काशी या अब वाराणसी की यात्रा करना अपनी ही जड़ों की ओर लौटना है, अपने ही अतीत की यात्रा है। इस यात्रा में बहुत कुछ ऐसा हुआ जिसे अगर मैंने नहीं लिखा तो मानसिक बदहजमी होना लाजिमी है। इसलिए आप सबसे माफी दुनिया में पहले से भरे साहित्यिक/असाहित्यिक कचरे को बढ़ाने के लिए।
15 नवम्बर 2013
अभी कुछ दिन पहले तक डपटती हुई सी लगती धूप अब प्यार से बतियाने लगी थी, और सुबह के समय तो उसमें कुछ अलग ही मुलायमियत होती है। हाथ पैरों में पड़ती धूप ऐसी लगती है जैसे कोई गुनगनी रुई से सिकाई कर रहा हो। हर तरफ ठंडी-सी शांति थी बस नहा धोकर तैयार होने के बावजूद कुछ उनींदे से दिख रहे बच्चे स्कूल जाने के लिए सड़क के किनारे खड़े अपनी वैन का इंतजार कर रहे थे। ऐसे में जब बनारस के लिए यात्रा आरम्भ हुई तो यात्रा के हिसाब से बिलकुल उपयुक्त माहौल था। न गर्मी, न सर्दी, न आंधी, न घुटन!!
व्हील चेयर धारियों के लिए अपने देश में यात्रा करना या तो बड़ी मजबूरी होती है या एक बहुत बड़ी विलासता होती है। आम तौर से उन्हें घूमते हुए देख कर ज्यादातर लोगों का दृष्टिकोण होता है - हे भगवान तुम्हें भी घूमना है!! वैसे विकलांगों के बारे में और चीजों के लिए भी सब यही सोचते हैं, जैसे - हे भगवान तुम्हें प्रेम होता है, हे भगवान तुम्हारे अंदर सैक्स की भावनाएं हैं, हे भगवान तुम भी हर्ट होते हो, वगैरह वगैरह।
पहले योजना बनाई कि रेलगाड़ी से चलते हैं, आखिर भारतीय रेल विकलांगों के लिए इतनी सुविधाएं देती है। लेकिन टिकट वितरक तो सैयाद निकला, घर पर जो 3 सीट खाली दिख रही थीं वो स्टेशन पहुंचने तक 93 वेटिंग में बदल गयी, एजेंट को भेजा तो विकलांगता सर्टिफिकेट को मानने से इंकार कर दिया। वैसे गलती उसकी नहीं है, एक तो भ्रष्टाचार का रिवाज अपने यहां रोज सुबह हल्के होने से ज्यादा है ऊपर से उनको विकलांगों से व्यवहार करने के लिए कोई प्रशिक्षण भी नहीं है। (ब्रूटस इज़ एन आॅनरेबल मैन!!)
फिर कार से जाने का आखिरी विकल्प चुना गया और सुबह निकलने की तैयारी कर ली। रास्ते में भीड़-भाड़ नहीं थी और लेट होने के बावजूद भीड़ न होने के कारण हम एक घंटे से पहले ही यमुना एक्सप्रैस वे को पीछे छोड़ते हुए कानपुर हाई वे पर आ गए। प्राचीन उत्तरपथ से शेरशाह सूरी मार्ग और फिर अंग्रेजो द्वारा कुछ सुधार कर बनाई गयी जीटी रोड के बावजूद बढि़या हाईवे भारत में अधिक पुरानी चीज नहीं हैं। इस तरह के शानदार हाईवे पिछले एक दशक से ही दिखे हैं जिनमें विश्व मानदंड के हिसाब से कुछ कसर रहती हो लेकिन भारत के हिसाब से तो नयी चीज ही हैं। ट्रेनों की स्पीड में आजादी बाद से बहुत कम फर्क आया है लेकिन कारों की स्पीड तो सौ से नीचे होती ही नहीं। अगर गाड़ी के माध्यम से अहंकार को संतुष्ट किया जा रहा है तो बात ही क्या फिर तो 150 की गति भी मामूली है।

तेजी से भागती कार से पीछे भागते हरे पेड़ों की कतारें ऐसी लग रही थीं जैसे कोई चित्रकार विशाल कूंची से हरे रंग की लहराती लाइन बनाता जा रहा हो। ये लाइन ज्यादा दूरी तक नहीं बन पायी क्योंकि अचानक सड़क के बीचों-बीच बने अस्थायी टोल बूथ ने रफ्तार को लगाम लगा दी। हाइवे पर सरपट भागते हुए अगर आपके पास टोल बूथ से फ्री निकलने की कोई जुगाड़ नहीं है तो आपको वो अपने जीवन साथी के बाॅय फ्रेंड या गर्ल फ्रेंड की तरह दिखायी देंगे।
वैसे टोल की पूरी संकल्पना ही बड़ी मजेदार है, सरकार ने हाथ खींच लिए और नागरिकों से कह दिया कि भाई तुम जानो तुम्हारा काम जाने!! सड़क बनाने वाले की दुकान है, तुम्हें चाहिए तो उसका माल खरीदो, जिस रेट में मिल रहा है लो, नहीं चाहिए तो मत लो, फाल्तू में हमारा भेजा मत खाओ। लेकिन जिस तरह दुकानों में पुलिसवाले और अधिकारी फ्री का माल उड़ाते हैं वैसे यहां भी हैं, और उनकी तादाद ज्यादा है। बड़ी भारी पोल है इस टोल की जिस पर फिर कभी बात करेंगे।
जगह-जगह बने टोल माता के मंदिरों में चढ़ावा चढ़ाते गए और आगे बढ़ते गए। गाड़ी ने फिर से गति पकड़ी और जल्द ही इटावा के इलाके में पहुंच गए। सुना है डाकुओं का इलाका है, पकड़ वगैरह खूब पहुंचती हैं, बच्चे गुड्डे-गुडि़या से पहले कट्टा रखते हैं। मैंने दोनों तरह निगाह घुमायी तो कुछ भी अलग नहीं दिखा। वही कुछ पेड़, कच्चे पक्के मकान, दौड़ते अधनंगे बच्चे, किनारों पर साइकिलों पर कुछ अपने में खोए और कुछ कुतुहल से भरे लोग। कई बार टीवी चैनलों के चश्मे से दुनिया को देखते हुए हम सच्चाई से कितनी दूर हो जाते हैं?
लेकिन एक बात जरूर थी, टोल पर बैठे कर्मचारी के स्वर में हल्की-सी बारूद की महक थी - टोल निकालिए और आगे जाइए कोई फालतू बात नहीं। यह बात तब बोली गयी जब हमने उससे पूछा कि भाई ये टोल का क्या हिसाब-किताब है, हर जगह कच्चे टोल क्यों बना दिए हैं? क्या टोल लेने का कोई कानून नहीं है? उसके बाद हमने भी सोचा कि जल्दी टोल निकालें और भगें कही हमारी ही पकड़ न हो जाए।
15 नवम्बर 2013
अभी कुछ दिन पहले तक डपटती हुई सी लगती धूप अब प्यार से बतियाने लगी थी, और सुबह के समय तो उसमें कुछ अलग ही मुलायमियत होती है। हाथ पैरों में पड़ती धूप ऐसी लगती है जैसे कोई गुनगनी रुई से सिकाई कर रहा हो। हर तरफ ठंडी-सी शांति थी बस नहा धोकर तैयार होने के बावजूद कुछ उनींदे से दिख रहे बच्चे स्कूल जाने के लिए सड़क के किनारे खड़े अपनी वैन का इंतजार कर रहे थे। ऐसे में जब बनारस के लिए यात्रा आरम्भ हुई तो यात्रा के हिसाब से बिलकुल उपयुक्त माहौल था। न गर्मी, न सर्दी, न आंधी, न घुटन!!
व्हील चेयर धारियों के लिए अपने देश में यात्रा करना या तो बड़ी मजबूरी होती है या एक बहुत बड़ी विलासता होती है। आम तौर से उन्हें घूमते हुए देख कर ज्यादातर लोगों का दृष्टिकोण होता है - हे भगवान तुम्हें भी घूमना है!! वैसे विकलांगों के बारे में और चीजों के लिए भी सब यही सोचते हैं, जैसे - हे भगवान तुम्हें प्रेम होता है, हे भगवान तुम्हारे अंदर सैक्स की भावनाएं हैं, हे भगवान तुम भी हर्ट होते हो, वगैरह वगैरह।
पहले योजना बनाई कि रेलगाड़ी से चलते हैं, आखिर भारतीय रेल विकलांगों के लिए इतनी सुविधाएं देती है। लेकिन टिकट वितरक तो सैयाद निकला, घर पर जो 3 सीट खाली दिख रही थीं वो स्टेशन पहुंचने तक 93 वेटिंग में बदल गयी, एजेंट को भेजा तो विकलांगता सर्टिफिकेट को मानने से इंकार कर दिया। वैसे गलती उसकी नहीं है, एक तो भ्रष्टाचार का रिवाज अपने यहां रोज सुबह हल्के होने से ज्यादा है ऊपर से उनको विकलांगों से व्यवहार करने के लिए कोई प्रशिक्षण भी नहीं है। (ब्रूटस इज़ एन आॅनरेबल मैन!!)
फिर कार से जाने का आखिरी विकल्प चुना गया और सुबह निकलने की तैयारी कर ली। रास्ते में भीड़-भाड़ नहीं थी और लेट होने के बावजूद भीड़ न होने के कारण हम एक घंटे से पहले ही यमुना एक्सप्रैस वे को पीछे छोड़ते हुए कानपुर हाई वे पर आ गए। प्राचीन उत्तरपथ से शेरशाह सूरी मार्ग और फिर अंग्रेजो द्वारा कुछ सुधार कर बनाई गयी जीटी रोड के बावजूद बढि़या हाईवे भारत में अधिक पुरानी चीज नहीं हैं। इस तरह के शानदार हाईवे पिछले एक दशक से ही दिखे हैं जिनमें विश्व मानदंड के हिसाब से कुछ कसर रहती हो लेकिन भारत के हिसाब से तो नयी चीज ही हैं। ट्रेनों की स्पीड में आजादी बाद से बहुत कम फर्क आया है लेकिन कारों की स्पीड तो सौ से नीचे होती ही नहीं। अगर गाड़ी के माध्यम से अहंकार को संतुष्ट किया जा रहा है तो बात ही क्या फिर तो 150 की गति भी मामूली है।
तेजी से भागती कार से पीछे भागते हरे पेड़ों की कतारें ऐसी लग रही थीं जैसे कोई चित्रकार विशाल कूंची से हरे रंग की लहराती लाइन बनाता जा रहा हो। ये लाइन ज्यादा दूरी तक नहीं बन पायी क्योंकि अचानक सड़क के बीचों-बीच बने अस्थायी टोल बूथ ने रफ्तार को लगाम लगा दी। हाइवे पर सरपट भागते हुए अगर आपके पास टोल बूथ से फ्री निकलने की कोई जुगाड़ नहीं है तो आपको वो अपने जीवन साथी के बाॅय फ्रेंड या गर्ल फ्रेंड की तरह दिखायी देंगे।
वैसे टोल की पूरी संकल्पना ही बड़ी मजेदार है, सरकार ने हाथ खींच लिए और नागरिकों से कह दिया कि भाई तुम जानो तुम्हारा काम जाने!! सड़क बनाने वाले की दुकान है, तुम्हें चाहिए तो उसका माल खरीदो, जिस रेट में मिल रहा है लो, नहीं चाहिए तो मत लो, फाल्तू में हमारा भेजा मत खाओ। लेकिन जिस तरह दुकानों में पुलिसवाले और अधिकारी फ्री का माल उड़ाते हैं वैसे यहां भी हैं, और उनकी तादाद ज्यादा है। बड़ी भारी पोल है इस टोल की जिस पर फिर कभी बात करेंगे।
जगह-जगह बने टोल माता के मंदिरों में चढ़ावा चढ़ाते गए और आगे बढ़ते गए। गाड़ी ने फिर से गति पकड़ी और जल्द ही इटावा के इलाके में पहुंच गए। सुना है डाकुओं का इलाका है, पकड़ वगैरह खूब पहुंचती हैं, बच्चे गुड्डे-गुडि़या से पहले कट्टा रखते हैं। मैंने दोनों तरह निगाह घुमायी तो कुछ भी अलग नहीं दिखा। वही कुछ पेड़, कच्चे पक्के मकान, दौड़ते अधनंगे बच्चे, किनारों पर साइकिलों पर कुछ अपने में खोए और कुछ कुतुहल से भरे लोग। कई बार टीवी चैनलों के चश्मे से दुनिया को देखते हुए हम सच्चाई से कितनी दूर हो जाते हैं?
लेकिन एक बात जरूर थी, टोल पर बैठे कर्मचारी के स्वर में हल्की-सी बारूद की महक थी - टोल निकालिए और आगे जाइए कोई फालतू बात नहीं। यह बात तब बोली गयी जब हमने उससे पूछा कि भाई ये टोल का क्या हिसाब-किताब है, हर जगह कच्चे टोल क्यों बना दिए हैं? क्या टोल लेने का कोई कानून नहीं है? उसके बाद हमने भी सोचा कि जल्दी टोल निकालें और भगें कही हमारी ही पकड़ न हो जाए।
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