना वैसे ही जैसे मंदिर जाना और प्रसाद नहीं ग्रहण करना। इसलिए ऑर्डर किया और और पूरे श्रद्धा भाव से खाया, बिना मन में कोई नकारात्मक भाव लाए हुए। ये अलग बात है कि ब्रेड में मक्खन खोजना पड़ा और कटलेट में स्वाद। कॉफ़ी पता नहीं किस पानी से बनी थी लेकिन फिर भी पीने में ठीक थी। कुल मिला कर मजा आया।

जैसे-जैसे रेल लेट होने के बावजूद गंतव्य के पास पहुंच रही थी मन में चिंता घर कर रही थी। मेरे पास समर्पित भतीजे-भतीजियों की एक छोटी सी सेना थी लेकिन उस सेना के लगभग सभी सिपाही घायल हो रखे थे। किसी का कुछ दिनों पहले ही प्लास्टर उतरा था तो किसी को रेल यात्रा के दौरान ही नाखुन  में चोट लग गयी थी, तो कोई स्पोन्डेलाइटिस का शिकार था। लेकिन मैं मन-ही-मन यह सोच कर अपने को सांत्वना दे रहा था कि कई युद्ध घायल सेनाओं ने भी जीते हैं।

व्हील चेयर तक पहुंचने के बाद उस पर बैठना और फिर उसे नीचे उतारने के लिए अच्छी खासी मसल पॉवर की जरूरत थी। इस सब को देखते हुए सोचा कि कोच अटेन्डेंट से बात कर ली जाए लेकिन वो गालिब के मुरीद थे, काफिर मुंह से लगी है ऐसी कि छूटती ही नहीं वाले, चलती रेल के मयखाने में अपने जाम के साथ खोए हुए थे। फिर सोचा चलो टीटी से इस बारे में कुछ चर्चा कर ली जाए। उन्होंने दार्शनिक अंदाज में पूछा कि उतरने में आपको दिक्कत क्यों है? क्या पहली बार रेल में यात्रा कर रहे हैं या आपके पास लगेज़ ज्यादा है। उनसे पूछा कि स्टेशन पर रेल कितनी देर रुकती है तो उन्हें बड़ी नम्रता से कहा मुझे नहीं पता। जब उन्हें यह बताया गया कि इन्टरनेट पर वहां सिर्फ पांच मिनट रुकना दिखा रहा है तो क्या चालक या गार्ड से सम्पर्क करके उसे कुछ देर और रुकाया जा सकता है क्योंकि उतरने में इससे ज्यादा समय लग सकता है और यदि उतारते समय रेल चल पड़ी तो गंभीर दुर्घटना हो सकती है। इस पर टीटी जी ने गंभीर मुद्रा बनायी और कहा - नहीं यह तो असंभव है, रेल को एक मिनट भी अधिक समय तक नहीं रुकाया जा सकता! आप पहले से दरवाजे के पास पहुंच जाइए।

खैर, फिर सेना अलग-अलग दिशाओं में दौड़ी और पता करा कि कहां-कहां से सहायता मिल सकती है। पता चला रेल में कुछ प्राइवेट कोच अटैन्डेंट भी होते हैं जो भारतीय रेल के कर्मचारी होने की बीमारी से ग्रस्त नहीं होते। उनमें से एक सहर्ष सहायता के लिए तैयार हो गया। एक-दो अनजान यात्री स्वयं ही तैयार हो गए और कह दिया कि किसी भी तरह की चिंता करने की जरूरत नहीं है। यहां तक मेरी सेना के जिस कमांडर के हाथ का प्लास्टर अभी ही उतरा था उससे कह दिया कि तुम्हें हाथ लगाने की भी जरूरत नहीं है। पैन्ट्री कार से सामान लेकर पूरी रेल में पहुंचाने वाले ने भी अपनी भुजाओं की शक्ति का प्रदर्शन करते हुए स्टेशन आने से पहले ही एक बार में व्हील चेयर पर बैठा दिया। जब स्टेशन आया तो पता ही नहीं चला कि व्हील चेयर कब प्लेटफार्म पर उतर गयी। उन यात्रियों का आभार प्रकट करने के लिए गरदन घुमायी तो देखा वो बिना धन्यवाद की प्रतीक्षा किए भीड़ में खो चुके थे।