उपन्यास अंश -
सैंकड़ो साल पहले कबीर को कैसे पता चल गया कि काया मेरी नहीं है? और मैंने कबीर से पूछा कब कि बताइए काया मेरी है या नहीं जो उन्होने मुझे जवाब दे दिया कि काया नहीं तेरी? और काया मेरी क्यों नहीं? सिर्फ इसलिए कि कोई नहीं चाहता कि काया मेरी हो?
हद है काया अगर मेरी हो तो किसी को क्या तकलीफ है? अरे मेरा उनसे लेना नहीे, देना नहीं, मैं अपनी जिंदगी जैसी भी है खुद जी रहा हूं, उनकी जिंदगी जैसी है वो जी रहे हैं, मैं कोई उनसे जिंदगी एक्सचेंज करने को तो कह नहीं रहा। क्या मैं किसी के मुंह का निवाला छीन रहा हूं? किसी के जीने में बाधा डाल रहा हूं, किसी तरह से तंग कर रहा हूं? उनकी दीवार पर जाके मूत रहा हूं? आखिर परेशानी क्या है? उनका मुझसे कोई सरोकार नहीं है, उनको मेरी परेशानियों से कुछ मतलब नहीं है लेकिन अगर मेरी खुशी का कहीं से कोई कारण बनता है तो उनके माथे पर बल पड़ जाते हैं। विकलांग होकर इस तरह जीना चाहता है? हंसना चाहता है, खेलना चाहता है, पढ़ना चाहता है, प्रेम करना चाहता है? अरे हम अपने बीच सांसे लेने दे रहे हैं, और तू उंगली पकड़ कर पहुंचा पकड़ना चाहता है? अरे जिंदा है ये क्या कम है कि जो अपने शरीर के हर अंग को महसूस करना चाहता है? विकलांग बस जिंदा रहें यही बहुत है, खाने को मिल रहा है, शरीर ढकने का मिल रहा है, सर ढकने को छत है, ढेर सारी दया मिल रही है ... यही औकात से बढ़ कर है, प्रेम, सेक्स, मित्रता, सम्बन्ध, भावनाएं जैसी विलासताओं के बारे में सोचना भी महापाप है। धर्म ग्रन्थ पढ़ो, अपने पूर्व जन्म के किए पापों के लिए भगवान के सामने गिड़गिड़ाओ कि अगले जन्म में तुम्हारे पापों का दण्ड नहीं मिले और तुम सामान्य शरीर के साथ जन्म ले सको।
चलो दूसरों का तो समझ आया लेकिन मेरे अपने घरवाले? मेरे माता-पिता जो मेरा मुंह देख कर जीते हैं, सुबह से शाम तक सिर्फ मेरे बारे में ही सोचते हैं, अपनी मौत से ज्यादा इस बात से घबराते हैं कि उनके मरने के बाद मेरा ख्याल कौन रखेगा, उनको काया से क्या तकलीफ है? उनको मालूम है काया के पास होते ही मेरा पूरा वजूद थिरकने लगता है, मैं अपनी देह के बंधन से मुक्त होकर अनंत की सैर करने लगता हूं, कभी बर्फ से ढकी चोटियों पर फिसलने लगता हूं तो कभी घास के बड़े-बड़े मैदानों में लोट लगाने लगता हूं, कभी समुद्र की मदहोश लहरों पर तैरने लगता हूं तो कभी ठंडी रेत के टीलों में धंसने लगता हूं, कभी पखेरू की तरह किसी ऊंचे पेड़ पर जा बैठता हूं तो कभी फूलों की घाटी में उतर कर खुद भी एक फूल बन कर एक नाजुक-सी डाली पर उग आता हूं।
फिर भी उन्होंने अपनी पूरी ताकत इस बात के लिए झोंक रखी है कि मैं किसी भी तरह काया से नहीं मिल पाऊं। काया को अपमानित करने, मुझे कोसने से लेकर जादू-टोना तक करवाने के हर तरह के उपाय उन्होंने आजमा लिए हैं। काया की रीढ़ गली हुई नहीं है, उसने मुझसे मिलना छोड़ दिया है। मैं जानता हूं भले वो और किसी से भी प्यार करती होगी लेकिन जब कभी वो अकेली होती होगी तो एक आंसू तो मेरे नाम का बनता है यार! माना कि मैं विकलांग हूं लेकिन क्या दिल, भावनाएं, सोच, विचार भी विकलांग होते हैं? ये सब सीमित हो सकते हैं लेकिन विकलांग नहीं। हो सकता है मुझे सामान्य लोगों की तरह रिश्ते बनाने का हक नहीं है लेकिन अपने को सुलगाने, भीतर-ही-भीतर अपने को सेकने का हक तो मुझे भी है। शायद मेरे भीतर का यह दर्द ही रिस कर मेरी हड्डियों में आ गया है।
सोचने की जरूरत नहीं, बिना सोचे बता सकता हूं कि पहली बार काया से कब मिला था। बाथरूम के टूटे हुए फर्श की मरम्मत के लिए आयी थी। उसका नाम कई बार सुना था लेकिन कभी किसी ने उसे देखा नहीं था। किसी को उम्मीद नहीं थी कि वो हमारे घर आएगी, जिससे टाइल खरीदी थीं उसी से किसी बढि़या फर्श बनाने वाले को भेजने की कही थी और उसने काया को भेज दिया। उसे देखते ही सब सन्न रह गए। ये तो कोई नहीं कह सका आप वापिस चले जाओ लेकिन सब को धक्का सा लग गया और सब यही सोचने लगे कि किसी तरह जल्दी से काम खत्म हो और वो यहां से टले।
जैसे ही पहली बार हमारी नजरें एक-दूसरे से टकराईं उसने एक बड़ी गहरी मुस्कान के साथ मेरी ओर देखा। मैं व्हील चेयर पर था इसलिए काफी कमफर्टेबल था क्योंकि अगर व्हील चेयर पर न होउं तो सामने वाले पता नहीं चल पाता कि मैं विकलांग हूं और फिर उसके सामने चलने फिरने में दिक्कत होती है। लेकिन व्हील चेयर पर होने पर देखते ही पता चल जाता है कि मेरे साथ कुछ समस्या है और फिर कुछ छुपाने जैसा नहीं रहता।
उसकी गहरी मुस्कान एक नर्म, मासूम नश्तर की तरह मेरे भीतर उतर गयी। शायद आज से पहले कोई मुझे देखकर इस तरह मुस्कराया ही नहीं। मैं देर तक उसे देखता रहा। अद्भुत थी वो, अनूठी ... न जाने औरत थी या मर्द!! एक पुरुष की देह में कैद एक औरत की आत्मा्! आधी-अधूरी नहीं बल्कि एक भरपूर औरत, जो अपने औरतपने के हर क्षण को पूरी तरह जीना चाहती थी, बिना किसी शर्म या हीन भावना के। उसकी सोच ने उसके शरीर पर भी अपनी छाप छोड़ दी थी, उसके पूरे व्यक्तित्व में एक ऐसी कमनीयता, नारीत्व का ऐसा गहरा अहसास था जो मुझे कई बार पूरी औरतों में नहीं दिखता।
हाथों में चूडि़यां, कानों में बुंदे और बलखाती लटें, वाकई वो बला की खूबसूरत थी, कम-से-कम मुझे तो लगती ही थी। तराशी हुई तीखी नाक के नीचे पतले होठों पर लगी हुई लाल लिपिस्टिक और डिजायनर चूड़ीदार और सलवार। चाल में एक नाजुक लचक और बोलने में अद्भुत मिठास। इस बात को कहने में मुझे कोई हिचक नहीं है कि उसे देखते ही मुझ पर जो असर हुआ वो अब तक किसी को देख कर नहीं हुआ। जैसे किसी क्यारी में बहुत दिन से किसी ने पानी न डाला हो, मिट्टी चटक गयी हो, खरपतवार भी जल कर मर गयी हो, कैंचुए भी या तो मर गए हों या भाग गए हों, और फिर अचानक उसमें कोई ठंडा पानी उगलता हुआ पाइप लगा दे।
मैंने उसके बारे में पहले सुन रखा था लेकिन जो कुछ मैं जानता था उसका उसकी वास्तविकता से कोई नाता नहीं था। वह क्या है, कौन है यह मैंने उससे मिल कर ही जाना। कभी भी किसी इंसान को उन बातों से नहीं जाना जा सकता जो उसके बारे में होती हैं, और काया को तो बिलकुल ही जाना जा सकता। हमारी शुरूआती बातें जब चालू हुईं जब पत्थर लगाने वाले मजदूरों, मिस्त्रियों की निगरानी खड़े-खड़े करते हुए उसकी टांगे दुख जाती और कुछ पल सुस्ताने के लिए वो पानी का गिलास लेकर मेरी चारपाई के किनारे पर बैठ जाती थी।
‘‘किताबें आपके सिरहाने रखी रहती हैं!! मतलब आपको पढ़ने का शौक है? मुझे भी किताबें अच्छी लगती हैं लेकिन मैंने ज्यादा कुछ पढ़ा नहीं है।’’, वह अपनी उसी आत्मीय मुस्कान के साथ बात करती थी।
‘‘हां, मुझे किताबों से बहुत प्रेम है, पढ़ भी नहीं रहा हूं तो सिर्फ उनके पास होने से ही मुझे अच्छा लगता है। आपको पता है किताबों से खुशबू आती है, पन्नों की भी और शब्दों की भी!!’’, मैं तो बोलने के लिए तैयार ही बैठा था। किताबों के बारे में बात करने वाला मुश्किल से ही मिलता है।
‘‘आप बाहर क्यों नहीं आते-जाते? आपका मन बहलेगा और लोगों मिलना-जुलना भी होगा? पहले मुझे भी किसी से मिलना अच्छा नहीं लगता था, महीनों कमरा बंद करके बैठे रहती थी। लेकिन फिर मुझे लगा कि भले ही और लोग मुझे देख कर दरवाजे बंद कर रहे हों लेकिन कम-से-कम मुझे तो अपने दरवाजे खोल कर रखने चाहिए।’’
सैंकड़ो साल पहले कबीर को कैसे पता चल गया कि काया मेरी नहीं है? और मैंने कबीर से पूछा कब कि बताइए काया मेरी है या नहीं जो उन्होने मुझे जवाब दे दिया कि काया नहीं तेरी? और काया मेरी क्यों नहीं? सिर्फ इसलिए कि कोई नहीं चाहता कि काया मेरी हो?
हद है काया अगर मेरी हो तो किसी को क्या तकलीफ है? अरे मेरा उनसे लेना नहीे, देना नहीं, मैं अपनी जिंदगी जैसी भी है खुद जी रहा हूं, उनकी जिंदगी जैसी है वो जी रहे हैं, मैं कोई उनसे जिंदगी एक्सचेंज करने को तो कह नहीं रहा। क्या मैं किसी के मुंह का निवाला छीन रहा हूं? किसी के जीने में बाधा डाल रहा हूं, किसी तरह से तंग कर रहा हूं? उनकी दीवार पर जाके मूत रहा हूं? आखिर परेशानी क्या है? उनका मुझसे कोई सरोकार नहीं है, उनको मेरी परेशानियों से कुछ मतलब नहीं है लेकिन अगर मेरी खुशी का कहीं से कोई कारण बनता है तो उनके माथे पर बल पड़ जाते हैं। विकलांग होकर इस तरह जीना चाहता है? हंसना चाहता है, खेलना चाहता है, पढ़ना चाहता है, प्रेम करना चाहता है? अरे हम अपने बीच सांसे लेने दे रहे हैं, और तू उंगली पकड़ कर पहुंचा पकड़ना चाहता है? अरे जिंदा है ये क्या कम है कि जो अपने शरीर के हर अंग को महसूस करना चाहता है? विकलांग बस जिंदा रहें यही बहुत है, खाने को मिल रहा है, शरीर ढकने का मिल रहा है, सर ढकने को छत है, ढेर सारी दया मिल रही है ... यही औकात से बढ़ कर है, प्रेम, सेक्स, मित्रता, सम्बन्ध, भावनाएं जैसी विलासताओं के बारे में सोचना भी महापाप है। धर्म ग्रन्थ पढ़ो, अपने पूर्व जन्म के किए पापों के लिए भगवान के सामने गिड़गिड़ाओ कि अगले जन्म में तुम्हारे पापों का दण्ड नहीं मिले और तुम सामान्य शरीर के साथ जन्म ले सको।
चलो दूसरों का तो समझ आया लेकिन मेरे अपने घरवाले? मेरे माता-पिता जो मेरा मुंह देख कर जीते हैं, सुबह से शाम तक सिर्फ मेरे बारे में ही सोचते हैं, अपनी मौत से ज्यादा इस बात से घबराते हैं कि उनके मरने के बाद मेरा ख्याल कौन रखेगा, उनको काया से क्या तकलीफ है? उनको मालूम है काया के पास होते ही मेरा पूरा वजूद थिरकने लगता है, मैं अपनी देह के बंधन से मुक्त होकर अनंत की सैर करने लगता हूं, कभी बर्फ से ढकी चोटियों पर फिसलने लगता हूं तो कभी घास के बड़े-बड़े मैदानों में लोट लगाने लगता हूं, कभी समुद्र की मदहोश लहरों पर तैरने लगता हूं तो कभी ठंडी रेत के टीलों में धंसने लगता हूं, कभी पखेरू की तरह किसी ऊंचे पेड़ पर जा बैठता हूं तो कभी फूलों की घाटी में उतर कर खुद भी एक फूल बन कर एक नाजुक-सी डाली पर उग आता हूं।
फिर भी उन्होंने अपनी पूरी ताकत इस बात के लिए झोंक रखी है कि मैं किसी भी तरह काया से नहीं मिल पाऊं। काया को अपमानित करने, मुझे कोसने से लेकर जादू-टोना तक करवाने के हर तरह के उपाय उन्होंने आजमा लिए हैं। काया की रीढ़ गली हुई नहीं है, उसने मुझसे मिलना छोड़ दिया है। मैं जानता हूं भले वो और किसी से भी प्यार करती होगी लेकिन जब कभी वो अकेली होती होगी तो एक आंसू तो मेरे नाम का बनता है यार! माना कि मैं विकलांग हूं लेकिन क्या दिल, भावनाएं, सोच, विचार भी विकलांग होते हैं? ये सब सीमित हो सकते हैं लेकिन विकलांग नहीं। हो सकता है मुझे सामान्य लोगों की तरह रिश्ते बनाने का हक नहीं है लेकिन अपने को सुलगाने, भीतर-ही-भीतर अपने को सेकने का हक तो मुझे भी है। शायद मेरे भीतर का यह दर्द ही रिस कर मेरी हड्डियों में आ गया है।
सोचने की जरूरत नहीं, बिना सोचे बता सकता हूं कि पहली बार काया से कब मिला था। बाथरूम के टूटे हुए फर्श की मरम्मत के लिए आयी थी। उसका नाम कई बार सुना था लेकिन कभी किसी ने उसे देखा नहीं था। किसी को उम्मीद नहीं थी कि वो हमारे घर आएगी, जिससे टाइल खरीदी थीं उसी से किसी बढि़या फर्श बनाने वाले को भेजने की कही थी और उसने काया को भेज दिया। उसे देखते ही सब सन्न रह गए। ये तो कोई नहीं कह सका आप वापिस चले जाओ लेकिन सब को धक्का सा लग गया और सब यही सोचने लगे कि किसी तरह जल्दी से काम खत्म हो और वो यहां से टले।
जैसे ही पहली बार हमारी नजरें एक-दूसरे से टकराईं उसने एक बड़ी गहरी मुस्कान के साथ मेरी ओर देखा। मैं व्हील चेयर पर था इसलिए काफी कमफर्टेबल था क्योंकि अगर व्हील चेयर पर न होउं तो सामने वाले पता नहीं चल पाता कि मैं विकलांग हूं और फिर उसके सामने चलने फिरने में दिक्कत होती है। लेकिन व्हील चेयर पर होने पर देखते ही पता चल जाता है कि मेरे साथ कुछ समस्या है और फिर कुछ छुपाने जैसा नहीं रहता।
उसकी गहरी मुस्कान एक नर्म, मासूम नश्तर की तरह मेरे भीतर उतर गयी। शायद आज से पहले कोई मुझे देखकर इस तरह मुस्कराया ही नहीं। मैं देर तक उसे देखता रहा। अद्भुत थी वो, अनूठी ... न जाने औरत थी या मर्द!! एक पुरुष की देह में कैद एक औरत की आत्मा्! आधी-अधूरी नहीं बल्कि एक भरपूर औरत, जो अपने औरतपने के हर क्षण को पूरी तरह जीना चाहती थी, बिना किसी शर्म या हीन भावना के। उसकी सोच ने उसके शरीर पर भी अपनी छाप छोड़ दी थी, उसके पूरे व्यक्तित्व में एक ऐसी कमनीयता, नारीत्व का ऐसा गहरा अहसास था जो मुझे कई बार पूरी औरतों में नहीं दिखता।
हाथों में चूडि़यां, कानों में बुंदे और बलखाती लटें, वाकई वो बला की खूबसूरत थी, कम-से-कम मुझे तो लगती ही थी। तराशी हुई तीखी नाक के नीचे पतले होठों पर लगी हुई लाल लिपिस्टिक और डिजायनर चूड़ीदार और सलवार। चाल में एक नाजुक लचक और बोलने में अद्भुत मिठास। इस बात को कहने में मुझे कोई हिचक नहीं है कि उसे देखते ही मुझ पर जो असर हुआ वो अब तक किसी को देख कर नहीं हुआ। जैसे किसी क्यारी में बहुत दिन से किसी ने पानी न डाला हो, मिट्टी चटक गयी हो, खरपतवार भी जल कर मर गयी हो, कैंचुए भी या तो मर गए हों या भाग गए हों, और फिर अचानक उसमें कोई ठंडा पानी उगलता हुआ पाइप लगा दे।
मैंने उसके बारे में पहले सुन रखा था लेकिन जो कुछ मैं जानता था उसका उसकी वास्तविकता से कोई नाता नहीं था। वह क्या है, कौन है यह मैंने उससे मिल कर ही जाना। कभी भी किसी इंसान को उन बातों से नहीं जाना जा सकता जो उसके बारे में होती हैं, और काया को तो बिलकुल ही जाना जा सकता। हमारी शुरूआती बातें जब चालू हुईं जब पत्थर लगाने वाले मजदूरों, मिस्त्रियों की निगरानी खड़े-खड़े करते हुए उसकी टांगे दुख जाती और कुछ पल सुस्ताने के लिए वो पानी का गिलास लेकर मेरी चारपाई के किनारे पर बैठ जाती थी।
‘‘किताबें आपके सिरहाने रखी रहती हैं!! मतलब आपको पढ़ने का शौक है? मुझे भी किताबें अच्छी लगती हैं लेकिन मैंने ज्यादा कुछ पढ़ा नहीं है।’’, वह अपनी उसी आत्मीय मुस्कान के साथ बात करती थी।
‘‘हां, मुझे किताबों से बहुत प्रेम है, पढ़ भी नहीं रहा हूं तो सिर्फ उनके पास होने से ही मुझे अच्छा लगता है। आपको पता है किताबों से खुशबू आती है, पन्नों की भी और शब्दों की भी!!’’, मैं तो बोलने के लिए तैयार ही बैठा था। किताबों के बारे में बात करने वाला मुश्किल से ही मिलता है।
‘‘आप बाहर क्यों नहीं आते-जाते? आपका मन बहलेगा और लोगों मिलना-जुलना भी होगा? पहले मुझे भी किसी से मिलना अच्छा नहीं लगता था, महीनों कमरा बंद करके बैठे रहती थी। लेकिन फिर मुझे लगा कि भले ही और लोग मुझे देख कर दरवाजे बंद कर रहे हों लेकिन कम-से-कम मुझे तो अपने दरवाजे खोल कर रखने चाहिए।’’
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