उपन्यास अंश -
‘‘सही कर रही हैं आप’’, अब मैं उसे क्या बताता कि सिर्फ व्हील चेयर होने से कोई घूमने नहीं जा सकता उसके लिए अच्छे भले ताकतवर कम-से-कम दो इंसान चाहिएं।
लगभग छह-सात दिन काम चला था और मैं इस एक सप्ताह में उसके बहुत नजदीक आ गया। किसी इंसान के नजदीक जाना वैसे ही होता है जैस किसी पहाड़ की चोटी से नीचे झांकने के लिए बिलकुल किनारे तक सरक आना। इसमें डर तो लगता है लेकिन जो नजारा दिखता है वो पीछे से कभी नहीं देखा जा सकता है। इस एक सप्ताह में काया के भीतर की कई पर्तें मेरे सामने खुली। वो अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी। उसने बताया कि जब 6-7 साल की उम्र में पहली बार उसने अपने चचेरी बहन के कपड़े पहन लिए और उन्हें उतारने को तैयार नहीं हुआ तो किस तरह से उसकी बुरी तरह पिटाई हुई थी। उस दिन से शुरू हुआ अपमान और हिंसा का व्यवहार आज तक चालू है, भले ही कम हो गया है लेकिन खत्म नहीं हुआ।
‘‘मैं नहीं जानती ये क्या है! लेकिन मैं एक अनन्त बेचैनी का शिकार हूं, मैं ये नहीं हूं जो मै दिख रही हूं। जितना मैं लड़की बनती हूं उतनी ही मुझे राहत मिलती है, ये चूड़ियां, ये बिन्दी, ये मेकअप, ये सलवार-सूट, अकेले मैं तो मैं साड़ी भी पहनती हूं, सब मेरे अंदर बने हुए कभी ठीक न होने वाले जलन भरे हुए घाव पर ठंडे मरहम की तरह काम करते हैं। मैं नहीं जानती इसका क्या कारण है लेकिन मुझे अपने शरीर का रोम-रोम एक औरत की तरह महसूस होता है, एक औरत जो प्यार पाना चाहती है, प्यार करना चाहती है, खुश रहना चाहती है, खुशी देना चाहती है ...’’ ये शब्द उसने उस दिन कहे थे जब काम खत्म हो गया था। और वो सब हिसाब-किताब कर चुकी थी। सब लोग बाहर थे जब उसने ये बातें मुझसे कहीं हम दोनों कमरे में अकेले थे। अपनी बात खत्म करके उसने मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर कस के थाम लिया। पहली बार किसी स्पर्श में मुझे इतनी मजबूती और कोमलता का एक साथ अहसास हो रहा था। मुझे लगा ताजा खून मेरे हर अंग में दौड़ गया और मुझे अपने कमजोर पैरों तक में सनसनाहट का अहसास होने लगा। किसी की मुझमें दिलचस्पी है, वो भी उसकी जिसका आकर्षण सोते-जागते मुझे गुदगुदाता रहता है।
उसी समय पापा अंदर आए और काया को मेरा हाथ पकड़े हुए देख लिया। उनको देखते ही काया ने झटके से मेरा हाथ छोड़ दिया लेकिन पापा के चेहरे के पहले कुछ आश्चर्य और फिर उसके बाद आए तेज गुस्से के भाव ने जता दिया कि उन्होंने सब देख लिया है। काया तेजी से बाहर चली गयी, पापा कुछ देर किंकर्तव्यविमूढ़ से वहां खड़े रहे फिर तेज कदमों से बाहर चले गए। उसके बाद उस दिन मेरी किसी से कोई बात नहीं हुई, एक ठोस खामोशी चारों तरफ तनी रही। रात को मम्मी खाना बिना एक भी शब्द बोले मेरे पास रख गयीं और खा लेने के बाद खाली बर्तन उठा कर ले गयी। सब ऐसा व्यवहार कर रहे थे जैसे किसी का एक्सीडेंट हो गया हो या कोई मर गया हो।
अगले दिन सुबह में उठा तो देखा पापा बाहर क्यारी और गमलों में पानी दे रहे थे। बोगनविलिया, सदाबहार, मोरपंखी के पत्ते, तने और फूल सब पानी से धुल कर चमक रहे थे, उन पर धूप के कुछ बेतरतीब टूकड़े बिखरे हुए थे। निगाह ऊपर उठायी तो देखा बंदरों के कुछ बच्चे सामने की छत पर तने तारों पर धमाचैकड़ी कर रहे थे। इतनी देर में मम्मी चाय का गिलास लेकर कमरे में आ गयीं, मुझे पकड़ाया और मेरे पास कुर्सी खींच कर बैठ गयीं। कुछ देर तक शांत रह कर उन्होंने अपने शब्दों को जमा किया और यथासंभव संयत स्वर में बोलना चालू किया, ‘‘बेटा, तुम समझदार हो, इतना पढ़ते-लिखते हो, अच्छी खासी उम्र पार कर चुके हो फिर ऐसी हरकत की तुमसे कैसे हो गयी?’’
‘‘कौनसी हरकत?’’, मैंने जानबूझ कर अनजान बनते हुए कहा।
‘‘तुम जानते हो बेटा, मैं क्या कह रही हूं! अनजान बनने की कोशिश मत करो। काया या जो भी उसका नाम है, यहां काम करने आया था और इससे ज्यादा कुछ नहीं। तुम नहीं जानते क्या इस तरह के लोग कैसे होते हैं?’’
‘‘कैसे होते हैं मम्मी? क्या फर्क होता है उनमे? क्या उनके शरीर में दिल से खून पम्प नहीं होता?’’
‘‘हे भगवान! तुम कैसी पागलपन की बातें कर रहे हो? मैंने सिर्फ सुना था कि ऐसे लोग बड़ी आसानी से लोगों को फंसा लेते हैं, लेकिन तुमको? मुझे भरोसा नहीं हो रहा????’’
‘‘कोई किसी को नहीं फंसा रहा मम्मी, उसे मुझे फंसा कर क्या मिलेगा?’’
‘‘ऐसा तुम समझते हो, क्योंकि तुम्हें लगता है दुनिया बस तुम्हारे पलंग के पैताने और सिरहाने के बीच खत्म हो जाती है। लेकिन हकीकत ये है कि दुनिया कमीनेपन और धूर्तता से भरी है जिसे तुम जैसे दिमागी रूप से बच्चे नहीं समझ सकते। अगर ये किताबे पढ़ कर अकल आती होती तो बड़ी-बड़ी लाइबे्ररियों में अक्ल फर्श पर बहती रहती। मैं समझती गयी हूं कि तुमसे बात करना बेकार है, तुम्हारी हालत तो ऐसी है कि किसी ने प्यार के दो बोल बोले और तुम उस पर निहाल हो जाआगे। जब परिणाम भुगतने का समय आएगा तो सिर्फ तुम नहीं रोओगे साथ में हमें भी रोना होगा। इसलिए अब हमें खुद देखना होगा कि हम क्या करें। तुम बस इतनी कृपा करो कि काया का फोन आए तो मत उठाना!’’, मां ने झटके से कुर्सी पीछे की और खाली गिलास उठा कर कमरे से बाहर निकल गयी।
मम्मी की बात से मुझे उम्मीद हो गयी कि काया फोन कर सकती है। मैंने फोन को पास सरका कर रख लिया और इंतजार करने लगा शायद उसका फोन आ जाए। उसके बाद हमारे बीच खामोशी और सघन हो गयी। दिन भर मेरी किसी से बात नहीं हुई। मैंने दोस्तोव्योस्की की ‘बोड़म’ उठा कर पढ़ने की कोशिश की लेकिन मन नहीं किया, कीट्स और बायरन की कविताओं में दिमाग लगाने की कोशिश की लेकिन वो भी बेकार रहा। आखिरकार मैंने किताबों को समेट दिया और राइटिंग बोर्ड उठा कर कुछ लिखने की चेष्टा की लेकिन काफी देर तक पेन हाथ में घुमाने के बाद भी जब कुछ नहीं लिख पाया तो राइटिंग बोर्ड भी उठा कर रख दिया। और मसनद पर सर टिका का छत को घूरने लगा।
काया का ख्याल लगातार मेरे दिमाग में था। हो सकता है सच में वो मुझे बेवकूफ बना रही हो। लेकिन उससे क्या फर्क पड़ता है? इस बहाने कुछ समय उसके साथ रहता हूं, उसके साथ की आत्मीयता को सिप ले-ले कर तसल्ली से पीता हूं, उसे अपनी सुनाता हूं, उसकी सुनता हूं, उसके स्पर्श को ठंड से जकड़े हाथों पर पड़ती गुनगनी धूप की तरह और धूप से जलती पीठ पर बर्फ के टुकड़े की तरह महसूस करता हूं। लेकिन वो काॅल तो करे!!
कई काॅल आए, टेलीफोन के बकाया बिल के बारे में, इन्श्योरेंस करवाने के लिए, यहां तक कि रांग नंबर भी आया लेकिन काया का फोन नहीं आया। मेरी किसी से कोई बातचीत नहीं हुई। मैं पूरे दिन कमरे में अकेला रहा, कभी छत को ताकता तो कभी किसी दीवारों पर ख्यालों की तरह रैंगती छिपकलियों को देखता रहा। मम्मी-पापा कोई भी मेरे कमरे में नहीं आया, बस मम्मी चुपचाप खाना रख गयीं। ढीला-सा उदास दिन सीलन भरी दीवार की पर्त की तरह उखड़ कर गिर गया। रात के खाने के बाद लेट गया। लाइट बंद कर ली। लाइट बंद करते ही बाहर आसमान अचानक चमक से उठा जैसे इंतजार कर रहा हो कि कब मैं लाइट बंद करूं और अपनी लाइट जलाए। चांद तो कहीं नहीं दिख रहा था लेकिन चांदनी चारों तरह फैली हुई थी और ढेर सारी चांदनी खिड़की से बह-बह कर अंदर आने लगी और फर्श पर बिखर गयी।
‘‘सही कर रही हैं आप’’, अब मैं उसे क्या बताता कि सिर्फ व्हील चेयर होने से कोई घूमने नहीं जा सकता उसके लिए अच्छे भले ताकतवर कम-से-कम दो इंसान चाहिएं।
लगभग छह-सात दिन काम चला था और मैं इस एक सप्ताह में उसके बहुत नजदीक आ गया। किसी इंसान के नजदीक जाना वैसे ही होता है जैस किसी पहाड़ की चोटी से नीचे झांकने के लिए बिलकुल किनारे तक सरक आना। इसमें डर तो लगता है लेकिन जो नजारा दिखता है वो पीछे से कभी नहीं देखा जा सकता है। इस एक सप्ताह में काया के भीतर की कई पर्तें मेरे सामने खुली। वो अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी। उसने बताया कि जब 6-7 साल की उम्र में पहली बार उसने अपने चचेरी बहन के कपड़े पहन लिए और उन्हें उतारने को तैयार नहीं हुआ तो किस तरह से उसकी बुरी तरह पिटाई हुई थी। उस दिन से शुरू हुआ अपमान और हिंसा का व्यवहार आज तक चालू है, भले ही कम हो गया है लेकिन खत्म नहीं हुआ।
‘‘मैं नहीं जानती ये क्या है! लेकिन मैं एक अनन्त बेचैनी का शिकार हूं, मैं ये नहीं हूं जो मै दिख रही हूं। जितना मैं लड़की बनती हूं उतनी ही मुझे राहत मिलती है, ये चूड़ियां, ये बिन्दी, ये मेकअप, ये सलवार-सूट, अकेले मैं तो मैं साड़ी भी पहनती हूं, सब मेरे अंदर बने हुए कभी ठीक न होने वाले जलन भरे हुए घाव पर ठंडे मरहम की तरह काम करते हैं। मैं नहीं जानती इसका क्या कारण है लेकिन मुझे अपने शरीर का रोम-रोम एक औरत की तरह महसूस होता है, एक औरत जो प्यार पाना चाहती है, प्यार करना चाहती है, खुश रहना चाहती है, खुशी देना चाहती है ...’’ ये शब्द उसने उस दिन कहे थे जब काम खत्म हो गया था। और वो सब हिसाब-किताब कर चुकी थी। सब लोग बाहर थे जब उसने ये बातें मुझसे कहीं हम दोनों कमरे में अकेले थे। अपनी बात खत्म करके उसने मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर कस के थाम लिया। पहली बार किसी स्पर्श में मुझे इतनी मजबूती और कोमलता का एक साथ अहसास हो रहा था। मुझे लगा ताजा खून मेरे हर अंग में दौड़ गया और मुझे अपने कमजोर पैरों तक में सनसनाहट का अहसास होने लगा। किसी की मुझमें दिलचस्पी है, वो भी उसकी जिसका आकर्षण सोते-जागते मुझे गुदगुदाता रहता है।
उसी समय पापा अंदर आए और काया को मेरा हाथ पकड़े हुए देख लिया। उनको देखते ही काया ने झटके से मेरा हाथ छोड़ दिया लेकिन पापा के चेहरे के पहले कुछ आश्चर्य और फिर उसके बाद आए तेज गुस्से के भाव ने जता दिया कि उन्होंने सब देख लिया है। काया तेजी से बाहर चली गयी, पापा कुछ देर किंकर्तव्यविमूढ़ से वहां खड़े रहे फिर तेज कदमों से बाहर चले गए। उसके बाद उस दिन मेरी किसी से कोई बात नहीं हुई, एक ठोस खामोशी चारों तरफ तनी रही। रात को मम्मी खाना बिना एक भी शब्द बोले मेरे पास रख गयीं और खा लेने के बाद खाली बर्तन उठा कर ले गयी। सब ऐसा व्यवहार कर रहे थे जैसे किसी का एक्सीडेंट हो गया हो या कोई मर गया हो।
अगले दिन सुबह में उठा तो देखा पापा बाहर क्यारी और गमलों में पानी दे रहे थे। बोगनविलिया, सदाबहार, मोरपंखी के पत्ते, तने और फूल सब पानी से धुल कर चमक रहे थे, उन पर धूप के कुछ बेतरतीब टूकड़े बिखरे हुए थे। निगाह ऊपर उठायी तो देखा बंदरों के कुछ बच्चे सामने की छत पर तने तारों पर धमाचैकड़ी कर रहे थे। इतनी देर में मम्मी चाय का गिलास लेकर कमरे में आ गयीं, मुझे पकड़ाया और मेरे पास कुर्सी खींच कर बैठ गयीं। कुछ देर तक शांत रह कर उन्होंने अपने शब्दों को जमा किया और यथासंभव संयत स्वर में बोलना चालू किया, ‘‘बेटा, तुम समझदार हो, इतना पढ़ते-लिखते हो, अच्छी खासी उम्र पार कर चुके हो फिर ऐसी हरकत की तुमसे कैसे हो गयी?’’
‘‘कौनसी हरकत?’’, मैंने जानबूझ कर अनजान बनते हुए कहा।
‘‘तुम जानते हो बेटा, मैं क्या कह रही हूं! अनजान बनने की कोशिश मत करो। काया या जो भी उसका नाम है, यहां काम करने आया था और इससे ज्यादा कुछ नहीं। तुम नहीं जानते क्या इस तरह के लोग कैसे होते हैं?’’
‘‘कैसे होते हैं मम्मी? क्या फर्क होता है उनमे? क्या उनके शरीर में दिल से खून पम्प नहीं होता?’’
‘‘हे भगवान! तुम कैसी पागलपन की बातें कर रहे हो? मैंने सिर्फ सुना था कि ऐसे लोग बड़ी आसानी से लोगों को फंसा लेते हैं, लेकिन तुमको? मुझे भरोसा नहीं हो रहा????’’
‘‘कोई किसी को नहीं फंसा रहा मम्मी, उसे मुझे फंसा कर क्या मिलेगा?’’
‘‘ऐसा तुम समझते हो, क्योंकि तुम्हें लगता है दुनिया बस तुम्हारे पलंग के पैताने और सिरहाने के बीच खत्म हो जाती है। लेकिन हकीकत ये है कि दुनिया कमीनेपन और धूर्तता से भरी है जिसे तुम जैसे दिमागी रूप से बच्चे नहीं समझ सकते। अगर ये किताबे पढ़ कर अकल आती होती तो बड़ी-बड़ी लाइबे्ररियों में अक्ल फर्श पर बहती रहती। मैं समझती गयी हूं कि तुमसे बात करना बेकार है, तुम्हारी हालत तो ऐसी है कि किसी ने प्यार के दो बोल बोले और तुम उस पर निहाल हो जाआगे। जब परिणाम भुगतने का समय आएगा तो सिर्फ तुम नहीं रोओगे साथ में हमें भी रोना होगा। इसलिए अब हमें खुद देखना होगा कि हम क्या करें। तुम बस इतनी कृपा करो कि काया का फोन आए तो मत उठाना!’’, मां ने झटके से कुर्सी पीछे की और खाली गिलास उठा कर कमरे से बाहर निकल गयी।
मम्मी की बात से मुझे उम्मीद हो गयी कि काया फोन कर सकती है। मैंने फोन को पास सरका कर रख लिया और इंतजार करने लगा शायद उसका फोन आ जाए। उसके बाद हमारे बीच खामोशी और सघन हो गयी। दिन भर मेरी किसी से बात नहीं हुई। मैंने दोस्तोव्योस्की की ‘बोड़म’ उठा कर पढ़ने की कोशिश की लेकिन मन नहीं किया, कीट्स और बायरन की कविताओं में दिमाग लगाने की कोशिश की लेकिन वो भी बेकार रहा। आखिरकार मैंने किताबों को समेट दिया और राइटिंग बोर्ड उठा कर कुछ लिखने की चेष्टा की लेकिन काफी देर तक पेन हाथ में घुमाने के बाद भी जब कुछ नहीं लिख पाया तो राइटिंग बोर्ड भी उठा कर रख दिया। और मसनद पर सर टिका का छत को घूरने लगा।
काया का ख्याल लगातार मेरे दिमाग में था। हो सकता है सच में वो मुझे बेवकूफ बना रही हो। लेकिन उससे क्या फर्क पड़ता है? इस बहाने कुछ समय उसके साथ रहता हूं, उसके साथ की आत्मीयता को सिप ले-ले कर तसल्ली से पीता हूं, उसे अपनी सुनाता हूं, उसकी सुनता हूं, उसके स्पर्श को ठंड से जकड़े हाथों पर पड़ती गुनगनी धूप की तरह और धूप से जलती पीठ पर बर्फ के टुकड़े की तरह महसूस करता हूं। लेकिन वो काॅल तो करे!!
कई काॅल आए, टेलीफोन के बकाया बिल के बारे में, इन्श्योरेंस करवाने के लिए, यहां तक कि रांग नंबर भी आया लेकिन काया का फोन नहीं आया। मेरी किसी से कोई बातचीत नहीं हुई। मैं पूरे दिन कमरे में अकेला रहा, कभी छत को ताकता तो कभी किसी दीवारों पर ख्यालों की तरह रैंगती छिपकलियों को देखता रहा। मम्मी-पापा कोई भी मेरे कमरे में नहीं आया, बस मम्मी चुपचाप खाना रख गयीं। ढीला-सा उदास दिन सीलन भरी दीवार की पर्त की तरह उखड़ कर गिर गया। रात के खाने के बाद लेट गया। लाइट बंद कर ली। लाइट बंद करते ही बाहर आसमान अचानक चमक से उठा जैसे इंतजार कर रहा हो कि कब मैं लाइट बंद करूं और अपनी लाइट जलाए। चांद तो कहीं नहीं दिख रहा था लेकिन चांदनी चारों तरह फैली हुई थी और ढेर सारी चांदनी खिड़की से बह-बह कर अंदर आने लगी और फर्श पर बिखर गयी।
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