Monday, February 17, 2014

रेल गाड़ी, रेल गाड़ी.... बीच वाले स्टेशन बोले…

बचपन में कभी रेल यात्रा पर निबंध नहीं लिख सका सोचता हूं आज इसे लिख डालूं! सुना है रेलवे विश्व का सबसे बड़ा नियोक्ता है और भारत का दिल पटरियों की खट-खट से ही धड़कता है। रेल यात्रा के आकर्षण ने इतना मजबूर कर दिया कि मैं रेल यात्रा के लिए उतारू हो गया। शुरुआत में ही टिकटों का मजेदार खेल देखने को मिला जब विकलांग प्रमाणपत्र रद्दी कागज साबित हुआ और पता चला कि छूट लेने के लिए तो कोई और प्रमाणपत्र होता है। फिर भी, यात्रा तो करनी ही थी! आखिर कुछ पाने  के लिए कुछ खोना भी पड़ता!!



आगरा के ब्रिटिश काल की याद दिलाते, ठंडी हवाओं से सिहरते फोर्ट स्टेशन पर रेल के इंतजार में माशुका के इंतजार से कम गरमाहट नहीं थी। वैसे स्टेशन पर आते समय भी ब्रिटिश काल के दर्शन हो गए थे जब किन्हीं एडीजी साहब के लिए स्टेशन के पास वाहन ले जाना रोका जा रहा था। इंतजार के बाद, थोड़ी सी लेट, धड़धड़ाती, हॉर्न बजाती, असीम ताकत से भरी रेल प्लेटफार्म पर आकर लगी तो मैं अपलक उसकी खूबसूरती निहारता रह गया। लेकिन जब बात व्हील चेयर चढ़ाने की आयी तो लगा कि रेल जी बेवजह ही नाराज है। सिर्फ एक लकड़ी के पटरे की व्यवस्था स्टेशन पर कर दी जाए तो व्हील चेयर सहज ही अंदर चढ़ जाएगी। लेकिन क्या कर सकते हैं संवेदनशीलता अभी सरकारी मशीनरी के लिए मंगल ग्रह पर बस्ती बसाने जैसा है। लेकिन इस बात पर किसी पर उंगली उठाना बेकार है, हमारे भीतर भरा संवेदनहीनता का पस जरा से अधिकारों का दबाव पड़ते ही चूने लगता है।

व्हील चेयर जैसे-तैसे चढी़ तो पता चला कि एसी डिब्बे में आप व्हील चेयर से अपनी बर्थ तक नहीं पहुंच सकते। अरे भाई विकलांग लोग कोई एसी में यात्रा नहीं करते है, उनके लिए अलग से डिब्बा लगता है न, उसमें जाइए। जब व्हील चेयर ले जाने के सभी प्रयास विफल हो गए तो आखिरी हथियार के तौर पर अपने रथ से कूद कर पार्थ को रण भूमि में आना पड़ा। सुबह के समय कुछ सोए, कुछ अधसोए लोग रेल के अंदर एक अजीब प्राणी को देख कर अचानक अचकचा गए। खैर, बर्थ तक पहुंच गए और ताजपोशी कर ली। उसके बाद समस्या थी कि व्हील चेयर कहां रखी जाए। कोच अटेंडेंट से जब यह प्रश्न किया तो पता चला वो एनलाइटेन्ड बंदा था। उसने सधे हुए स्वर में कहा - जब आप लाए हैं तो आप ही देखिए कि कहां रखी जाए। जीवन का यह सत्य तो बुद्ध भी नहीं बता पाए थे। उसके द्वारा दिए ब्रह्म सूत्र को कंठस्थ रखते हुए किसी तरह सीट के नीचे व्हील चेयर घुसायी और लोगों के आने-जाने का मार्ग बनाया।

परन्तु जब रेल चली तो उसकी लयबद्ध धमक और चाल से मन प्रसन्न हो गया। लगा कि वाकई रेल में कुछ ऐसा है जो दूसरे वाहनों में नहीं है। लोहे के लिबास में एक विराटता है जो पहियों पर अपनी मस्ती में दौड़ती जा रही है। उसकी ताकत के आगे बाधाएं खुद ही रास्ते से हट जाती हैं। वो जमीन से जुड़ी भी है और आजाद भी है।



चलने के कुछ देर बाद से ही जब वैंडरों ने चक्कर काटने शुरू किए तो पैन्ट्री कार में स्वच्छता और हाइजिन के पालन के बारे में सुनी हुई अनेक रोमांचक कथाएं याद आ गयी। लेकिन फिर भी रेल में यात्रा करना और पैन्ट्री कार का खाना नहीं खाना वैसे ही जैसे मंदिर जाना और प्रसाद नहीं ग्रहण करना। इसलिए ऑर्डर किया और और पूरे श्रद्धा भाव से खाया, बिना मन में कोई नकारात्मक भाव लाए हुए। ये अलग बात है कि ब्रेड में मक्खन खोजना पड़ा और कटलेट में स्वाद। कॉफ़ी पता नहीं किस पानी से बनी थी लेकिन फिर भी पीने में ठीक थी। कुल मिला कर मजा आया।

जैसे-जैसे रेल लेट होने के बावजूद गंतव्य के पास पहुंच रही थी मन में चिंता घर कर रही थी। मेरे पास समर्पित भतीजे-भतीजियों की एक छोटी सी सेना थी लेकिन उस सेना के लगभग सभी सिपाही घायल हो रखे थे। किसी का कुछ दिनों पहले ही प्लास्टर उतरा था तो किसी को रेल यात्रा के दौरान ही नाखुन  में चोट लग गयी थी, तो कोई स्पोन्डेलाइटिस का शिकार था। लेकिन मैं मन-ही-मन यह सोच कर अपने को सांत्वना दे रहा था कि कई युद्ध घायल सेनाओं ने भी जीते हैं।

व्हील चेयर तक पहुंचने के बाद उस पर बैठना और फिर उसे नीचे उतारने के लिए अच्छी खासी मसल पॉवर की जरूरत थी। इस सब को देखते हुए सोचा कि कोच अटेन्डेंट से बात कर ली जाए लेकिन वो गालिब के मुरीद थे, काफिर मुंह से लगी है ऐसी कि छूटती ही नहीं वाले, चलती रेल के मयखाने में अपने जाम के साथ खोए हुए थे। फिर सोचा चलो टीटी से इस बारे में कुछ चर्चा कर ली जाए। उन्होंने दार्शनिक अंदाज में पूछा कि उतरने में आपको दिक्कत क्यों है? क्या पहली बार रेल में यात्रा कर रहे हैं या आपके पास लगेज़ ज्यादा है। उनसे पूछा कि स्टेशन पर रेल कितनी देर रुकती है तो उन्हें बड़ी नम्रता से कहा मुझे नहीं पता। जब उन्हें यह बताया गया कि इन्टरनेट पर वहां सिर्फ पांच मिनट रुकना दिखा रहा है तो क्या चालक या गार्ड से सम्पर्क करके उसे कुछ देर और रुकाया जा सकता है क्योंकि उतरने में इससे ज्यादा समय लग सकता है और यदि उतारते समय रेल चल पड़ी तो गंभीर दुर्घटना हो सकती है। इस पर टीटी जी ने गंभीर मुद्रा बनायी और कहा - नहीं यह तो असंभव है, रेल को एक मिनट भी अधिक समय तक नहीं रुकाया जा सकता! आप पहले से दरवाजे के पास पहुंच जाइए।

खैर, फिर सेना अलग-अलग दिशाओं में दौड़ी और पता करा कि कहां-कहां से सहायता मिल सकती है। पता चला रेल में कुछ प्राइवेट कोच अटैन्डेंट भी होते हैं जो भारतीय रेल के कर्मचारी होने की बीमारी से ग्रस्त नहीं होते। उनमें से एक सहर्ष सहायता के लिए तैयार हो गया। एक-दो अनजान यात्री स्वयं ही तैयार हो गए और कह दिया कि किसी भी तरह की चिंता करने की जरूरत नहीं है। यहां तक मेरी सेना के जिस कमांडर के हाथ का प्लास्टर अभी ही उतरा था उससे कह दिया कि तुम्हें हाथ लगाने की भी जरूरत नहीं है। पैन्ट्री कार से सामान लेकर पूरी रेल में पहुंचाने वाले ने भी अपनी भुजाओं की शक्ति का प्रदर्शन करते हुए स्टेशन आने से पहले ही एक बार में व्हील चेयर पर बैठा दिया। जब स्टेशन आया तो पता ही नहीं चला कि व्हील चेयर कब प्लेटफार्म पर उतर गयी। उन यात्रियों का आभार प्रकट करने के लिए गरदन घुमायी तो देखा वो बिना धन्यवाद की प्रतीक्षा किए भीड़ में खो चुके थे।