Tuesday, October 10, 2017




प्रिय अज्ञात बेटी,

सबसे पहले तो तुम्हारा शुक्रिया कि तुमने मुझसे यह सब चर्चा की और मुझे इस योग्य समझा, मुझे यह सब सोचने-समझने का मौका मिला और जिन्दगी को जरा और नजदीक से देखने का अवसर प्राप्त हुआ| मैं शुरुआत में ही क्षमा मांग लेता हूँ कि आगे मेरी लिखी कोई बात तुमको बुरी लगे या गलत लगे तो मुझे माफ़ कर देना और भरोसा रखना कि मेरी भावना तुमको चोट पहुँचाने की कदापि नहीं है और मैं तुम्हारे प्रति पूरा सम्मान और स्नेह रखते हुए अपनी बात कह रहा हूँ|

सबसे पहली बात तो यह कि मुझे संदेह है कि मेरी बातों से तुम सहमत हो पाओगी, मेरी ज्यादातर बातों को सुनते ही तुम्हारा मन और मस्तिष्क उनके जवाब सोचने लगेगा और अपनी वर्तमान सोच से हिलने की बजाय उसी में टिके रहने के लिए कोशिश करेगा और उसे सही ठहराने के जतन करेगा| ऐसा तुम्हारे साथ नहीं हम सब के साथ होता है, बस अगर इस प्रक्रिया को देखा जाए तो फिर हम निरपेक्ष रूप से चीजों को समझने, जानने की दिशा में बढ़ सकते हैं|

मैं फिर दोहराऊंगा कि तुम्हारी उस व्यक्ति पर भयंकर मानसिक निर्भरता हो गयी है| आत्मीयता होना, नजदीकी होना, किसी का साथ पसंद होना अच्छी बातें हैं लेकिन मानसिक निर्भरता खतरनाक चीज है और ऐसा करके हम खुद अपने लिए मुसीबतें बुलाने लगते हैं| जीवन एक बहुत बड़ी चीज है, उसमे बहुत सारे रिश्ते, बहुत सारे लोग, बहुत सारे सुख-दुःख, बहुत सारे काम होते, अनेकों आयाम होते हैं, लेकिन हम अक्सर सब कुछ समेट कर एक ही आदमी से जोड़ लेते हैं| फिर हमारे सारे सुख-दुःख, चिंता-परेशानी, उत्थान-पतन, फायदा-नुकसान सब कुछ उस एक आदमी के साथ हमारे संबंधो पर टिक जाते हैं और हम एक ऐसे दलदल में फंस जाते हैं जिससे निकलने का जितना प्रयास करें उतने ही धंसते जाते हैं| हमारा पूरा जीवन ही उस व्यक्ति के साथ हमारे संबंधो पर टिक जाता है|

हम ऐसा क्यों करते हैं इसके बहुत सारे कारण हैं उनकी चर्चा यहाँ करने का अभी ओचित्य नहीं है बस ये समझ लो कि ऐसा हो जाने पर हमको खुद होश नहीं रहता हम क्या कर रहे हैं और हम इस हद तक चले जाते हैं कि बेरीढ़ हो कर यहाँ तक कहने लगते हैं कि वह मुझे मारे, मुझे डांटे, मुझ पर अत्याचार करे तब भी मुझे अच्छा लगता है| कई बार तो हम खुद ही ऐसे हालात बार-बार पैदा करने लगते हैं कि वह ऐसा करे| फिर हमारा अहम खुद को संतुष्ट करने के लिए तरह-तरह की धारणाएं गढ़ता है, मैं ये हूँ, मैं वो हूँ, मैं उसका ध्यान रख सकती हूँ, मैं ही उसे समझती हूँ, मैं ही उसके लायक हूँ, मैं... मैं..., ऐसा करते हुए मन को पीड़ा के बीच भी सुकून मिलता है कि देखो मैं कितना सही हूँ, वो सामने वाला ही ऐसा है जो मुझे नहीं समझता|

यदि हम इस मानसिक निर्भरता का खेल देखना चाहते हैं और ईमानदार हैं तो एक छोटा सा प्रयोग करके देखें, हम यह सोच कर देखें कि अगर वह व्यक्ति अभी हमारी जिन्दगी से चला जाए तो हम पर क्या प्रभाव होगा? कहाँ से हम खाली हो जायेंगे, कहाँ से हमारे भीतर फंसे हुए हुक खिचने से चोटें उभर आएंगी| तुरंत सब कुछ साफ़ हो जाएगा| एक और बात सोच कर देख सकते हैं कि अगर वाकई मैं उस व्यक्ति से प्रेम करती/करता हूँ तो उसे उसके ढंग से क्यों जीने नहीं देती? मैं क्यों चाहती हूँ कि वह वैसे जिए जैसे मैं चाहती हूँ? प्रेम तो यही चाहता है न कि उसका प्रेम पात्र प्रसन्न रहे? फिर इतनी मांग, कब्जा, दबाव क्यों? अगर कोई गलती भी कर रहा है तो आप उसे सिर्फ बता ही तो सकते हैं, उसके दिमाग के अंदर घुस कर स्नायु तन्त्र को नियंत्रित नहीं कर सकते? अरे इस अखिल विश्व में रेत कण से भी कम हैसियत वाले हम खुद का जीवन देख लें उतना ही बहुत है दूसरे के जीवन को संवारने का अहंकार क्यों पालते हैं!  

इस तरह के जटिल सम्बन्ध हमारी पूरी मानसिक ऊर्जा खा जाते है, उसके बाद हमारे पास इतनी मानसिक ताकत बचती ही नहीं कि हम कुछ कर सकें| कृपया इसे व्यक्तिगत नहीं लेना, ये बात मैं बहुत स्नेह से कह रहा हूँ कि मुझे नहीं लगता इस रिश्ते से उलझते हुए कोई अपनी पढ़ाई, काम वगैरह पर पूरी ईमानदारी पर ध्यान दे पाएगा| तुमने कानून पढ़ा, बार कौसिल में भी आ गयी लेकिन अभी तुम शानदार अंग्रेजी, हिंदी, उर्दू नहीं लिख-बोल सकती, जो भारत में कानून के लिए अनिवार्य है| संविधान, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कानून, धार्मिक-आदिवासी-राज्य क़ानून वगैरह का तुम्हे ज्ञान तो है लेकिन ऐसा नहीं कि उसके बारे में लिख सको, चर्चा कर सको, लोगों को जागरूक कर सको, सलाह दे सको| समाज, धर्म और कानून के जटिल सम्बन्धों पर पर तुमने कितने मौलिक आर्टिकल लिखे? क़ानून की विसंगतियों की और ध्यान दिलाती कितनी फेसबुक पोस्ट खुद लिखी? भारत में कानून में सुधार की जागरूकता के लिए तुमने अभी तक क्या किया? कानूनी जटिलताओं को सरल शब्दों में प्रस्तुत करने के अभी तक कितने प्रयास किए?

यह सब इसलिए हुआ क्योंकि तुम्हारी जबरदस्त मानसिक ऊर्जा का ज्यादातर भाग करवाचौथ, सेवा, पति, शादी, बच्चे, प्यार, मेहँदी, साड़ी, सिंदूर, कर्मकांड, पति मान कर सेक्स किया तो पूजा, पति नहीं माना तो पाप (जैसे छोटे बच्चे जमीन पर घेरे बना कर खेलते हैं- इस गोले में आया तो विन वरना आउट), वो ऐसा क्यों कर रहा, वो वैसा क्यों नहीं कर रहा वगैरह में ही खत्म हो गयी| सिर्फ यही नहीं, न ठीक से सोना, न ठीक से जागना, न अपनी सेहत का ध्यान रखना, न कोई शारीरिक खेल, न योग या व्यायाम करना| मैं यह नहीं कह रहा कि पढ़ाई में तुमने मेहनत नहीं की, मुझे पता है तुम काफी मेहनत से पढ़ती हो लेकिन ज्यादातर मानसिक ऊर्जा जब सम्बन्धो के उखाड़-पछाड़ में लग रही तो कुछ रचनात्मक करना बड़ा मुश्किल हो जाता है|

अब आते हैं दूसरे पहलू की ओर, किसी सम्बन्ध को सिर्फ इसलिए स्वीकार लेना कि- माता-पिता ने कहा है या उसकी हड्डियों के ऊपर जो मांस और खाल चढ़े है वह ऐसा है कि देखने में अच्छा लगता है, उसने जिस गर्भाशय से जन्म लिया है उसे लोग किसी ख़ास जाति का मानते हैं या वह कुछ ख़ास रकम हर महीने कमाता है- भी निहायत मूर्खतापूर्ण चुनाव है| शायद उसमे हम भोग और सामाजिक सुरक्षा पाने के कारण खुश भी रह लें लेकिन जीवंतता कभी नहीं पा सकते|

तो फिर क्या किया जाए? किया सिर्फ ये जाए कि खुद से प्रेम करें, खुद से प्रेम किए बगैर हम दुनिया में किसी से प्रेम कर ही नहीं सकते, भले ही हम कितने भी दावे कर लें या अपनी कलाई पर किसी का नाम लिख कर मर जाएँ| वह प्रेम नहीं है, नहीं है, नहीं है! और खुद से प्रेम करने की क्या निशानी है? सबसे पहली निशानी तो ये कि हम शादी, ब्याह, मेहँदी, साड़ी, पति, प्रेमी, घरवाले वाले सब छोड़ कर अपने को आत्मनिर्भर बनाएं| न सिर्फ अपने पैरों पर खड़े हों बल्कि यह भी देखे कि कहीं मैं मानसिक रूप से किसी की दया पर तो निर्भर नहीं हूँ?

फिर उस ढंग का एक स्पेस क्रिएट करें जहाँ हम रहना चाहते हैं, समाज के प्रति, अपने प्रति, परिवार के प्रति जो मानवीय जिम्मेदारी है उनको पूरा करने लायक बनें, उसके बाद हम अपने संबंधो को देखें और हमें लगता है कि हम को शादी करनी चाहिए तो शादी कर लें, हमको लगता है नहीं करनी चाहिए तो नहीं करें; दोनों के अपने-अपने कुछ पहलू हैं उनको भली-भांति देख कर निर्णय ले लें| लेकिन यह सब हम बिना किसी स्वनिर्मित प्रतिरोध और संघर्ष के करें| जीवन बहुत छोटा है और हर कदम पर चुनोतियाँ हैं इसलिए कम से कम खुद तो अपने लिए मुसीबतें न खड़ी करें| आराम से कोई रिश्ता चलता है तो ठीक, साफ़ नजर आ जाए कि नहीं चलना है तो उसे छोड़ें और उस रिश्ते के छूटने से होने वाले दर्द को जिन्दगी का पाठ समझते हुए खुले ह्रदय से स्वीकारें और आगे बढ़ें| ये भी याद रखें कि सब को मनोवैज्ञानिक सुरक्षा की खोज होती है लेकिन यदि यही खोज हमारे जीवन का लक्ष्य बन जाए तो फिर हमारे संकटों को कोई भी नहीं टाल सकता, हमारा स्वनिर्मित भगवान भी नहीं|

मैंने अपनी सारी बात कह दी है, अब इस पर चर्चा करने को मेरे पास कुछ नहीं है| अगर तुम्हें कोई बात सही लगे तो देखना कि क्या तुम उसे जीवन में उतार सकती हो यदि नहीं लगे तो बकवास समझ कर भूल जाना| तुम इन बातों को स्वीकारो या अस्वीकारो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता, मेरी शुभकामनाएं हमेशा तुम्हारे साथ रहेंगी|

मेरा आशीर्वाद है कि सजग बनो, सशक्त बनो और सोल्लास जीवन व्यतीत करो|
       
तुम्हारा

अज्ञात 

Saturday, January 28, 2017

अभी खत्म नहीं हुआ


एक चीख फाड़ देती है सन्नाटे को
एक दीप चीर देता है अँधेरे को
अभी सब खत्म नहीं है
भीतर का दर्द मोती बन गया है
तुम खोलो तो खुद को
भीतर का उजास बहने को मचल रहा है 

Wednesday, January 18, 2017

रहा किनारे बैठ...


जिंदगी का दरिया बहता रहा
जाने किस मोती की तलाश में किनारे बैठा रहा
पत्तियों ने कई खत लिखे
हवाओं ने कई बार खटखटाया
परिंदों ने भी कई बार बुलाया
मैं जाने क्या करता रहा 

Saturday, January 7, 2017

हिंसा के घेरे में शिक्षा


मनुष्य की विकास यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण चीज शिक्षा ही रही है| अनेक चुनौतियों से गुजरती, नए-नए पायदान चढ़ती, कभी आगे बढ़ती, कभी भटकती शिक्षा आज एक खास मुकाम पर पहुंची है| लेकिन आज भी बहुत बड़ी आबादी के लिए शिक्षा का मतलब सिर्फ कुछ तथ्यों को रट लेना या कुछ धनराशि कमा लेने का जुगाड़ कर लेना ही है| शिक्षा क्या है, इसका उद्देश्य क्या है, इसके तौर-तरीके क्या हैं इस बारे में नई सोच, नए प्रयोग और नई दृष्टि का नितांत अभाव है| इस कारण से शिक्षा से जुड़ी एक बहुत गंभीर समस्या पैदा होती है कि विद्यार्थियों को अनुशासित कैसे किया जाए| खास तौर पर बड़ी कक्षाओं के विद्यार्थियों को| धमकी, शारीरिक दंड और लालच को लम्बे समय से विद्यार्थियों को नियंत्रित करने के लिए प्रयोग किया जा रहा है बिना यह जाने और सोचे कि उसका मानस पर क्या प्रभाव पड़ता है और कैसे हम एक भ्रष्ट और हिंसक समाज के निर्माण में जाने-अनजाने योगदान दे रहे हैं|

सबसे पहली बात तो यह है कि जब शिक्षा को जीवन से काटा गया तभी उसमें हिंसा और जोर-जबरदस्ती की नींव पड़ गयी| बच्चे के लिए जीवन और शिक्षा अलग नहीं होते, दोनों साथ-साथ चलते हैं| अपने पर्यावरण को जानते-समझते, सीखते उसके मस्तिष्क का विकास होता है और उसके परिवार का कर्तव्य होता है कि ऐसा माहौल उपलब्ध कराए जहाँ वह सुरक्षा, सरलता और सहजता से चीजों को सीखे| इसमें कहीं भी हिंसा या जोर-जबरदस्ती के लिए कोई जगह नहीं है| लेकिन इसका मतलब यह नहीं है बच्चे को फूलों पर रखना है और उसे जीवन का सामना करने लायक ही नहीं छोड़ा जाए|

कम्युनिकेशन के सभी आयामों से बच्चे का परिचय जरूरी है जिसमें किसी खतरे के आने पर जोर से की गयी आवाजें भी शामिल हैं| कुत्ते, बिल्ली तक खतरे में अपने बच्चों को आगाह करते हैं तो बिजली के सॉकेट के पास जाते इंसानी बच्चे को भी तेज आवाजों का मतलब समझाना हिंसा नहीं है, न ही उसे आग के पास से हटाकर उसके रोने को धैर्यपूर्वक बर्दाश्त करना क्रूरता है| जरूरत इस बात है कि हम कोई अथॉरिटी पैदा नहीं करें जिसके सामने बच्चे को झुकना हो| हम बच्चे के साथ-साथ सीखते हैं और दोनों जीवन की गुत्थियाँ सुलझाते हुए आगे बढ़ते हैं| हमारे पास कुछ ऐसा नहीं है जो स्पेशल हो और हमें बच्चे को देना हो, उलटे हमें इस बात का विशेष ध्यान रखना है कि हमारी कंडीशनिंग, भय, आदतें और ढर्रे कहीं उसमें ट्रान्सफर न हो जाएँ| हमारे पास बस कुछ तकनीकी जानकारी है जो हमें उसे उपयुक्त तरीके से समय-समय पर देते रहनी है|

अगर अभिभावक अपनी जिम्मेदारी को नहीं निभाते और बच्चे के अंदर समस्याएं घर करती रहें तो ऐसा रूप ले लेती हैं कि बड़ी कक्षा तक आते-आते अध्यापक को उन्हें सम्भालना ही मुश्किल हो जाता है और उसके पास एक ही विकल्प रहता है वह है शारीरिक दंड| विद्यार्थी को मार-पीट कर वह काबू कर लेता है लेकिन इस प्रक्रिया में शिक्षा कहीं पीछे छूट जाती है| लेकिन अगर वह शारीरिक दंड का प्रयोग न करे तो यह विद्यार्थी पूरी कक्षा में अराजकता फैला देते हैं और पढ़ना-पढ़ाना ही मुश्किल हो जाता है| इस समस्या को बड़ी बारीकी और धैर्य से समझना होगा| इसका वास्तविक हल तो इन परिस्थितियों का सामना कर रहे शिक्षक को अपनी समझ, ज्ञान, सहनशीलता और प्रेम से खोजना होगा; यहाँ इस संबंध में सिर्फ कुछ बिन्दुओं पर प्रकाश डाला जा रहा है|

हमारे ज्यादातर शिक्षक पढ़ाने के तरीकों, विद्यार्थी के मनोविज्ञान और इस क्षेत्र में किए जा रहे शोधों के बारे में अनभिज्ञ होते हैं| जीवनयापन के साधन के तौर पर वह अध्यापन को चुन लेते हैं, उनमें न तो शिक्षण की समझ होती है और न अपने काम के लिए पैशन| जैसे-तैसे बला टाल कर उनको अपनी नौकरी निभानी होती है उनसे किसी रचनात्मकता, नए प्रयोग और विद्यार्थी और शिक्षण से प्रेम जैसी चीजों की उम्मीद करना रेत से तेल निकलने की आशा करने जैसा है|
अगर हमारे देश में आमतौर पर व्याप्त शिक्षा प्रणाली पर भी नजर डाली जाए तो उसमें आज भी बाबा-आदम के ज़माने के तरीके ही आजमाए जा रहें हैं| रेडिओ से हम स्मार्ट एलसीडी टीवी तक पहुँच गए लेकिन पढाई के वही तरीके हैं, रटो और परीक्षा में उगल दो| बढ़िया उगल दिया तो पास, कितना सीखा, कितना जाना, कितना नया करने की प्रेरणा मिली वह सब भाड़ में| कहीं सूचनाओं को रटना शिक्षा है तो कहीं शिक्षक की चापलूसी, जुगाड़ और नकल सबसे बड़ी शिक्षा है| इन हालात में अगर किसी विद्यार्थी को पढ़ने में रूचि नहीं है तो इसमें आश्चर्य की बात ही क्या है? इतने उबाऊ, घिसे-पिटे तरीकों से सिर्फ इंसान को कमाने की मशीन बनाने के लिए की जा रही पढ़ाई में सिर्फ औसत विद्यार्थी को ही रूचि हो सकती है| जो भी किसी तरह कि समस्या से ग्रस्त होगा या वाकई में पढ़ना चाहता होगा वह अगर पढ़ाई से भागे तो इसमें आश्चर्य कैसा?

विद्यार्थी सिर्फ कुछ घंटों के लिए अध्यापक के साथ रहता है, उससे ज्यादा समय वही अपने घर-परिवार के साथ बिताता है| अगर घर के सदस्य साथ न दें तो शिक्षक के लिए बड़ा मुश्किल हो जाता है कि वह किस तरह विद्यार्थी को प्रेरित करे और सकारात्मकता से भर सही मार्ग पर लाए| लेकिन फिर भी वह कुछ उपायों पर विचार कर सकता है, जैसे :-

काउन्सलिंग – यह सब से प्रभावी तरीका है| इसके लिए विशेषज्ञ की जरूरत होती है लेकिन अगर विशेषज्ञ न हो तो शिक्षक खुद ही मनोविज्ञान, मानव व्यवहार और असामान्य मनोविज्ञान का अध्ययन करके उन बच्चों कि काउंसिलिंग करे| इसके लिए प्रतिदिन कुछ समय निश्चित करे जबकि वह समस्याग्रस्त बच्चों से बात करेगा| विद्यार्थी के ऐसे व्यवहार का कारण पता लगाना फिर उसका हल खोजना काउन्सलिंग का मूल उद्देश्य है|

संवाद – समस्या से पीड़ित और अनुशासनहीन बच्चों से संवाद टूट जाता है और वे सुनते ही नहीं इसलिए उनसे संवाद नहीं बन पाता| ऐसे बच्चों को अलग-अलग कई सारे अध्यापकों के साथ उनसे संवाद स्थापित करने की कोशिश करनी चाहिए|

खेल – ऐसे बच्चों को खेल में लगाना उपयोगी सिद्ध हो सकता है| उनकी दिलचस्पी का पता लगा कर उनको उस खेल में लगाना उनको अनुशासित करने में सहायक होता है|

योग और ध्यान – योग और ध्यान काफी लाभदायक हो सकता है|

जिम्मेदारी देना – सावधानी से ऐसे बच्चों को थोड़ी-थोड़ी जिम्मेदारी देना उनको अनुशासित करने में मददगार होता है| पढ़ाई के बाहर की जिम्मेदारी देना भी अच्छा प्रभाव डालता है|

विशेष प्रयोग – कुछ मनो-शारीरिक क्रियाएं इन बच्चो की ऊर्जा खर्च करने और फिर उनको शिक्षा देने में सहायक होती है| चीखने, नाचने, रस्साकसी, उछलने, कूदने, रस्सी कूदने, लटके हुए बैग पर घूंसे मारने वगैरह की प्रतियोगिता, अपनी पसंद का कुछ काम करने की प्रतियोगिता वगैरह|

घर-परिवार के सदस्यों से बात|

पढ़ाने के आधुनिक तरीकों का ज्ञान प्राप्त करना और फिर उस ढंग से पढ़ाने के कोशिश|

ग्रुप से टीम की प्रेरित करना – ऐसे विद्यार्थी अक्सर ग्रुप बना लेते हैं इसलिए उनकी ग्रुप से जुड़ी गतिविधियों पर नजर रखी जाए और उनको ग्रुप की भावना की बजाय टीम की भावना सिखाने की कोशिश कि जाए|

कुछ समय के लिए उन पर पढ़ाई का दवाब कम करके उनको दूसरी गतिविधियों में लगाना भी लाभकारी होता है|

ये सारे उपाय सिर्फ संकेत भर हैं| असली काम तो खुद अध्यापक को करना होगा जिसे इन बच्चों से स्नेह है और वह यह जानता है उनके इस तरह के व्यवहार का कुछ कारण है और उनको पढ़ाने का भी एक ख़ास तरीका है बस उस तरीके का पता लगाना है| जब एक स्पेशल एजुकेटर आक्रामक मानसिक विकलांग बच्चों को पढ़ा सकता है तो फिर अपने को शिक्षक कहने वाला इतनी आसानी से हार मान कर मारने-पीटने पर क्यों उतारू हो जाता है| ये कोई आसान काम नहीं लेकिन सिर्फ आसान काम ही किए जाते तो दुनिया में कुछ भी नया, खूबसूरत और बढ़िया नहीं होता|