Tuesday, May 6, 2014

काया नहीं तेरी!!

(उपन्यास अंश)

मैंने खिड़की से देखा, बाहर रात काली नहीं दिख रही थी। किसी पके हुए फोड़े की तरह तमतमा रही थी, एक अजीब सी लालिमा उसके कालेपन में घुली हुई थी। कुछ देर तक बाहर देखने के बाद मैंने सोचा अब करवट लेने की कोशिश करनी चाहिए। कई बार गहरी-गहरी सांसे ली, अपने शरीर की पूरी ताकत को समेटा, जैसे ढीले पड़े लकड़ियों के गट्ठर को किसी तरह लपेटा जाए, पलंग के किनारे को हाथ से पकड़ा और सीधे से टेढ़ा होने के एवरेस्ट पर चढ़ने जैसा प्रयास आरम्भ किया। ताकत लगाते ही दर्द पूरे शरीर में बह चला जैसे अचानक कोई धीरे-धीरे करके कोई पुराना खुरंट उखाड़ रहा हो। एक बार मन में आया कि करवट बदलने का विचार त्याग दूं लेकिन मैं रूका नहीं और लगातार करवट बदलने के लिए जोर लगाता रहा। दर्द बढ़ रहा था, मेरी सांस फूल रही थी लेकिन करवट थी कि खत्म नहीं हो रही थी। सोचने की बात यह थी कि मुझे मौत पहले आएगी या करवट? वैसे ये प्रश्न फालतू का था क्योंकि करवट तो में कई बार बदलता था मौत तो एक बार भी नहीं आयी?

    आखिरकार करवट बदल गयी, कब बदली मुझे नहीं पता चला लेकिन करवट बदलते ही जैसे ही शरीर को ढीला छोड़ा दर्द एकदम गायब हो गया। सांस भी तेजी से सामान्य होने लगी, बस हल्के-हल्के दिल की धड़कन महसूस हो रही थी जैसे दिल ढीला हो गया हो और धड़कता हुआ इधर-उधर लुढ़क रहा हो। हद है! क्या बीमारी है? इसे मेरे हिलने-डुलने ही शिकायत है? मेरा शरीर न हुआ हमारा समाज हो गया, जो यथास्थिति का हद दर्जे का दीवाना है और जरा सा हिलाना-डुलाने पर बौखला जाता है।

वैसे क्या बीमारी होगी? डाक्टर ने कहा है कि पोलियो के कारण चल न पाने से मांसपेशियां अपनी ताकत खो बैठी हैं। कमाल है ताकत खो बैठी है तो इस जरा सा जोर डालते ही यूं हाहाकार-सा क्यों मचा देती हैं? मांसपेशियां ताकत खो बैठी है या अब चला-चली की बेला आ गयी? अभी तो कुछ जिया भी नहीं और सब खत्म होने का समय आ गया? अभी तक मैंने किस-किस चीज का अनुभव नहीं किया? अरे अभी तो कुछ भी नहीं किया .... सेक्स का अनुभव नहीं किया, इन दो कमरों के बाहर की दुनिया नहीं देखी, न जाने कितनी किताबें अभी तक नहीं छुई तक नहीं, कितने लोगों से मिलना रह गया है ..... वैसे अगर मौत आने का टाइम आ गया तो क्या करना चाहूंगा? सेक्स करना? लेकिन किससे? अरे जब मरने से पहले सिर्फ एक बार पता करना हो कि सेक्स क्या होता है तो क्या फर्क पड़ता है किससे? या जर्मेन ग्रीयर से मिलना? या 100 ईयर आॅफ साॅलिट्यूट दुबारा पढ़ना? इन्हीं सब बातों के बारे में सोच रहा था कि सच में मौत आ गई ..... पेट की निचले भाग में भोंथरी सी सुई चुभने का अहसास हुआ और उसी के साथ पिशाब का दबाव महसूस होने लगा।

ये सच में जीवित मौत है, बाथरूम तक जाना और फिर दुबारा बिस्तर पर चढ़ना। कई बार मुझसे कहा है कि बिस्तर पर ही फारिग होने का इंतजाम कर देते हैं लेकिन मैंने ही इंकार कर दिया। मैं उसके पाश्र्व प्रभावों से भलीभांति परिचित था, मम्मी-पापा जो अपना काम ही इस बुढ़ापे में जैसे-तेसे ढेल कर कर रहे हैं वो वो मुझे बिस्तर पर मूतने का इंतजाम कैसे कर पाएंगे।

कठोर प्रयासों के साथ एक-एक सेंटीमीटर का सफर करते हुए बाथरूम तक जाना और फिर वहां एक सीढ़ी चढ़ना और नाली तक पहुंचना। मुझे जमीन पर लेट कर जाने में भी कोई आपत्ति नहीं है, क्योंकि कोई मुझे नहीं देख रहा है लेकिन लेट कर तो एक-एक मिली मीटर भी नहीं घिसट पाउंगा। दर्द, फूलती सांसों और साथ छोड़ती मांसपेशियों के साथ ऐसा लगता है कि मेरे पेट के निचले भाग में कोई टाइम बम फिट है और किसी भी तरह उसे सही जगह पर पहुंचने से पहले फटने से बचाना है। यदा कदा उसमें से चिंगारी फूटती रहती हैं लेकिन फिर भी मुझे उसके विस्फोट को रोकना होता है।

दुबारा पलंग पर आकर लेटा तो लगा एक पूरा जीवन बीत गया, जिसमें दर्द, कष्ट, परेशानियां, असफलताएं, सफलताएं सब कुछ था। बिस्तर पर चढ़ने का आखिरी क्षण तो पूरा रोमांचक होता है जिसमें कई प्रयासों के बाद सफलता हाथ लगती है। दिमाग विचारशून्य हो गया हो गया और मुझे इस बात का अफसोस होने लगा कि किस तरह हम अपने जीवन को टेक फाॅर ग्रान्टेड ले लेते हैं? कहीं दर्द नहीं हो रहा और हम अपने दैनिक काम खुद कर ले रहे हैं क्या जीने के लिए इससे बड़े किसी सुख की आवश्यकता है?

अब जितनी जल्दी हो सके नींद आ जानी चाहिए, ताकि ये रात बीत सके। लेकिन अभी दवाई खानी है, मम्मी ने गिलास में पानी भर कर रख दिया है। थोड़ा टेढ़ा हूं इस तरह से दवाई खायी जा सकती है। स्लो मोशन में दवाई मुंह में डाली और पानी मुंह में उड़ेला, थोड़ी गड़बड़ हो गयी और जितना पानी मुंह के अंदर गया उतना ही बाहर आ गया।

‘‘शिट्!!’’ बिस्तर गीला हो गया और दवा की गोली मुंह में ही घूम कर रह गयी। गोली की कड़वाहट मुंह में घुल गयी और जीभ के पीछे तक कसैला हो गया। दुबारा पानी मुंह में उड़ेलना रिस्की हो सकता है गोली को यूंही निगलने की कोशिश करनी होगी। उंगली से गोली पीछे धकेली, निगलने की एक-दो कोशिश कीं और गोली चुपचाप अंदर चली गयी।

अब आराम से लेट सकते हैं और नींद का मौत की तरह इंतजार कर सकते हैं। देखते हैं पहले कौन आता है? वैसे दोनों में फर्क क्या है? सिर्फ इतना कि एक पास जाते समय हमें भरोसा होता है कि हम फिर इस बेतुके, अर्थहीन संसार में लौट कर आएंगे। आखिर कितने महीन अदृश्य आकर्षण के धागे से बंधे हैं हम इस संसार से, ये महीन धागे बार-बार हमें इस संसार में लौटने के लिए मजबूर करते है। बड़े-बड़े तूफानों को झेल जाना वाला ये धागा कई बार हल्के से छूने भर से टूट जाता है और फिर हम इस संसार में लौटने की अंतहीन लालसा से मुक्त हो जाते हैं।

सुबह चेहरे पर पड़ती चमकती धूप जिंदगी में वापस ले आयी। शायद मम्मी खिड़की का पर्दा खींचना भूल गयीं, वर्ना सुबह उठते ही पहले वो खिड़की का पर्दा खींच देती हैं। पापा टहल कर लौट आए थे और गेट के पास अपनी चप्पल झाड़ रहे थे। मम्मी का टहलना तो बंद हो चुका है, पापा भी कितने दिन तक अपने जबाव देते घुटनों के साथ टहर पाएंगे ये देखने की बात है। आते ही हमेशा की तरह पापा अपने बाबा आदम के जमाने के टू-इन-वन के पास पहुंच गए और वही भजन लगा दिया जो रोज सुबह मेरी जिंदगी हराम करता है।

‘‘काया नहीं तेरी .....’’ कबीर को मुझसे क्या दुश्मनी थी जो रोज सुबह पापा के साथ मिल कर मुझे चिढ़ाता है? ऊपर से ये भीमसेन जोशी, जिनकी आवाज हड्डी, मांस, मज्जा सब पार करके सीधे भीतर उतर जाती है। मुझे आज तक ये नहीं समझ आया कि पापा जानबूझ कर मुझे चिढ़ाने के लिए ये भजन लगाते हैं या उनको कभी इस बात का ध्यान ही रहता कि इस भजन में क्या कहा जा रहा है?

क्रमशः