किसी से भी पूछ लीजिये आपको
सबसे बड़ा दुःख कौन देता है तो लगभग सौ में से सौ लोग किसी का जिक्र कर देंगे या
किसी की ओर ऊँगली उठा देंगे! ऐसा लगता है जैसे पूरी दुनिया किसी न किसी से परेशान
है! हरेक किसी न किसी रिश्ते से परेशान है| जो इंसान है और जीवित है तो वह किसी न
किसी के साथ रिश्ते में होगा ही! दुनिया त्यागने का नाटक करने वाले बाबा और
धार्मिक गुरु भी किसी न किसी के साथ रिश्ते में होते ही हैं| अपनी सेवा करने वाले
दुनियावी लोगों के साथ हो या उनकी चरण वंदना करने वाले चेलों के साथ! जाहिर जब सभी
किसी न किसी रिश्ते में हैं तो सबसे बड़ा दुःख का कारण भी वह इन रिश्तों को ही बताएगा|
लेकिन क्या वाकई दूसरे ही
हमें दुःख देते हैं? जनाब ठहरिये, थोड़ी माथा-पच्ची कीजिये, जरा गहराई से सोचिये!
फटाफट किसी निर्णय पर पहुँच कर अपने दिमाग को राहत देने की आदत से बाज आइये! हमें
ज्यादा दुःख इस बात से नहीं है कि हमारे आस-पास के लोग क्या कह रहे हैं या क्या कर
रहे हैं बल्कि हमारी परेशानी ये है कि हम खुद को जो समझते हैं वे उसको मान्यता
नहीं दे रहे हैं| मान लिया हम बहुत भारी तोप हैं और अपने को फलाना या ढिकाना समझते
हैं लेकिन ऊपर से दिखने वाला ये भयंकर अहंकार भी भीतर से एकदम पिलपिला ही होता है
और दूसरों से सर्टिफिकेट चाहता है|
हर इंसान चाहे वो ताकत या
पैसे की ऊँचाई पर चढ़ा हुआ हो या एकदम निचले पायदान पर लेकिन वह अपनी एक छवि, खुद
के बारे में एक राय, स्वयं की एक तस्वीर बना के बैठा हुआ है यानी उसका सेल्फ| अपने बारे
में जो सोचता है उसके बारे में चाहता है कि उसके आस पास रहने वाला हर इन्सान उस
छवि को मान ले! खुद के अन्दर बैठी खुद की तस्वीर पर इस भरोसे की माला चढ़ा दे कि
हाँ भाईसाहेब आप अपने बारे में जो सोचते हैं आप बिलकुल वैसे ही हैं! चापलूसी,
तारीफ, भक्ति, प्रशंसा... सब इसी चाह के अलग-अलग नाम हैं कि किसी तरह अपनी खुद की
छवि को दूसरे लोग सत्यापित कर दें!
हमारे भीतर का ये भिखारी
चौबीस घंटे अपनी इस छवि का कटोरा लिए आतुर बैठा है; कि हर आने-जाने वाले के सामने
इस छवि के कटोरे को पसारे! और अगर उसने मान्यता की भीख नहीं डाली और कह दिया कि
बाबा आगे जाओ तो तुरंत ही हम बिलबिला उठेंगे! काट खाने को दौड़ेंगे, फुंफकारेंगे और
सामने वाला भारी पड़ गया या चुप रहने कि मजबूरी हो गयी तो भीतर-भीतर ऐसे सुलगेंगे
जैसे सूखे कच्चे कोयले!! बड़ी मजे कि बात है कि बड़े-बड़े तुर्रमखां, बड़ी-बड़ी हस्तियाँ;
जिनके पास ऊँची-ऊँची डिग्रियां हैं, रसूखदार पद हैं, समाज सेवक हैं, ज्ञानी-ध्यानी
हैं, पैसा है, ताकत है, धार्मिक पद हैं, योगाचार्य हैं, कुण्डलनी वगैरह सब जाग्रत
है वो भी नन्हे बच्चो की तरह, बल्कि उनसे से गए बीते हो कर कभी गिड़गिड़ाते तो कभी
गुर्राते हुए यही चाहते हैं कि दूसरे लोग उनके भीतर सरसराती इस चाह को प्यार से
सहला दें कि हाँ साहेब, हाँ सर, हाँ गुरु जी, हाँ प्रोफेसर... आप अपने बारे में जो
छवि पाल कर कर बैठे हैं वह एकदम सही है!! आप अपने बारे में बिलकुल ठीक सोचते हैं!!
इन्ही हालात में करेले पर
नीम चढाने की तर्ज पर आ गए जबर्दस्त तकनीकी से लैस कैमरों और मोबाइल की बाढ़! उसके
साथ ही इस सेल्फ को लग गया सेल्फी का चस्का!! अब मेरी खुद के बारे में जो तस्वीर
है उसे खींच कर दूसरों को दिखाऊँगा, पूरी दुनिया वाह-वाह न कर उठे तो बताना! इस
आन्तरिक भिखारीपन को इस सेल्फी ने चार चाँद लगा दिए| सिर्फ अपनी तस्वीर दिखा कर
शांति नहीं मिली तो ‘माय न्यू कार’, ‘माय न्यू फ्लैट’, ‘माय न्यू बाइक’ से शुरू
होकर फिर ‘माय लव’, ‘माय लाइफ’ ‘माय क्यूट बेबी’ तक जाता है जिसमे लाइक को देख कर
केंचुए सा पड़ा सेल्फ फूल कर अपने को सांप समझने लगता है| भविष्य दूर नहीं जब लोग
सेल्फी खींचेगे ‘माय न्यू ब्रीफ’, ‘माय न्यू ब्रा’ से लेकर ‘माय फ्रेश्ली डेड मॉम’,
‘मी एंड डेड बॉडी ऑफ़ माय एक्स’ वगैरह!
तो जनाब सेल्फी खींचते रहिये
लेकिन थोड़ा सेल्फ को भी देखते रहिये कि कहीं सेल्फ इस सेल्फी के पीछे छुप कर अपना
पगलापा तो नहीं कर रहा? अगर हाँ तो जरा इस सेल्फ की भी रंगे हाथों एक सेल्फी ले
लें ताकि उसका परदाफाश हो सके और आपकी जिंदगी कुछ चैन से बीत सके|


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