Friday, December 27, 2013

अतीत की ओर - 2

सड़क और कार का सम्बन्ध भी विचित्र है, कार सड़क की तलाश में भागती रहती है, उसी के साथ रहती है फिर भी उसके ही पीछे भागती रहती है।


क्या प्यास है?
जितना पियूं उतनी ही भड़कती है!

कुछ घंटो के बाद जब पूरे शहर से बाहर-बाहर ही गुजार देने वाला कानपुर का विशाल फ्लाई ओवर आया तो मुझे उत्तर प्रदेश के इस मानचेस्टर का अतीत याद आ गया। अंग्रेजो के जमाने से कानपुर के व्यापार को तबाह करने की कोशिशें होती रही और आजादी के बाद भी इसके इसके व्यापार की बर्बादी की दास्तान चलती रही। इसके बावजूद भारत के सबसे बड़े औद्योगिक शहरों में यह 9वें स्थान पर है। इसकी भौगोलिक स्थिति बड़ी महत्वपूर्ण है,  यह भारत के कई हिस्सों को सड़क मार्ग से आपस में जोड़ता है, बंगाल से उत्तर प्रदेश और सभी मध्य और दक्षिणी इलाके। यहां ट्रकों की इतनी आवाजाही है कि कई बार तो लगता है कि पूरा शहर ट्रकों से अटा पड़ा है और अहर्निश माल लादने और उतारने में लगा है।

ये ओवर ब्रिज कोई साधारण ओवर ब्रिज नहीं है। आगरा जैसे पूरे शहर की लम्बाई इसके सामने बौनी प्रतीत होती है। इस पर यात्रा करते समय लगता है कि आप बस भाग रहे हैं, और सब कुछ आपके साथ भाग रहा है। बिलकुल जैसे जिंदगी में, सब कुछ पीछे छूटता जा रहा है लेकिन हम समझते हैं कि सब कुछ हमारे साथ चल रहा है।

इस ब्रिज को पार करने के बाद जब आगे बढ़े तो धीरे-धीरे लगने लगा यहां के लोग बड़ी ही धार्मिक प्रवृत्ति के ईश्वर पर अटूट विश्वास करने वाले लोग हैं। हर वाहन चालक उनके लिए एक परमसत्ता का रूप है जो उनके भाग्य के अनुसार उनकी जान की परवाह करेगा। वो सड़क पार करते हैं तो बड़े ही साक्षी भाव से, मात्र सीधे देखते हुए, न दांए, न बाएं। डिवाइडर पर कई बार ‘प्रकृति की पुकार’ का जवाब देने जाते हैं और फिर नाड़ा समेटते हुए एक ही झटके से डिवाइडर से सड़क पर दिव्य आत्माओं की तरह प्रकट हो जाते हैं। ऐसे में अगर जरा सी भूल हुई तो तैयार रहिए कि आस-पास के गांव वालों के हत्थे चढ़ गए तो आपको भी दिवंगत करने की तैयारी कर लेंगे।

लगता वाहन चालकों से ये बैर अंग्रेजों के जमाने की उपज है। अंग्रेज लोग ही पहली बार यहां कारें, जीप वगैरह लाए थे और उन्हें ऐसे कानून बनाए कि कार के नीचे दब कर कोई भारतीय मर जाए तो उन्हें ज्यादा कानूनी लफड़े में न फंसना पड़े। मजेदार बात यह है लगभग यही कानून आज भी लागू हैं। शायद तभी से वाहन चालकों से बैर पैदा हो गया कि अगर कार के नीचे कोई पैदल या साइकिल वाला आए तो सबसे पहले कार वाले को ठोको। वैसे भी आते-जाते किसी पर भीड़ के साथ मिलकर हाथ जमाना हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है। अकेले में कोई भी ऐसा काम करना आसान नहीं है जब तक ये भीड़ वास्तव में या मानसिक रूप से हमारे वजूद पर हावी न हो जाए।

काशी जब सिर्फ 150 किमी रह गया तो सड़क पर लम्बे जाम के दर्शन हुए। गाडि़यों की कतार कितनी लम्बी थी कहना मुश्किल था, जहां तक निगाह जाती बस गाडि़यां ही गाडि़या नजर आती थीं। सारा रास्ता इतनी तेजी से पार हो गया लेकिन इस जाम को देख कर लग रहा था कि ये अब इतने पास आकर भी रास्ता पार करना आसान नहीं है। कहते हैं न -

डुबती हैं कश्तियां साहिल पर भी
चोट खाते हैं लोग फूलों से भी

आस-पास के लोगों से पूछा की जाम का क्या कारण है तो पता चला कि आगे बस्ती है और सड़क पर ताजिए रख कर मातम मनाया जा रहा है। भारत के हर नागरिक को अपनी धार्मिक स्वतन्त्रता है और वह अपनी इच्छा अनुसार हर प्रकार की धार्मिक क्रियाओं को कर सकता है। यहां तक आम तौर जघन्य अपराध की श्रेणी में आने वाला ‘आत्महत्या’ का अपराध भी जैन धर्म के अन्तर्गत कानूनी मान्यता प्राप्त है।

लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि भारत के नागरिकों और प्रशासन में इतना सिविक सेन्स नहीं है कि धार्मिक क्रियाओं के प्रकोप से उसमें भाग न लेने वाले लोगों को बचा सकें। आप किसी भी धर्म को मानने वाले हैं धर्म के नाम पर आप बड़ी आसानी से नागरिक सुविधाओं को ताक पर रख सकते हैं और आपका विरोध करने वाला बड़ी आसानी से ‘नास्तिक’, ‘काफिर’ या दुष्टात्मा साबित हो जाता है। जागरण कीजिए सड़क रोक दीजिए, कांवर निकालिए हाई वे जाम कर दीजिए, शबे बारात का जुलूस निकालिए रास्ते फंसा दीजिए या फिर मातम का उत्सव हाई वे पर मनाइए।

बहरहाल जब ताजिए उठे तो जाम खुला और रैंग-रैंग गाडि़यां चलनी चालू हई। इस बीच कुछ महापुरुषों ने डिवाइडर पर पत्थर लगा कर रोंग साइड से गाड़ी घुसा कर जाम को और बुरी हालत में फंसा दिया था। काफी देर बाद हालात सामान्य हुए और हाईवे पर हुआ दमे का जबरदस्त अटैक कुछ कम हुआ और उसकी सांस फिर से चलनी चालू हुई।

तब तक अंधेरा हो चुका था। सभी वाहन चालक अपर में हैड लाइटें जला कर दना-दना भाग रहे थे। शायद हमारे देश के इस इलाके में अपर में करके हैड लाइटें जलाना मर्दानगी का प्रतीक है। आखिर कोई अपने को नामर्द दिखाना चाहता है, इसलिए सब अपनी लाइटें हमेशा अपर में ही चलाते हैं चाहे दूसरी तरफ से आने वाला वाहन चालक कुछ देर के लिए अंधा ही हो जाए। वैसे आप जानते ही हैं कि हमारे देश का राष्ट्रीय रोग नपुंसकता ही है क्योंकि उसके इलाज के लिए हर जगह दीवारों पर लगा दिखता है। अपने वर्तमान स्वास्थ्य मंत्री जी ने भी बताया है कि मंत्री और सांसद सबसे ज्यादा यौन क्षमता की दवाइयां ही लेते हैं।

Saturday, December 21, 2013

अतीत की ओर .....

 काशी या अब वाराणसी की यात्रा करना अपनी ही जड़ों की ओर लौटना है, अपने ही अतीत की यात्रा है। इस यात्रा में बहुत कुछ ऐसा हुआ जिसे अगर मैंने नहीं लिखा तो मानसिक बदहजमी होना लाजिमी है। इसलिए आप सबसे माफी दुनिया में पहले से भरे साहित्यिक/असाहित्यिक कचरे को बढ़ाने के लिए। 

15 नवम्बर 2013

अभी कुछ दिन पहले तक डपटती हुई सी लगती धूप अब प्यार से बतियाने लगी थी, और सुबह के समय तो उसमें कुछ अलग ही मुलायमियत होती है। हाथ पैरों में पड़ती धूप ऐसी लगती है जैसे कोई गुनगनी रुई से सिकाई कर रहा हो। हर तरफ ठंडी-सी शांति थी बस नहा धोकर तैयार होने के बावजूद कुछ उनींदे से दिख रहे बच्चे स्कूल जाने के लिए सड़क के किनारे खड़े अपनी वैन का इंतजार कर रहे थे। ऐसे में जब बनारस के लिए यात्रा आरम्भ हुई तो यात्रा के हिसाब से बिलकुल उपयुक्त माहौल था। न गर्मी, न सर्दी, न आंधी, न घुटन!!
व्हील चेयर धारियों के लिए अपने देश में यात्रा करना या तो बड़ी मजबूरी होती है या एक बहुत बड़ी विलासता होती है। आम तौर से उन्हें घूमते हुए देख कर ज्यादातर लोगों का दृष्टिकोण होता है - हे भगवान तुम्हें भी घूमना है!! वैसे विकलांगों के बारे में और चीजों के लिए भी सब यही सोचते हैं, जैसे - हे भगवान तुम्हें प्रेम होता है, हे भगवान तुम्हारे अंदर सैक्स की भावनाएं हैं, हे भगवान तुम भी हर्ट होते हो, वगैरह वगैरह।

पहले योजना बनाई कि रेलगाड़ी से चलते हैं, आखिर भारतीय रेल विकलांगों के लिए इतनी सुविधाएं देती है। लेकिन टिकट वितरक तो सैयाद निकला, घर पर जो 3 सीट खाली दिख रही थीं वो स्टेशन पहुंचने तक 93 वेटिंग में बदल गयी, एजेंट को भेजा तो विकलांगता सर्टिफिकेट को मानने से इंकार कर दिया। वैसे गलती उसकी नहीं है, एक तो भ्रष्टाचार का रिवाज अपने यहां रोज सुबह हल्के होने से ज्यादा है ऊपर से उनको विकलांगों से व्यवहार करने के लिए कोई प्रशिक्षण भी नहीं है। (ब्रूटस इज़ एन आॅनरेबल मैन!!)

फिर कार से जाने का आखिरी विकल्प चुना गया और सुबह निकलने की तैयारी कर ली। रास्ते में भीड़-भाड़ नहीं थी और लेट होने के बावजूद भीड़ न होने के कारण हम एक घंटे से पहले ही यमुना एक्सप्रैस वे को पीछे छोड़ते हुए कानपुर हाई वे पर आ गए। प्राचीन उत्तरपथ से शेरशाह सूरी मार्ग और फिर अंग्रेजो द्वारा कुछ सुधार कर बनाई गयी जीटी रोड के बावजूद बढि़या हाईवे भारत में अधिक पुरानी चीज नहीं हैं। इस तरह के शानदार हाईवे पिछले एक दशक से ही दिखे हैं जिनमें विश्व मानदंड के हिसाब से कुछ कसर रहती हो लेकिन भारत के हिसाब से तो नयी चीज ही हैं। ट्रेनों की स्पीड में आजादी बाद से बहुत कम फर्क आया है लेकिन कारों की स्पीड तो सौ से नीचे होती ही नहीं। अगर गाड़ी के माध्यम से अहंकार को संतुष्ट किया जा रहा है तो बात ही क्या फिर तो 150 की गति भी मामूली है।

तेजी से भागती कार से पीछे भागते हरे पेड़ों की कतारें ऐसी लग रही थीं जैसे कोई चित्रकार विशाल कूंची से हरे रंग की लहराती लाइन बनाता जा रहा हो। ये लाइन ज्यादा दूरी तक नहीं बन पायी क्योंकि अचानक सड़क के बीचों-बीच बने अस्थायी टोल बूथ ने रफ्तार को लगाम लगा दी। हाइवे पर सरपट भागते हुए अगर आपके पास टोल बूथ से फ्री निकलने की कोई जुगाड़ नहीं है तो आपको वो अपने जीवन साथी के बाॅय फ्रेंड या गर्ल फ्रेंड की तरह दिखायी देंगे।

वैसे टोल की पूरी संकल्पना ही बड़ी मजेदार है, सरकार ने हाथ खींच लिए और नागरिकों से कह दिया कि भाई तुम जानो तुम्हारा काम जाने!! सड़क बनाने वाले की दुकान है, तुम्हें चाहिए तो उसका माल खरीदो, जिस रेट में मिल रहा है लो, नहीं चाहिए तो मत लो, फाल्तू में हमारा भेजा मत खाओ। लेकिन जिस तरह दुकानों में पुलिसवाले और अधिकारी फ्री का माल उड़ाते हैं वैसे यहां भी हैं, और उनकी तादाद ज्यादा है। बड़ी भारी पोल है इस टोल की जिस पर फिर कभी बात करेंगे।

जगह-जगह बने टोल माता के मंदिरों में चढ़ावा चढ़ाते गए और आगे बढ़ते गए। गाड़ी ने फिर से गति पकड़ी और जल्द ही इटावा के इलाके में पहुंच गए। सुना है डाकुओं का इलाका है, पकड़ वगैरह खूब पहुंचती हैं, बच्चे गुड्डे-गुडि़या से पहले कट्टा रखते हैं। मैंने दोनों तरह निगाह घुमायी तो कुछ भी अलग नहीं दिखा। वही कुछ पेड़, कच्चे पक्के मकान, दौड़ते अधनंगे बच्चे, किनारों पर साइकिलों पर कुछ अपने में खोए और कुछ कुतुहल से भरे लोग। कई बार टीवी चैनलों के चश्मे से दुनिया को देखते हुए हम सच्चाई से कितनी दूर हो जाते हैं?

लेकिन एक बात जरूर थी, टोल पर बैठे कर्मचारी के स्वर में हल्की-सी बारूद की महक थी - टोल निकालिए और आगे जाइए कोई फालतू बात नहीं। यह बात तब बोली गयी जब हमने उससे पूछा कि भाई ये टोल का क्या हिसाब-किताब है, हर जगह कच्चे टोल क्यों बना दिए हैं? क्या टोल लेने का कोई कानून नहीं है? उसके बाद हमने भी सोचा कि जल्दी टोल निकालें और भगें कही हमारी ही पकड़ न हो जाए।