Sunday, June 15, 2014

काया नहीं तेरी - 3

उपन्यास अंश -

‘‘सही कर रही हैं आप’’, अब मैं उसे क्या बताता कि सिर्फ व्हील चेयर होने से कोई घूमने नहीं जा सकता उसके लिए अच्छे भले ताकतवर कम-से-कम दो इंसान चाहिएं।

लगभग छह-सात दिन काम चला था और मैं इस एक सप्ताह में उसके बहुत नजदीक आ गया। किसी इंसान के नजदीक जाना वैसे ही होता है जैस किसी पहाड़ की चोटी से नीचे झांकने के लिए बिलकुल किनारे तक सरक आना। इसमें डर तो लगता है लेकिन जो नजारा दिखता है वो पीछे से कभी नहीं देखा जा सकता है। इस एक सप्ताह में काया के भीतर की कई पर्तें मेरे सामने खुली। वो अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी। उसने बताया कि जब 6-7 साल की उम्र में पहली बार उसने अपने चचेरी बहन के कपड़े पहन लिए और उन्हें उतारने को तैयार नहीं हुआ तो किस तरह से उसकी बुरी तरह पिटाई हुई थी। उस दिन से शुरू हुआ अपमान और हिंसा का व्यवहार आज तक चालू है, भले ही कम हो गया है लेकिन खत्म नहीं हुआ।

‘‘मैं नहीं जानती ये क्या है! लेकिन मैं एक अनन्त बेचैनी का शिकार हूं, मैं ये नहीं हूं जो मै दिख रही हूं। जितना मैं लड़की बनती हूं उतनी ही मुझे राहत मिलती है, ये चूड़ियां, ये बिन्दी, ये मेकअप, ये सलवार-सूट, अकेले मैं तो मैं साड़ी भी पहनती हूं, सब मेरे अंदर बने हुए कभी ठीक न होने वाले जलन भरे हुए घाव पर ठंडे मरहम की तरह काम करते हैं। मैं नहीं जानती इसका क्या कारण है लेकिन मुझे अपने शरीर का रोम-रोम एक औरत की तरह महसूस होता है, एक औरत जो प्यार पाना चाहती है, प्यार करना चाहती है, खुश रहना चाहती है, खुशी देना चाहती है ...’’ ये शब्द उसने उस दिन कहे थे जब काम खत्म हो गया था। और वो सब हिसाब-किताब कर चुकी थी। सब लोग बाहर थे जब उसने ये बातें मुझसे कहीं हम दोनों कमरे में अकेले थे। अपनी बात खत्म करके उसने मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर कस के थाम लिया। पहली बार किसी स्पर्श में मुझे इतनी मजबूती और कोमलता का एक साथ अहसास हो रहा था। मुझे लगा ताजा खून मेरे हर अंग में दौड़ गया और मुझे अपने कमजोर पैरों तक में सनसनाहट का अहसास होने लगा। किसी की मुझमें दिलचस्पी है, वो भी उसकी जिसका आकर्षण सोते-जागते मुझे गुदगुदाता रहता है।

उसी समय पापा अंदर आए और काया को मेरा हाथ पकड़े हुए देख लिया। उनको देखते ही काया ने झटके से मेरा हाथ छोड़ दिया लेकिन पापा के चेहरे के पहले कुछ आश्चर्य और फिर उसके बाद आए तेज गुस्से के भाव ने जता दिया कि उन्होंने सब देख लिया है। काया तेजी से बाहर चली गयी, पापा कुछ देर किंकर्तव्यविमूढ़ से वहां खड़े रहे फिर तेज कदमों से बाहर चले गए। उसके बाद उस दिन मेरी किसी से कोई बात नहीं हुई, एक ठोस खामोशी चारों तरफ तनी रही। रात को मम्मी खाना बिना एक भी शब्द बोले मेरे पास रख गयीं और खा लेने के बाद खाली बर्तन उठा कर ले गयी। सब ऐसा व्यवहार कर रहे थे जैसे किसी का एक्सीडेंट हो गया हो या कोई मर गया हो।

अगले दिन सुबह में उठा तो देखा पापा बाहर क्यारी और गमलों में पानी दे रहे थे। बोगनविलिया, सदाबहार, मोरपंखी के पत्ते, तने और फूल सब पानी से धुल कर चमक रहे थे, उन पर धूप के कुछ बेतरतीब टूकड़े बिखरे हुए थे। निगाह ऊपर उठायी तो देखा बंदरों के कुछ बच्चे सामने की छत पर तने तारों पर धमाचैकड़ी कर रहे थे। इतनी देर में मम्मी चाय का गिलास लेकर कमरे में आ गयीं, मुझे पकड़ाया और मेरे पास कुर्सी खींच कर बैठ गयीं। कुछ देर तक शांत रह कर उन्होंने अपने शब्दों को जमा किया और यथासंभव संयत स्वर में बोलना चालू किया, ‘‘बेटा, तुम समझदार हो, इतना पढ़ते-लिखते हो, अच्छी खासी उम्र पार कर चुके हो फिर ऐसी हरकत की तुमसे कैसे हो गयी?’’

‘‘कौनसी हरकत?’’, मैंने जानबूझ कर अनजान बनते हुए कहा।

‘‘तुम जानते हो बेटा, मैं क्या कह रही हूं! अनजान बनने की कोशिश मत करो। काया या जो भी उसका नाम है, यहां काम करने आया था और इससे ज्यादा कुछ नहीं। तुम नहीं जानते क्या इस तरह के लोग कैसे होते हैं?’’

‘‘कैसे होते हैं मम्मी? क्या फर्क होता है उनमे? क्या उनके शरीर में दिल से खून पम्प नहीं होता?’’

‘‘हे भगवान! तुम कैसी पागलपन की बातें कर रहे हो? मैंने सिर्फ सुना था कि ऐसे लोग बड़ी आसानी से लोगों को फंसा लेते हैं, लेकिन तुमको? मुझे भरोसा नहीं हो रहा????’’

‘‘कोई किसी को नहीं फंसा रहा मम्मी, उसे मुझे फंसा कर क्या मिलेगा?’’

‘‘ऐसा तुम समझते हो, क्योंकि तुम्हें लगता है दुनिया बस तुम्हारे पलंग के पैताने और सिरहाने के बीच खत्म हो जाती है। लेकिन हकीकत ये है कि दुनिया कमीनेपन और धूर्तता से भरी है जिसे तुम जैसे दिमागी रूप से बच्चे नहीं समझ सकते। अगर ये किताबे पढ़ कर अकल आती होती तो बड़ी-बड़ी लाइबे्ररियों में अक्ल फर्श पर बहती रहती। मैं समझती गयी हूं कि तुमसे बात करना बेकार है, तुम्हारी हालत तो ऐसी है कि किसी ने प्यार के दो बोल बोले और तुम उस पर निहाल हो जाआगे। जब परिणाम भुगतने का समय आएगा तो सिर्फ तुम नहीं रोओगे साथ में हमें भी रोना होगा। इसलिए अब हमें खुद देखना होगा कि हम क्या करें। तुम बस इतनी कृपा करो कि काया का फोन आए तो मत उठाना!’’, मां ने झटके से कुर्सी पीछे की और खाली गिलास उठा कर कमरे से बाहर निकल गयी।

मम्मी की बात से मुझे उम्मीद हो गयी कि काया फोन कर सकती है। मैंने फोन को पास सरका कर रख लिया और इंतजार करने लगा शायद उसका फोन आ जाए। उसके बाद हमारे बीच खामोशी और सघन हो गयी। दिन भर मेरी किसी से बात नहीं हुई। मैंने दोस्तोव्योस्की की ‘बोड़म’ उठा कर पढ़ने की कोशिश की लेकिन मन नहीं किया, कीट्स और बायरन की कविताओं में दिमाग लगाने की कोशिश की लेकिन वो भी बेकार रहा। आखिरकार मैंने किताबों को समेट दिया और राइटिंग बोर्ड उठा कर कुछ लिखने की चेष्टा की लेकिन काफी देर तक पेन हाथ में घुमाने के बाद भी जब कुछ नहीं लिख पाया तो राइटिंग बोर्ड भी उठा कर रख दिया। और मसनद पर सर टिका का छत को घूरने लगा।

काया का ख्याल लगातार मेरे दिमाग में था। हो सकता है सच में वो मुझे बेवकूफ बना रही हो। लेकिन उससे क्या फर्क पड़ता है? इस बहाने कुछ समय उसके साथ रहता हूं, उसके साथ की आत्मीयता को सिप ले-ले कर तसल्ली से पीता हूं, उसे अपनी सुनाता हूं, उसकी सुनता हूं, उसके स्पर्श को ठंड से जकड़े हाथों पर पड़ती गुनगनी धूप की तरह और धूप से जलती पीठ पर बर्फ के टुकड़े की तरह महसूस करता हूं। लेकिन वो काॅल तो करे!!

कई काॅल आए, टेलीफोन के बकाया बिल के बारे में, इन्श्योरेंस करवाने के लिए, यहां तक कि रांग नंबर भी आया लेकिन काया का फोन नहीं आया। मेरी किसी से कोई बातचीत नहीं हुई। मैं पूरे दिन कमरे में अकेला रहा, कभी छत को ताकता तो कभी किसी दीवारों पर ख्यालों की तरह रैंगती छिपकलियों को देखता रहा। मम्मी-पापा कोई भी मेरे कमरे में नहीं आया, बस मम्मी चुपचाप खाना रख गयीं। ढीला-सा उदास दिन सीलन भरी दीवार की पर्त की तरह उखड़ कर गिर गया। रात के खाने के बाद लेट गया। लाइट बंद कर ली। लाइट बंद करते ही बाहर आसमान अचानक चमक से उठा जैसे इंतजार कर रहा हो कि कब मैं लाइट बंद करूं और अपनी लाइट जलाए। चांद तो कहीं नहीं दिख रहा था लेकिन चांदनी चारों तरह फैली हुई थी और ढेर सारी चांदनी खिड़की से बह-बह कर अंदर आने लगी और फर्श पर बिखर गयी। 

Monday, June 2, 2014

काया नहीं तेरी - 2

उपन्यास अंश -

सैंकड़ो साल पहले कबीर को कैसे पता चल गया कि काया मेरी नहीं है? और मैंने कबीर से पूछा कब कि बताइए काया मेरी है या नहीं जो उन्होने मुझे जवाब दे दिया कि काया नहीं तेरी? और काया मेरी क्यों नहीं? सिर्फ इसलिए कि कोई नहीं चाहता कि काया मेरी हो?

हद है काया अगर मेरी हो तो किसी को क्या तकलीफ है? अरे मेरा उनसे लेना नहीे, देना नहीं, मैं अपनी जिंदगी जैसी भी है खुद जी रहा हूं, उनकी जिंदगी जैसी है वो जी रहे हैं, मैं कोई उनसे जिंदगी एक्सचेंज करने को तो कह नहीं रहा। क्या मैं किसी के मुंह का निवाला छीन रहा हूं? किसी के जीने में बाधा डाल रहा हूं, किसी तरह से तंग कर रहा हूं? उनकी दीवार पर जाके मूत रहा हूं? आखिर परेशानी क्या है? उनका मुझसे कोई सरोकार नहीं है, उनको मेरी परेशानियों से कुछ मतलब नहीं है लेकिन अगर मेरी खुशी का कहीं से कोई कारण बनता है तो उनके माथे पर बल पड़ जाते हैं। विकलांग होकर इस तरह जीना चाहता है? हंसना चाहता है, खेलना चाहता है, पढ़ना चाहता है, प्रेम करना चाहता है? अरे हम अपने बीच सांसे लेने दे रहे हैं, और तू उंगली पकड़ कर पहुंचा पकड़ना चाहता है? अरे जिंदा है ये क्या कम है कि जो अपने शरीर के हर अंग को महसूस करना चाहता है? विकलांग बस जिंदा रहें यही बहुत है, खाने को मिल रहा है, शरीर ढकने का मिल रहा है, सर ढकने को छत है, ढेर सारी दया मिल रही है ... यही औकात से बढ़ कर है, प्रेम, सेक्स, मित्रता, सम्बन्ध, भावनाएं जैसी विलासताओं के बारे में सोचना भी महापाप है। धर्म ग्रन्थ पढ़ो, अपने पूर्व जन्म के किए पापों के लिए भगवान के सामने गिड़गिड़ाओ कि अगले जन्म में तुम्हारे पापों का दण्ड नहीं मिले और तुम सामान्य शरीर के साथ जन्म ले सको।

चलो दूसरों का तो समझ आया लेकिन मेरे अपने घरवाले? मेरे माता-पिता जो मेरा मुंह देख कर जीते हैं, सुबह से शाम तक सिर्फ मेरे बारे में ही सोचते हैं, अपनी मौत से ज्यादा इस बात से घबराते हैं कि उनके मरने के बाद मेरा ख्याल कौन रखेगा, उनको काया से क्या तकलीफ है? उनको मालूम है काया के पास होते ही मेरा पूरा वजूद थिरकने लगता है, मैं अपनी देह के बंधन से मुक्त होकर अनंत की सैर करने लगता हूं, कभी बर्फ से ढकी चोटियों पर फिसलने लगता हूं तो कभी घास के बड़े-बड़े मैदानों में लोट लगाने लगता हूं, कभी समुद्र की मदहोश लहरों पर तैरने लगता हूं तो कभी ठंडी रेत के टीलों में धंसने लगता हूं, कभी पखेरू की तरह किसी ऊंचे पेड़ पर जा बैठता हूं तो कभी फूलों की घाटी में उतर कर खुद भी एक फूल बन कर एक नाजुक-सी डाली पर उग आता हूं।

फिर भी उन्होंने अपनी पूरी ताकत इस बात के लिए झोंक रखी है कि मैं किसी भी तरह काया से नहीं मिल पाऊं। काया को अपमानित करने, मुझे कोसने से लेकर जादू-टोना तक करवाने के हर तरह के उपाय उन्होंने आजमा लिए हैं। काया की रीढ़ गली हुई नहीं है, उसने मुझसे मिलना छोड़ दिया है। मैं जानता हूं भले वो और किसी से भी प्यार करती होगी लेकिन जब कभी वो अकेली होती होगी तो एक आंसू तो मेरे नाम का बनता है यार! माना कि मैं विकलांग हूं लेकिन क्या दिल, भावनाएं, सोच, विचार भी विकलांग होते हैं? ये सब सीमित हो सकते हैं लेकिन विकलांग नहीं। हो सकता है मुझे सामान्य लोगों की तरह रिश्ते बनाने का हक नहीं है लेकिन अपने को सुलगाने, भीतर-ही-भीतर अपने को सेकने का हक तो मुझे भी है। शायद मेरे भीतर का यह दर्द ही रिस कर मेरी हड्डियों में आ गया है।

सोचने की जरूरत नहीं, बिना सोचे बता सकता हूं कि पहली बार काया से कब मिला था। बाथरूम के टूटे हुए फर्श की मरम्मत के लिए आयी थी। उसका नाम कई बार सुना था लेकिन कभी किसी ने उसे देखा नहीं था। किसी को उम्मीद नहीं थी कि वो हमारे घर आएगी, जिससे टाइल खरीदी थीं उसी से किसी बढि़या फर्श बनाने वाले को भेजने की कही थी और उसने काया को भेज दिया। उसे देखते ही सब सन्न रह गए। ये तो कोई नहीं कह सका आप वापिस चले जाओ लेकिन सब को धक्का सा लग गया और सब यही सोचने लगे कि किसी तरह जल्दी से काम खत्म हो और वो यहां से टले।

जैसे ही पहली बार हमारी नजरें एक-दूसरे से टकराईं उसने एक बड़ी गहरी मुस्कान के साथ मेरी ओर देखा। मैं व्हील चेयर पर था इसलिए काफी कमफर्टेबल था क्योंकि अगर व्हील चेयर पर न होउं तो सामने वाले पता नहीं चल पाता कि मैं विकलांग हूं और फिर उसके सामने चलने फिरने में दिक्कत होती है। लेकिन व्हील चेयर पर होने पर देखते ही पता चल जाता है कि मेरे साथ कुछ समस्या है और फिर कुछ छुपाने जैसा नहीं रहता।

उसकी गहरी मुस्कान एक नर्म, मासूम नश्तर की तरह मेरे भीतर उतर गयी। शायद आज से पहले कोई मुझे देखकर इस तरह मुस्कराया ही नहीं। मैं देर तक उसे देखता रहा। अद्भुत थी वो, अनूठी ... न जाने औरत थी या मर्द!! एक पुरुष की देह में कैद एक औरत की आत्मा्! आधी-अधूरी नहीं बल्कि एक भरपूर औरत, जो अपने औरतपने के हर क्षण को पूरी तरह जीना चाहती थी, बिना किसी शर्म या हीन भावना के। उसकी सोच ने उसके शरीर पर भी अपनी छाप छोड़ दी थी, उसके पूरे व्यक्तित्व में एक ऐसी कमनीयता, नारीत्व का ऐसा गहरा अहसास था जो मुझे कई बार पूरी औरतों में नहीं दिखता।

हाथों में चूडि़यां, कानों में बुंदे और बलखाती लटें, वाकई वो बला की खूबसूरत थी, कम-से-कम मुझे तो लगती ही थी। तराशी हुई तीखी नाक के नीचे पतले होठों पर लगी हुई लाल लिपिस्टिक और डिजायनर चूड़ीदार और सलवार। चाल में एक नाजुक लचक और बोलने में अद्भुत मिठास। इस बात को कहने में मुझे कोई हिचक नहीं है कि उसे देखते ही मुझ पर जो असर हुआ वो अब तक किसी को देख कर नहीं हुआ। जैसे किसी क्यारी में बहुत दिन से किसी ने पानी न डाला हो, मिट्टी चटक गयी हो, खरपतवार भी जल कर मर गयी हो, कैंचुए भी या तो मर गए हों या भाग गए हों, और फिर अचानक उसमें कोई ठंडा पानी उगलता हुआ पाइप लगा दे।

मैंने उसके बारे में पहले सुन रखा था लेकिन जो कुछ मैं जानता था उसका उसकी वास्तविकता से कोई नाता नहीं था। वह क्या है, कौन है यह मैंने उससे मिल कर ही जाना। कभी भी किसी इंसान को उन बातों से नहीं जाना जा सकता जो उसके बारे में होती हैं, और काया को तो बिलकुल ही जाना जा सकता। हमारी शुरूआती बातें जब चालू हुईं जब पत्थर लगाने वाले मजदूरों, मिस्त्रियों की निगरानी खड़े-खड़े करते हुए उसकी टांगे दुख जाती और कुछ पल सुस्ताने के लिए वो पानी का गिलास लेकर मेरी चारपाई के किनारे पर बैठ जाती थी।

‘‘किताबें आपके सिरहाने रखी रहती हैं!! मतलब आपको पढ़ने का शौक है? मुझे भी किताबें अच्छी लगती हैं लेकिन मैंने ज्यादा कुछ पढ़ा नहीं है।’’, वह अपनी उसी आत्मीय मुस्कान के साथ बात करती थी।

‘‘हां, मुझे किताबों से बहुत प्रेम है, पढ़ भी नहीं रहा हूं तो सिर्फ उनके पास होने से ही मुझे अच्छा लगता है। आपको पता है किताबों से खुशबू आती है, पन्नों की भी और शब्दों की भी!!’’, मैं तो बोलने के लिए तैयार ही बैठा था। किताबों के बारे में बात करने वाला मुश्किल से ही मिलता है।

‘‘आप बाहर क्यों नहीं आते-जाते? आपका मन बहलेगा और लोगों मिलना-जुलना भी होगा? पहले मुझे भी किसी से मिलना अच्छा नहीं लगता था, महीनों कमरा बंद करके बैठे रहती थी। लेकिन फिर मुझे लगा कि भले ही और लोग मुझे देख कर दरवाजे बंद कर रहे हों लेकिन कम-से-कम मुझे तो अपने दरवाजे खोल कर रखने चाहिए।’’

Tuesday, May 6, 2014

काया नहीं तेरी!!

(उपन्यास अंश)

मैंने खिड़की से देखा, बाहर रात काली नहीं दिख रही थी। किसी पके हुए फोड़े की तरह तमतमा रही थी, एक अजीब सी लालिमा उसके कालेपन में घुली हुई थी। कुछ देर तक बाहर देखने के बाद मैंने सोचा अब करवट लेने की कोशिश करनी चाहिए। कई बार गहरी-गहरी सांसे ली, अपने शरीर की पूरी ताकत को समेटा, जैसे ढीले पड़े लकड़ियों के गट्ठर को किसी तरह लपेटा जाए, पलंग के किनारे को हाथ से पकड़ा और सीधे से टेढ़ा होने के एवरेस्ट पर चढ़ने जैसा प्रयास आरम्भ किया। ताकत लगाते ही दर्द पूरे शरीर में बह चला जैसे अचानक कोई धीरे-धीरे करके कोई पुराना खुरंट उखाड़ रहा हो। एक बार मन में आया कि करवट बदलने का विचार त्याग दूं लेकिन मैं रूका नहीं और लगातार करवट बदलने के लिए जोर लगाता रहा। दर्द बढ़ रहा था, मेरी सांस फूल रही थी लेकिन करवट थी कि खत्म नहीं हो रही थी। सोचने की बात यह थी कि मुझे मौत पहले आएगी या करवट? वैसे ये प्रश्न फालतू का था क्योंकि करवट तो में कई बार बदलता था मौत तो एक बार भी नहीं आयी?

    आखिरकार करवट बदल गयी, कब बदली मुझे नहीं पता चला लेकिन करवट बदलते ही जैसे ही शरीर को ढीला छोड़ा दर्द एकदम गायब हो गया। सांस भी तेजी से सामान्य होने लगी, बस हल्के-हल्के दिल की धड़कन महसूस हो रही थी जैसे दिल ढीला हो गया हो और धड़कता हुआ इधर-उधर लुढ़क रहा हो। हद है! क्या बीमारी है? इसे मेरे हिलने-डुलने ही शिकायत है? मेरा शरीर न हुआ हमारा समाज हो गया, जो यथास्थिति का हद दर्जे का दीवाना है और जरा सा हिलाना-डुलाने पर बौखला जाता है।

वैसे क्या बीमारी होगी? डाक्टर ने कहा है कि पोलियो के कारण चल न पाने से मांसपेशियां अपनी ताकत खो बैठी हैं। कमाल है ताकत खो बैठी है तो इस जरा सा जोर डालते ही यूं हाहाकार-सा क्यों मचा देती हैं? मांसपेशियां ताकत खो बैठी है या अब चला-चली की बेला आ गयी? अभी तो कुछ जिया भी नहीं और सब खत्म होने का समय आ गया? अभी तक मैंने किस-किस चीज का अनुभव नहीं किया? अरे अभी तो कुछ भी नहीं किया .... सेक्स का अनुभव नहीं किया, इन दो कमरों के बाहर की दुनिया नहीं देखी, न जाने कितनी किताबें अभी तक नहीं छुई तक नहीं, कितने लोगों से मिलना रह गया है ..... वैसे अगर मौत आने का टाइम आ गया तो क्या करना चाहूंगा? सेक्स करना? लेकिन किससे? अरे जब मरने से पहले सिर्फ एक बार पता करना हो कि सेक्स क्या होता है तो क्या फर्क पड़ता है किससे? या जर्मेन ग्रीयर से मिलना? या 100 ईयर आॅफ साॅलिट्यूट दुबारा पढ़ना? इन्हीं सब बातों के बारे में सोच रहा था कि सच में मौत आ गई ..... पेट की निचले भाग में भोंथरी सी सुई चुभने का अहसास हुआ और उसी के साथ पिशाब का दबाव महसूस होने लगा।

ये सच में जीवित मौत है, बाथरूम तक जाना और फिर दुबारा बिस्तर पर चढ़ना। कई बार मुझसे कहा है कि बिस्तर पर ही फारिग होने का इंतजाम कर देते हैं लेकिन मैंने ही इंकार कर दिया। मैं उसके पाश्र्व प्रभावों से भलीभांति परिचित था, मम्मी-पापा जो अपना काम ही इस बुढ़ापे में जैसे-तेसे ढेल कर कर रहे हैं वो वो मुझे बिस्तर पर मूतने का इंतजाम कैसे कर पाएंगे।

कठोर प्रयासों के साथ एक-एक सेंटीमीटर का सफर करते हुए बाथरूम तक जाना और फिर वहां एक सीढ़ी चढ़ना और नाली तक पहुंचना। मुझे जमीन पर लेट कर जाने में भी कोई आपत्ति नहीं है, क्योंकि कोई मुझे नहीं देख रहा है लेकिन लेट कर तो एक-एक मिली मीटर भी नहीं घिसट पाउंगा। दर्द, फूलती सांसों और साथ छोड़ती मांसपेशियों के साथ ऐसा लगता है कि मेरे पेट के निचले भाग में कोई टाइम बम फिट है और किसी भी तरह उसे सही जगह पर पहुंचने से पहले फटने से बचाना है। यदा कदा उसमें से चिंगारी फूटती रहती हैं लेकिन फिर भी मुझे उसके विस्फोट को रोकना होता है।

दुबारा पलंग पर आकर लेटा तो लगा एक पूरा जीवन बीत गया, जिसमें दर्द, कष्ट, परेशानियां, असफलताएं, सफलताएं सब कुछ था। बिस्तर पर चढ़ने का आखिरी क्षण तो पूरा रोमांचक होता है जिसमें कई प्रयासों के बाद सफलता हाथ लगती है। दिमाग विचारशून्य हो गया हो गया और मुझे इस बात का अफसोस होने लगा कि किस तरह हम अपने जीवन को टेक फाॅर ग्रान्टेड ले लेते हैं? कहीं दर्द नहीं हो रहा और हम अपने दैनिक काम खुद कर ले रहे हैं क्या जीने के लिए इससे बड़े किसी सुख की आवश्यकता है?

अब जितनी जल्दी हो सके नींद आ जानी चाहिए, ताकि ये रात बीत सके। लेकिन अभी दवाई खानी है, मम्मी ने गिलास में पानी भर कर रख दिया है। थोड़ा टेढ़ा हूं इस तरह से दवाई खायी जा सकती है। स्लो मोशन में दवाई मुंह में डाली और पानी मुंह में उड़ेला, थोड़ी गड़बड़ हो गयी और जितना पानी मुंह के अंदर गया उतना ही बाहर आ गया।

‘‘शिट्!!’’ बिस्तर गीला हो गया और दवा की गोली मुंह में ही घूम कर रह गयी। गोली की कड़वाहट मुंह में घुल गयी और जीभ के पीछे तक कसैला हो गया। दुबारा पानी मुंह में उड़ेलना रिस्की हो सकता है गोली को यूंही निगलने की कोशिश करनी होगी। उंगली से गोली पीछे धकेली, निगलने की एक-दो कोशिश कीं और गोली चुपचाप अंदर चली गयी।

अब आराम से लेट सकते हैं और नींद का मौत की तरह इंतजार कर सकते हैं। देखते हैं पहले कौन आता है? वैसे दोनों में फर्क क्या है? सिर्फ इतना कि एक पास जाते समय हमें भरोसा होता है कि हम फिर इस बेतुके, अर्थहीन संसार में लौट कर आएंगे। आखिर कितने महीन अदृश्य आकर्षण के धागे से बंधे हैं हम इस संसार से, ये महीन धागे बार-बार हमें इस संसार में लौटने के लिए मजबूर करते है। बड़े-बड़े तूफानों को झेल जाना वाला ये धागा कई बार हल्के से छूने भर से टूट जाता है और फिर हम इस संसार में लौटने की अंतहीन लालसा से मुक्त हो जाते हैं।

सुबह चेहरे पर पड़ती चमकती धूप जिंदगी में वापस ले आयी। शायद मम्मी खिड़की का पर्दा खींचना भूल गयीं, वर्ना सुबह उठते ही पहले वो खिड़की का पर्दा खींच देती हैं। पापा टहल कर लौट आए थे और गेट के पास अपनी चप्पल झाड़ रहे थे। मम्मी का टहलना तो बंद हो चुका है, पापा भी कितने दिन तक अपने जबाव देते घुटनों के साथ टहर पाएंगे ये देखने की बात है। आते ही हमेशा की तरह पापा अपने बाबा आदम के जमाने के टू-इन-वन के पास पहुंच गए और वही भजन लगा दिया जो रोज सुबह मेरी जिंदगी हराम करता है।

‘‘काया नहीं तेरी .....’’ कबीर को मुझसे क्या दुश्मनी थी जो रोज सुबह पापा के साथ मिल कर मुझे चिढ़ाता है? ऊपर से ये भीमसेन जोशी, जिनकी आवाज हड्डी, मांस, मज्जा सब पार करके सीधे भीतर उतर जाती है। मुझे आज तक ये नहीं समझ आया कि पापा जानबूझ कर मुझे चिढ़ाने के लिए ये भजन लगाते हैं या उनको कभी इस बात का ध्यान ही रहता कि इस भजन में क्या कहा जा रहा है?

क्रमशः

Monday, February 17, 2014

रेल गाड़ी, रेल गाड़ी.... बीच वाले स्टेशन बोले…

बचपन में कभी रेल यात्रा पर निबंध नहीं लिख सका सोचता हूं आज इसे लिख डालूं! सुना है रेलवे विश्व का सबसे बड़ा नियोक्ता है और भारत का दिल पटरियों की खट-खट से ही धड़कता है। रेल यात्रा के आकर्षण ने इतना मजबूर कर दिया कि मैं रेल यात्रा के लिए उतारू हो गया। शुरुआत में ही टिकटों का मजेदार खेल देखने को मिला जब विकलांग प्रमाणपत्र रद्दी कागज साबित हुआ और पता चला कि छूट लेने के लिए तो कोई और प्रमाणपत्र होता है। फिर भी, यात्रा तो करनी ही थी! आखिर कुछ पाने  के लिए कुछ खोना भी पड़ता!!



आगरा के ब्रिटिश काल की याद दिलाते, ठंडी हवाओं से सिहरते फोर्ट स्टेशन पर रेल के इंतजार में माशुका के इंतजार से कम गरमाहट नहीं थी। वैसे स्टेशन पर आते समय भी ब्रिटिश काल के दर्शन हो गए थे जब किन्हीं एडीजी साहब के लिए स्टेशन के पास वाहन ले जाना रोका जा रहा था। इंतजार के बाद, थोड़ी सी लेट, धड़धड़ाती, हॉर्न बजाती, असीम ताकत से भरी रेल प्लेटफार्म पर आकर लगी तो मैं अपलक उसकी खूबसूरती निहारता रह गया। लेकिन जब बात व्हील चेयर चढ़ाने की आयी तो लगा कि रेल जी बेवजह ही नाराज है। सिर्फ एक लकड़ी के पटरे की व्यवस्था स्टेशन पर कर दी जाए तो व्हील चेयर सहज ही अंदर चढ़ जाएगी। लेकिन क्या कर सकते हैं संवेदनशीलता अभी सरकारी मशीनरी के लिए मंगल ग्रह पर बस्ती बसाने जैसा है। लेकिन इस बात पर किसी पर उंगली उठाना बेकार है, हमारे भीतर भरा संवेदनहीनता का पस जरा से अधिकारों का दबाव पड़ते ही चूने लगता है।

व्हील चेयर जैसे-तैसे चढी़ तो पता चला कि एसी डिब्बे में आप व्हील चेयर से अपनी बर्थ तक नहीं पहुंच सकते। अरे भाई विकलांग लोग कोई एसी में यात्रा नहीं करते है, उनके लिए अलग से डिब्बा लगता है न, उसमें जाइए। जब व्हील चेयर ले जाने के सभी प्रयास विफल हो गए तो आखिरी हथियार के तौर पर अपने रथ से कूद कर पार्थ को रण भूमि में आना पड़ा। सुबह के समय कुछ सोए, कुछ अधसोए लोग रेल के अंदर एक अजीब प्राणी को देख कर अचानक अचकचा गए। खैर, बर्थ तक पहुंच गए और ताजपोशी कर ली। उसके बाद समस्या थी कि व्हील चेयर कहां रखी जाए। कोच अटेंडेंट से जब यह प्रश्न किया तो पता चला वो एनलाइटेन्ड बंदा था। उसने सधे हुए स्वर में कहा - जब आप लाए हैं तो आप ही देखिए कि कहां रखी जाए। जीवन का यह सत्य तो बुद्ध भी नहीं बता पाए थे। उसके द्वारा दिए ब्रह्म सूत्र को कंठस्थ रखते हुए किसी तरह सीट के नीचे व्हील चेयर घुसायी और लोगों के आने-जाने का मार्ग बनाया।

परन्तु जब रेल चली तो उसकी लयबद्ध धमक और चाल से मन प्रसन्न हो गया। लगा कि वाकई रेल में कुछ ऐसा है जो दूसरे वाहनों में नहीं है। लोहे के लिबास में एक विराटता है जो पहियों पर अपनी मस्ती में दौड़ती जा रही है। उसकी ताकत के आगे बाधाएं खुद ही रास्ते से हट जाती हैं। वो जमीन से जुड़ी भी है और आजाद भी है।



चलने के कुछ देर बाद से ही जब वैंडरों ने चक्कर काटने शुरू किए तो पैन्ट्री कार में स्वच्छता और हाइजिन के पालन के बारे में सुनी हुई अनेक रोमांचक कथाएं याद आ गयी। लेकिन फिर भी रेल में यात्रा करना और पैन्ट्री कार का खाना नहीं खाना वैसे ही जैसे मंदिर जाना और प्रसाद नहीं ग्रहण करना। इसलिए ऑर्डर किया और और पूरे श्रद्धा भाव से खाया, बिना मन में कोई नकारात्मक भाव लाए हुए। ये अलग बात है कि ब्रेड में मक्खन खोजना पड़ा और कटलेट में स्वाद। कॉफ़ी पता नहीं किस पानी से बनी थी लेकिन फिर भी पीने में ठीक थी। कुल मिला कर मजा आया।

जैसे-जैसे रेल लेट होने के बावजूद गंतव्य के पास पहुंच रही थी मन में चिंता घर कर रही थी। मेरे पास समर्पित भतीजे-भतीजियों की एक छोटी सी सेना थी लेकिन उस सेना के लगभग सभी सिपाही घायल हो रखे थे। किसी का कुछ दिनों पहले ही प्लास्टर उतरा था तो किसी को रेल यात्रा के दौरान ही नाखुन  में चोट लग गयी थी, तो कोई स्पोन्डेलाइटिस का शिकार था। लेकिन मैं मन-ही-मन यह सोच कर अपने को सांत्वना दे रहा था कि कई युद्ध घायल सेनाओं ने भी जीते हैं।

व्हील चेयर तक पहुंचने के बाद उस पर बैठना और फिर उसे नीचे उतारने के लिए अच्छी खासी मसल पॉवर की जरूरत थी। इस सब को देखते हुए सोचा कि कोच अटेन्डेंट से बात कर ली जाए लेकिन वो गालिब के मुरीद थे, काफिर मुंह से लगी है ऐसी कि छूटती ही नहीं वाले, चलती रेल के मयखाने में अपने जाम के साथ खोए हुए थे। फिर सोचा चलो टीटी से इस बारे में कुछ चर्चा कर ली जाए। उन्होंने दार्शनिक अंदाज में पूछा कि उतरने में आपको दिक्कत क्यों है? क्या पहली बार रेल में यात्रा कर रहे हैं या आपके पास लगेज़ ज्यादा है। उनसे पूछा कि स्टेशन पर रेल कितनी देर रुकती है तो उन्हें बड़ी नम्रता से कहा मुझे नहीं पता। जब उन्हें यह बताया गया कि इन्टरनेट पर वहां सिर्फ पांच मिनट रुकना दिखा रहा है तो क्या चालक या गार्ड से सम्पर्क करके उसे कुछ देर और रुकाया जा सकता है क्योंकि उतरने में इससे ज्यादा समय लग सकता है और यदि उतारते समय रेल चल पड़ी तो गंभीर दुर्घटना हो सकती है। इस पर टीटी जी ने गंभीर मुद्रा बनायी और कहा - नहीं यह तो असंभव है, रेल को एक मिनट भी अधिक समय तक नहीं रुकाया जा सकता! आप पहले से दरवाजे के पास पहुंच जाइए।

खैर, फिर सेना अलग-अलग दिशाओं में दौड़ी और पता करा कि कहां-कहां से सहायता मिल सकती है। पता चला रेल में कुछ प्राइवेट कोच अटैन्डेंट भी होते हैं जो भारतीय रेल के कर्मचारी होने की बीमारी से ग्रस्त नहीं होते। उनमें से एक सहर्ष सहायता के लिए तैयार हो गया। एक-दो अनजान यात्री स्वयं ही तैयार हो गए और कह दिया कि किसी भी तरह की चिंता करने की जरूरत नहीं है। यहां तक मेरी सेना के जिस कमांडर के हाथ का प्लास्टर अभी ही उतरा था उससे कह दिया कि तुम्हें हाथ लगाने की भी जरूरत नहीं है। पैन्ट्री कार से सामान लेकर पूरी रेल में पहुंचाने वाले ने भी अपनी भुजाओं की शक्ति का प्रदर्शन करते हुए स्टेशन आने से पहले ही एक बार में व्हील चेयर पर बैठा दिया। जब स्टेशन आया तो पता ही नहीं चला कि व्हील चेयर कब प्लेटफार्म पर उतर गयी। उन यात्रियों का आभार प्रकट करने के लिए गरदन घुमायी तो देखा वो बिना धन्यवाद की प्रतीक्षा किए भीड़ में खो चुके थे।     

Friday, December 27, 2013

अतीत की ओर - 2

सड़क और कार का सम्बन्ध भी विचित्र है, कार सड़क की तलाश में भागती रहती है, उसी के साथ रहती है फिर भी उसके ही पीछे भागती रहती है।


क्या प्यास है?
जितना पियूं उतनी ही भड़कती है!

कुछ घंटो के बाद जब पूरे शहर से बाहर-बाहर ही गुजार देने वाला कानपुर का विशाल फ्लाई ओवर आया तो मुझे उत्तर प्रदेश के इस मानचेस्टर का अतीत याद आ गया। अंग्रेजो के जमाने से कानपुर के व्यापार को तबाह करने की कोशिशें होती रही और आजादी के बाद भी इसके इसके व्यापार की बर्बादी की दास्तान चलती रही। इसके बावजूद भारत के सबसे बड़े औद्योगिक शहरों में यह 9वें स्थान पर है। इसकी भौगोलिक स्थिति बड़ी महत्वपूर्ण है,  यह भारत के कई हिस्सों को सड़क मार्ग से आपस में जोड़ता है, बंगाल से उत्तर प्रदेश और सभी मध्य और दक्षिणी इलाके। यहां ट्रकों की इतनी आवाजाही है कि कई बार तो लगता है कि पूरा शहर ट्रकों से अटा पड़ा है और अहर्निश माल लादने और उतारने में लगा है।

ये ओवर ब्रिज कोई साधारण ओवर ब्रिज नहीं है। आगरा जैसे पूरे शहर की लम्बाई इसके सामने बौनी प्रतीत होती है। इस पर यात्रा करते समय लगता है कि आप बस भाग रहे हैं, और सब कुछ आपके साथ भाग रहा है। बिलकुल जैसे जिंदगी में, सब कुछ पीछे छूटता जा रहा है लेकिन हम समझते हैं कि सब कुछ हमारे साथ चल रहा है।

इस ब्रिज को पार करने के बाद जब आगे बढ़े तो धीरे-धीरे लगने लगा यहां के लोग बड़ी ही धार्मिक प्रवृत्ति के ईश्वर पर अटूट विश्वास करने वाले लोग हैं। हर वाहन चालक उनके लिए एक परमसत्ता का रूप है जो उनके भाग्य के अनुसार उनकी जान की परवाह करेगा। वो सड़क पार करते हैं तो बड़े ही साक्षी भाव से, मात्र सीधे देखते हुए, न दांए, न बाएं। डिवाइडर पर कई बार ‘प्रकृति की पुकार’ का जवाब देने जाते हैं और फिर नाड़ा समेटते हुए एक ही झटके से डिवाइडर से सड़क पर दिव्य आत्माओं की तरह प्रकट हो जाते हैं। ऐसे में अगर जरा सी भूल हुई तो तैयार रहिए कि आस-पास के गांव वालों के हत्थे चढ़ गए तो आपको भी दिवंगत करने की तैयारी कर लेंगे।

लगता वाहन चालकों से ये बैर अंग्रेजों के जमाने की उपज है। अंग्रेज लोग ही पहली बार यहां कारें, जीप वगैरह लाए थे और उन्हें ऐसे कानून बनाए कि कार के नीचे दब कर कोई भारतीय मर जाए तो उन्हें ज्यादा कानूनी लफड़े में न फंसना पड़े। मजेदार बात यह है लगभग यही कानून आज भी लागू हैं। शायद तभी से वाहन चालकों से बैर पैदा हो गया कि अगर कार के नीचे कोई पैदल या साइकिल वाला आए तो सबसे पहले कार वाले को ठोको। वैसे भी आते-जाते किसी पर भीड़ के साथ मिलकर हाथ जमाना हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है। अकेले में कोई भी ऐसा काम करना आसान नहीं है जब तक ये भीड़ वास्तव में या मानसिक रूप से हमारे वजूद पर हावी न हो जाए।

काशी जब सिर्फ 150 किमी रह गया तो सड़क पर लम्बे जाम के दर्शन हुए। गाडि़यों की कतार कितनी लम्बी थी कहना मुश्किल था, जहां तक निगाह जाती बस गाडि़यां ही गाडि़या नजर आती थीं। सारा रास्ता इतनी तेजी से पार हो गया लेकिन इस जाम को देख कर लग रहा था कि ये अब इतने पास आकर भी रास्ता पार करना आसान नहीं है। कहते हैं न -

डुबती हैं कश्तियां साहिल पर भी
चोट खाते हैं लोग फूलों से भी

आस-पास के लोगों से पूछा की जाम का क्या कारण है तो पता चला कि आगे बस्ती है और सड़क पर ताजिए रख कर मातम मनाया जा रहा है। भारत के हर नागरिक को अपनी धार्मिक स्वतन्त्रता है और वह अपनी इच्छा अनुसार हर प्रकार की धार्मिक क्रियाओं को कर सकता है। यहां तक आम तौर जघन्य अपराध की श्रेणी में आने वाला ‘आत्महत्या’ का अपराध भी जैन धर्म के अन्तर्गत कानूनी मान्यता प्राप्त है।

लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि भारत के नागरिकों और प्रशासन में इतना सिविक सेन्स नहीं है कि धार्मिक क्रियाओं के प्रकोप से उसमें भाग न लेने वाले लोगों को बचा सकें। आप किसी भी धर्म को मानने वाले हैं धर्म के नाम पर आप बड़ी आसानी से नागरिक सुविधाओं को ताक पर रख सकते हैं और आपका विरोध करने वाला बड़ी आसानी से ‘नास्तिक’, ‘काफिर’ या दुष्टात्मा साबित हो जाता है। जागरण कीजिए सड़क रोक दीजिए, कांवर निकालिए हाई वे जाम कर दीजिए, शबे बारात का जुलूस निकालिए रास्ते फंसा दीजिए या फिर मातम का उत्सव हाई वे पर मनाइए।

बहरहाल जब ताजिए उठे तो जाम खुला और रैंग-रैंग गाडि़यां चलनी चालू हई। इस बीच कुछ महापुरुषों ने डिवाइडर पर पत्थर लगा कर रोंग साइड से गाड़ी घुसा कर जाम को और बुरी हालत में फंसा दिया था। काफी देर बाद हालात सामान्य हुए और हाईवे पर हुआ दमे का जबरदस्त अटैक कुछ कम हुआ और उसकी सांस फिर से चलनी चालू हुई।

तब तक अंधेरा हो चुका था। सभी वाहन चालक अपर में हैड लाइटें जला कर दना-दना भाग रहे थे। शायद हमारे देश के इस इलाके में अपर में करके हैड लाइटें जलाना मर्दानगी का प्रतीक है। आखिर कोई अपने को नामर्द दिखाना चाहता है, इसलिए सब अपनी लाइटें हमेशा अपर में ही चलाते हैं चाहे दूसरी तरफ से आने वाला वाहन चालक कुछ देर के लिए अंधा ही हो जाए। वैसे आप जानते ही हैं कि हमारे देश का राष्ट्रीय रोग नपुंसकता ही है क्योंकि उसके इलाज के लिए हर जगह दीवारों पर लगा दिखता है। अपने वर्तमान स्वास्थ्य मंत्री जी ने भी बताया है कि मंत्री और सांसद सबसे ज्यादा यौन क्षमता की दवाइयां ही लेते हैं।

Saturday, December 21, 2013

अतीत की ओर .....

 काशी या अब वाराणसी की यात्रा करना अपनी ही जड़ों की ओर लौटना है, अपने ही अतीत की यात्रा है। इस यात्रा में बहुत कुछ ऐसा हुआ जिसे अगर मैंने नहीं लिखा तो मानसिक बदहजमी होना लाजिमी है। इसलिए आप सबसे माफी दुनिया में पहले से भरे साहित्यिक/असाहित्यिक कचरे को बढ़ाने के लिए। 

15 नवम्बर 2013

अभी कुछ दिन पहले तक डपटती हुई सी लगती धूप अब प्यार से बतियाने लगी थी, और सुबह के समय तो उसमें कुछ अलग ही मुलायमियत होती है। हाथ पैरों में पड़ती धूप ऐसी लगती है जैसे कोई गुनगनी रुई से सिकाई कर रहा हो। हर तरफ ठंडी-सी शांति थी बस नहा धोकर तैयार होने के बावजूद कुछ उनींदे से दिख रहे बच्चे स्कूल जाने के लिए सड़क के किनारे खड़े अपनी वैन का इंतजार कर रहे थे। ऐसे में जब बनारस के लिए यात्रा आरम्भ हुई तो यात्रा के हिसाब से बिलकुल उपयुक्त माहौल था। न गर्मी, न सर्दी, न आंधी, न घुटन!!
व्हील चेयर धारियों के लिए अपने देश में यात्रा करना या तो बड़ी मजबूरी होती है या एक बहुत बड़ी विलासता होती है। आम तौर से उन्हें घूमते हुए देख कर ज्यादातर लोगों का दृष्टिकोण होता है - हे भगवान तुम्हें भी घूमना है!! वैसे विकलांगों के बारे में और चीजों के लिए भी सब यही सोचते हैं, जैसे - हे भगवान तुम्हें प्रेम होता है, हे भगवान तुम्हारे अंदर सैक्स की भावनाएं हैं, हे भगवान तुम भी हर्ट होते हो, वगैरह वगैरह।

पहले योजना बनाई कि रेलगाड़ी से चलते हैं, आखिर भारतीय रेल विकलांगों के लिए इतनी सुविधाएं देती है। लेकिन टिकट वितरक तो सैयाद निकला, घर पर जो 3 सीट खाली दिख रही थीं वो स्टेशन पहुंचने तक 93 वेटिंग में बदल गयी, एजेंट को भेजा तो विकलांगता सर्टिफिकेट को मानने से इंकार कर दिया। वैसे गलती उसकी नहीं है, एक तो भ्रष्टाचार का रिवाज अपने यहां रोज सुबह हल्के होने से ज्यादा है ऊपर से उनको विकलांगों से व्यवहार करने के लिए कोई प्रशिक्षण भी नहीं है। (ब्रूटस इज़ एन आॅनरेबल मैन!!)

फिर कार से जाने का आखिरी विकल्प चुना गया और सुबह निकलने की तैयारी कर ली। रास्ते में भीड़-भाड़ नहीं थी और लेट होने के बावजूद भीड़ न होने के कारण हम एक घंटे से पहले ही यमुना एक्सप्रैस वे को पीछे छोड़ते हुए कानपुर हाई वे पर आ गए। प्राचीन उत्तरपथ से शेरशाह सूरी मार्ग और फिर अंग्रेजो द्वारा कुछ सुधार कर बनाई गयी जीटी रोड के बावजूद बढि़या हाईवे भारत में अधिक पुरानी चीज नहीं हैं। इस तरह के शानदार हाईवे पिछले एक दशक से ही दिखे हैं जिनमें विश्व मानदंड के हिसाब से कुछ कसर रहती हो लेकिन भारत के हिसाब से तो नयी चीज ही हैं। ट्रेनों की स्पीड में आजादी बाद से बहुत कम फर्क आया है लेकिन कारों की स्पीड तो सौ से नीचे होती ही नहीं। अगर गाड़ी के माध्यम से अहंकार को संतुष्ट किया जा रहा है तो बात ही क्या फिर तो 150 की गति भी मामूली है।

तेजी से भागती कार से पीछे भागते हरे पेड़ों की कतारें ऐसी लग रही थीं जैसे कोई चित्रकार विशाल कूंची से हरे रंग की लहराती लाइन बनाता जा रहा हो। ये लाइन ज्यादा दूरी तक नहीं बन पायी क्योंकि अचानक सड़क के बीचों-बीच बने अस्थायी टोल बूथ ने रफ्तार को लगाम लगा दी। हाइवे पर सरपट भागते हुए अगर आपके पास टोल बूथ से फ्री निकलने की कोई जुगाड़ नहीं है तो आपको वो अपने जीवन साथी के बाॅय फ्रेंड या गर्ल फ्रेंड की तरह दिखायी देंगे।

वैसे टोल की पूरी संकल्पना ही बड़ी मजेदार है, सरकार ने हाथ खींच लिए और नागरिकों से कह दिया कि भाई तुम जानो तुम्हारा काम जाने!! सड़क बनाने वाले की दुकान है, तुम्हें चाहिए तो उसका माल खरीदो, जिस रेट में मिल रहा है लो, नहीं चाहिए तो मत लो, फाल्तू में हमारा भेजा मत खाओ। लेकिन जिस तरह दुकानों में पुलिसवाले और अधिकारी फ्री का माल उड़ाते हैं वैसे यहां भी हैं, और उनकी तादाद ज्यादा है। बड़ी भारी पोल है इस टोल की जिस पर फिर कभी बात करेंगे।

जगह-जगह बने टोल माता के मंदिरों में चढ़ावा चढ़ाते गए और आगे बढ़ते गए। गाड़ी ने फिर से गति पकड़ी और जल्द ही इटावा के इलाके में पहुंच गए। सुना है डाकुओं का इलाका है, पकड़ वगैरह खूब पहुंचती हैं, बच्चे गुड्डे-गुडि़या से पहले कट्टा रखते हैं। मैंने दोनों तरह निगाह घुमायी तो कुछ भी अलग नहीं दिखा। वही कुछ पेड़, कच्चे पक्के मकान, दौड़ते अधनंगे बच्चे, किनारों पर साइकिलों पर कुछ अपने में खोए और कुछ कुतुहल से भरे लोग। कई बार टीवी चैनलों के चश्मे से दुनिया को देखते हुए हम सच्चाई से कितनी दूर हो जाते हैं?

लेकिन एक बात जरूर थी, टोल पर बैठे कर्मचारी के स्वर में हल्की-सी बारूद की महक थी - टोल निकालिए और आगे जाइए कोई फालतू बात नहीं। यह बात तब बोली गयी जब हमने उससे पूछा कि भाई ये टोल का क्या हिसाब-किताब है, हर जगह कच्चे टोल क्यों बना दिए हैं? क्या टोल लेने का कोई कानून नहीं है? उसके बाद हमने भी सोचा कि जल्दी टोल निकालें और भगें कही हमारी ही पकड़ न हो जाए।

Saturday, August 24, 2013

डॉक्टर साहब

छल्लों वाली कार विशालकाय गेट के सामने रुकी। ये बिल्डिंग किसी भी तरह से नर्सिंग होम नहीं लगती थी। बेशकीमती शीशों और आयातित टाइलों से सजी ये इमारत पांच सितारा होटलों को मात करती थी। यह शहर का सबसे अत्याधुनिक ट्रोमा सेन्टर था जहां आने के बाद अगर कोई जिंदा नही बचा तो शायद कहीं नहीं बचता।

सूटधारी शोफ़र ने दरवाजा खोला और मंहगे ब्रांडों की सफेद टी-शर्ट, गहरी नीली जीन्स, गहरी हरी आभा वाला धूप का चश्मा और हल्के भूरे रंग की चप्पल पहने लगभग 45-46 साल का एक व्यक्ति बाहर आया। बरगेंडी कलर के बेतरतीब पड़े बालों को ऊपर किया और सधी हुई चाल से गेट के पास आया। गेट पर खड़े हथियारबंद गार्ड ने सलाम ठोका और गेट खोल दिया। पहले लॉन और फिर दोनों तरफ रखे तरह-तरह के फूलों और पौधों से भरे गमलों के बीच संगमरमर के लम्बे कॉरिडोर को पार करके बड़े से हॉल में पहुंचा, सोफों की कतार पर बैठे कुछ मरीजों पर उड़ती-सी निगाह डाली और अपने भव्य केबिन के अंदर चला गया।

डा॰ विनोद देश के सबसे बड़े शल्य चिकित्सकों में से एक हैं। अस्थि रोग विशेषज्ञ हैं, दुर्घटना और आपातकालीन स्थितियों को संभालने में माहिर हैं। न्युरो सर्जन, एनेस्थीसिया, फिजीशियन और प्रशिक्षित सहायकों की एक पूरी टीम उनके साथ काम करती है। कहते है उनके हाथ में पकड़े चाकू से राहत के दरिया बहते हैं, लेकिन समस्या इतनी है कि राहत के इस दरिया में पानी तब ही आता है जब नोटों की झमाझम बारिश हो। कोई आदमी अगर दम तोड़ रहा हो तब भी यहां आने से पहले सौ बार सोचेगा।

उनके बारे में मशहूर है कि काम में तो महारत है लेकिन स्वभाव में जरा गर्मी है। मरीज या उसके किसी घरवाले ने अगर गलती से किसी बात पर सवाल दाग दिया तो उसे बाहर का रास्ता दिखा देते हैं और जब तक वो गिड़गिड़ा कर माफी नहीं मांग लेता मरीज को नहीं देखते भले ही वो तड़पता रहे। कोई बहुत ही वी.आई.पी. मरीज हो तो बात अलग है। पेमेन्ट में देरी हो जाए तो आपरेशन थियेटर में नहीं घुसते भले ही मरीज वहां बेहोश पड़ा रहे। हास्पीटल के कैम्पस में दवाखाना है, अगर सस्ती के चक्कर में कहीं ओर से दवा ले आए या उनकी सुझाई पैथोलौजी लेब के अलावा कहीं ओर टेस्ट करा लिए तो साफ कह देते हैं अब मरीज की कोई जिम्मेदारी नहीं है।

अभी केबिन में घुसे ही थे कि बाहर कुछ शोर सुनाई दिया।  डॉक्टर साहब को शोर-शराबा बिलकुल पसंद नहीं है। तमतमा कर बाहर की ओर निकले तो देखा गेट के पास कुछ लोग जमा थे। तेज कदमों से गेट की तरफ चले तो उनका सहायक डा॰ अनुज उनकी तरफ आता हुआ दिखा।

‘‘सर! कोई एक्सीडेंट का केस है!! 12-13 साल की लड़की है, छत से गिर पड़ी है, पास के कस्बे से लाए हैं, यही हॉस्पिटल सबसे पहले दिखा तो यहीं चले आए। देख कर ही गरीब लोग लग रहे हैं, बाद में पेमेन्ट के लिए फजीता करेंगे। मैंने कह दिया कि एमरजेन्सी ले कर जाओ यहां भरती नहीं होगी। उसी पर हल्ला मचा रहे हैं’’ डा॰ अनुज ने एक ही सांस में कहा।

‘‘सन्स ऑफ़ बिच, अन्दर पेशेन्ट्स एडमिट हैं, इनके शोर-शराबे से उनको परेशानी होगी। गार्डस को बोलो भगाएं इन्हें’’ डा॰ विनोद आगबबूला होते हुए गेट की तरफ बढ़े।

‘‘गार्डस! कम हियर!! फास्ट!! अनुज कॉल अदर गार्ड्स!!’’ गेट की तरफ बढ़ते हुए डा॰ विनोद के मुंह से लगातार शोले उछट रहे थे।

‘‘ओ. के. सर!’’ डा॰ अनुज अन्दर की ओर दौड़ गए।

‘‘विकास तुम्हें सैलरी इनकी शक्ल देखने को मिलती है? भगाओ इन्हें बाहर!’’ डा॰ विनोद गेट पर खड़े गार्ड पर बरसे।

‘‘डाक्टर साहब छोटी बच्ची है .... एक बार देख लो ... आपकी भी कोई बच्ची होगी ... डाक्टर साहब एक बार देख लो .... साहब लड़की की सांस चल रही है .... हंसती.खेलती बच्ची थी, छत से गिर गयी डाक्टर साहब ... एक बार देख लो डाक्टर साहब ... बच्ची मर जाएगी साहब ... आप देख लेंगे तो जान बच जाएगी’’ एक असमय अधेड़ से हो गए व्यक्ति ने डा॰ विनोद के पैर पकड़ लिए। बेजान से नीले रंग की शर्ट और पुरानी से पेंट पहने उस व्यक्ति की वीरान सी आंखों से आंसू तो नहीं बह रहे थे लेकिन उसकी पीड़ा साफ-साफ उसकी आंखों में तैर रही थी।

‘‘पैर छोड़ो’’, डा॰ विनोद ने झटके से पैर छुड़ाया। इस तरह के स्पर्श उन्हें बेहद ऑकवर्ड लगते हैं।

‘‘देखो भाई ... लड़की सीरियस है .. यहां भरती नहीं होगी ... आप सरकारी हॉस्पिटल में जाइए .... वर्ना ये गार्डस आपको धक्के मार कर यहां से भगा देंगे!!’’ डा॰ विनोद ने देख लिया था कि डा॰ अनुज पूरे हॉस्पिटल से दर्जन भर सिक्योरिटी गार्डस जमा करके गेट की तरह आ रहे थे।

‘‘नहीं डाक्टर साहब ... मरती है यहीं मरने दीजिए .. लिटा दे भाई यहां ... उसने मरना होगा तो यहीं मर जाएगी’’ वो व्यक्ति जमीन पर बैठ गया। टैम्पो में बैठे हुए दो लोग बेहाश लड़की को बाहर निकालने लगे।

‘‘गेट लॉस्ट!! गार्डस भगाओ इन्हें!’’ डा॰ विनोद कुछ पीछे हो गए। गार्डस अपने-अपने डंडे हाथ में लेकर पोजीशन संभालने लगे। तब तक दो लोगों ने लड़की को जमीन पर लिटा दिया। लग रहा था वो पूरी तरह सत्याग्रह के मूड में थे ... बिना किसी डर के। गार्डस को डंडे संभालते देख कर भी उन तीनों में कोई एक इंच भी नहीं हिला। आदमी को सबसे ज्यादा डराने वाली मौत ही कई बार आदमी को जबरदस्त साहसी भी बना देती है।

न चाहते हुए भी डा॰ विनोद की उड़ती हुई निगाह लड़की के चेहरे पर पड़ी। चेहरे में पता नहीं क्या था कि डा॰ विनोद के चेहरे की रंगत एकदम से उड़ गयी। लगने लगा कि वो अचानक बदल गए, कोई और इंसान हो गए, बिलकुल अलग!! निरभ्र नीले आकाश में अचानक काली घटाओं घिर आयीं, बुरी तरह बिजली चमकने लगी और तूफानी हवाएं चलने लगीं। एक पल को तो उनके कदम भी लड़खड़ा गए और किसी तरह अपने आप को संभाला।

‘‘हटो!!’’, आगे वाला गार्ड डन्डा लेकर आगे झपटा लेकिन उसका डंडा अपनी मंजिल तक पहुंच पाता इससे पहले डा॰ विनोद का हमेशा भकभकाता रहने वाला स्वर राख की तरह फीका और ठंडा-सा था , ‘‘रूक जाओ!! लड़की को आपरेशन रूम में पहुंचाओ!!’’

    सब लोग हक्के-बक्के थे, गार्ड भौंचक्का था और डा॰ अनुज फुसफसाया, ‘‘सर क्या कह रहे हो? ये लोग पैसे-वैसे नहीं दे पाएंगे ... लड़की मर-मुर गयी तो गांववाले मधुमक्खियों की तरह से ट्राली-जुगाड़ में भर कर आएंगे और आफत खड़ी कर देंगे!!’’

    ‘‘वार्ड बॉय को बुलाओ और इसे ऑपरेशन थियेटर में पहुंचाओ!!’’ डा॰ विनोद ने कहा और बिना किसी की ओर देखे मुड़ कर पीछे चले गए। उनकी चाल भी शिथिल थी, किसी पेशन्ट के ऑपरेशन टेबल पर दम तोड़ देने पर भी वो उसके छाती पीटते, दहाड़ मारते घरवालों के बीच से अपनी उसी शानदार चाल से निकलते थे। बुरी तरह घायल दर्द से चीखते घायल को ऑपरेशन टेबल पर पहुंचाने के बाद भी वो ऑपरेशन थियेटर में सधी हुई चाल से ही घुसते थे। लेकिन आज लग रहा था वो किसी तरह अपने को घसीट कर चल रहे थे।

    ऑपरेशन थियेटर में पहुंचकर डा॰ विनोद चुपचाख खड़े हो गए, फर्श की ओर ताकते हुए। दोनों हाथ जेब में डाल लिए। कुछ ही देर में दो वार्ड बॉय लड़की को पहिए वाली स्ट्रेचर पर लेकर आ गए। और ऑपरेशन टेबल पर लिटा दिया। डा॰ अनुज भी पीछे-पीछे आ गए।

‘‘आप लोग प्लीज बाहर चलिए!! मैं पेशेन्ट को खुद ही देख लूंगा।’’

तीनों कुछ देर तक इंतजार करते रहे कि शायद डा॰ विनोद कुछ और कहें लेकिन जब सिर्फ घना सन्नाटे ही वहां तैरता रहा तो तीनों एक दूसरे को अजीब नजरों से देखते हुए बाहर आ गए। डा॰ विनोद ने दरवाजा बंद कर दिया। बाहर सब असमंजस में थे, डा॰ अनुज और वार्ड बॉय सिर्फ आंखो ही आंखों में कुछ देर बात करते रहे फिर वहां से सरक लिए। लड़की के साथ आए तीनों लोग डा॰ साहब की इस अचानक मेहरबानी से सकपकाए हुए ऑपरेशन थियेटर के बाहर जमीन पर ही बैठ गए। काउंटर पर बैठी लड़कियां भी आपस में कानाफूसी करते हुए अपने काम में मशगूल होने का नाटक करने लगीं। डाक्टर के इंतजार में बैठे कई मरीज और उनके घरवाले अपनी घडि़यों पर निगाह डालने लगे, कमर सीधी करने के लिए हॉल में चक्कर काटने लगे।

ऑपरेशन थियेटर के अंदर डा॰ विनोद को कुछ चक्कर से आने लगे तो दीवार से सट कर खड़े हो गए। खड़े रहना भी कठिन हो गया तो वहीं दीवार से टिक कर जमीन पर बैठ गए। पता नहीं कितने वर्षों बाद डा॰ विनोद अपनी आभिजात्य छवि को छोड़ कर जमीन पर बैठे थे। ऊपर उठने की सबसे भारी कीमत यही चुकानी पड़ती है कि वो जमीन पर नहीं बैठ सकता।

निगाह ऊपर उठायी ऑपरेशन टेबल पर पड़ी बेसुध लड़की पर टिका दी। बेहोश थी, लेकिन छत से गिरने के बावजूद कहीं भी कोई बाहरी चोट का निशान नहीं था। लग रहा था जैसे सो रही है। उम्र 12-13 से ज्यादा नहीं होगी, रंग सांवला, साधारण नैन-नक्श, दुबला-पतला शरीर, सलवार सूट का रंग उड़ गया था या मिट्टी लग गयी थी यह कहना मुश्किल था। इस सब के बावजूद उस लड़की में खूबसूरती की एक अद्भुत सुगन्ध थी जो सिर्फ जंगल में अनायास उग आए फूलों में ही होती है। एक नजर देखने पर ये खूबसूरती नहीं दिखती, सब साधारण दिखता है। लेकिन जब गहराई से देखा जाता है तो साधारण की जमीन से असाधारणता की अलौकिक कोपल फूटती दिखती हैं। कुछ पल पहले तक जिसमें कुछ नजर नहीं आता है अगले ही पल उससे निगाहें हटाना मुश्किल हो जाता है। जैसे बर्फ से अचानक तपिश निकलने लगे या सूखी रेत से कलकलाती जल धारा!

उसमें कुछ ऐसा था जिसने डा॰ साहब के भीतर बनी अहंकार, कठोरता, आभिजात्यता और स्वार्थ की भव्य इमारत की नींव को एक तीव्र भूकम्प की तरह पल भर में हिला दिया और इमारत भरभरा का ढह गयी। उनको लग रहा था वो खुद ही इस खण्डहर में तब्दील हो गयी इमारत के सामने बैठे हैं, नितान्त अकेले और असहाय। जिस अतीत से बचने के लिए उन्होंने अपने चारों और घमंड, दिखावे और शाही जीवन की दीवारें खड़ी कर ली थीं, इस मानसिक भूकम्प से सब की सब धराशायी हो गयीं और अतीत बवंडर की तरह उनको घेर कर खड़ा हो गया।

आगरे का पुराना मोहल्ला था वो, सटे हुए घर, बीच में संकरी गलियां, सीलन और नालियों की मिलीजुली गंध  हर समय भरी रहती । धूप यहां कभी-कभार ही नीचे तक आती थी, ज्यादातर तो झज्जे पर ही बैठ कर लौट जाती थी। डाक्टर साहब उन दिनों 15-16 साल के विनोद हुआ करते थे। अमरूद खाते-खाते तिमंजले पर बिना रुके चढ़ जाते और रसोई से चुरा कर लायी गयी कागज की पुडि़या में बंधी चीनी फांकते हुए पतंगों की डोर खींचते तो लगता वो एक-आध बादल को नीचे खींच ही लेंगे।

पढ़ाई-लिखाई का कोई बोझ नहीं था, बस पास होना ही बहुत था और वो साल में एक महीने पढ़ के हो जाता था। इसलिए ढेर सारा समय था, टीवी था नहीं तो घर में टिकने की कोई जरूरत नहीं थी। छतों, दुछत्तियों, कोठों, गलियों में घूमने-फिरने के लिए काफी जगहें थीं। कही भी बतियाओं, कहीं भी उधम मचाओ किसी को खबर नहीं होगी। मुंडेरों पर बैठ कर चीलों को ताकते हुए गप्पे ठोकने का मजा ही अलग था। बंदरों को खदड़ने के लिए जगह-जगह रखे बांस कूदने  के भी काम आते।

विनोद की उम्र ऐसी थी कि नर्म, गुनगने ख्याल चैबीसों घंटे दिमाग में तैरते रहते। हर समय अपनी देह और सोच से जुड़ा कोई न कोई सवाल दिमाग में चहलकदमी करता रहता उसके अधकचरे उत्तर कभी खुद ही पैदा हो जाते तो कभी कोई साथी दे देता। कभी-कभार रद्दी में बिकी गुप्त ज्ञान की पुरानी किताबों के कुछ फटे हुए पन्नों को संभाल कर रखे हुए कोई मित्र मित्रता का मान रखते हुए एक-आध पन्ना फाड़ कर दे देता तो कई दिनों तक के मौज-मजे का साधन हो जाता। उसे असंख्य बार पढ़ लिया जाता, सीधा-उल्टा हर तरफ से जांच-परख कर देख लिया जाता। उसको पढ़ते समय कई बार ख्याल उबलने लगते और भाप में बदल कर मन की दीवारों पर दबाव बनाने लगते जैसे फट कर बाहर आना चाहते हों। अपने ही शरीर की खुद पड़ताल करने का मन करता लेकिन फिर एक दोस्त का कथन याद आता कि अपने हाथ को अगर वहां लगाया तो बहुत जल्द मौत हो जाएगी, टीबी, पीलिया जैसी बीमारियां लग जाएंगी और किसी तरह जिंदा बच भी गए तो शादी नहीं हो पाएगी।

ऐसे ही ख्यालों से घिरे हुए एक दिन तिगड्डे पर सबसे ऊंची छत पर चढ़ गया। बरसात का मौसम था, शाम के आसमान में कई रंगों के बादल एक दूसरे से उलझते हुए टहल रहे थे। सामने ही ताजमहल दिख रहा था और कई बादल उसके गुम्बद पर अटके हुए लग रहे थे। तोतों के झुंड तेजी से निकल रहे थे, शायद वो बारिश होने से पहले अपने आशियानों में पहुंच जाना चाहते थे। मुंडेर के सहारे चलते हुए किनारे पर आया तो निगाह अपने आप ही बगल वालों के आंगन में चली गयी। उसे याद आया कि उनके यहां कुछ महीने पहले किराएदार आए हैं। काफी पैसे वाले लगते हैं, मुहल्ले में पहली बार किसी ने लम्ब्रेटा स्कूटर  देखा है, जिस पर सवार होकर वो रोज सुबह ऑफिस को निकलते हैं। शायद कोर्ट में कोई ऑफिसर हैं। एक 13-14 साल की लड़की है, एक 7-8 साल का लड़का है और दोनों मियां बीबी हैं। एक भाई और आया हुआ है अपनी बीवी के साथ, सुना है गांव में काफी जमीन है, देख कर ही लगता है कि दबंग किस्म का व्यक्ति है। सुबह नहाने बाद तेल से सने बालों को काढ़ कर, सफेद कुर्ता-पायजामा पहनकर गली में टहलने के लिए भी निकलता है तो अपनी दुनाली कंधे पर टांग लेता है। कुछ नौकर-चाकर भी हैं जो संग में रहते हैं।

आंगन में झांका तो उनकी लड़की लता गुसलखाने से निकल रही थी। 13-14 साल की कमसिन उम्र, बिलकुल जैसे नयी-नयी कोंपले फूटती हैं। कोई असाधारण रूप से सुन्दर नहीं थी, रंग दबा हुआ था फिर भी उसमें कुछ ऐसा था कि विनोद उस पर से निगाह नहीं हटा पाया। गीले बालों को तौलिये से लपेट रखा था, फूलों की आकृति से सजे सलवार-कुर्ते पर जगह-जगह पानी की छींटे पड़ी हुई थीं। आंगन में आकर बालों को झाड़ने के लिए उसने तौलिया खोला तो उसकी निगाह उपर उठी। विनोद को लगा घटाएँ ऊपर आसमान के साथ-साथ नीचे आंगन में भी उतर आयीं हैं और उनसे झरती बूँदें आंगन से ज्यादा उसके मन को भिगो रही हैं। विनोद को अपनी तरफ ताकते देख पहले तो सकपकायी लेकिन फिर प्राकृतिक समझ के जोर मारते ही उसे अहसास हो गया कि विनोद की निगाहें उसके झरने के तरह फूटने को आतुर युवावस्था के आकर्षण में बंधी हैं। उसने विनोद से निगाहें हटा लीं और तौलिए से बाल झाड़ने लगी। एक पारदर्शी मुस्कान उसके होठों पर चुपचाप सरक आयी और मन में प्यारी-सी गुनगनाहट का अनुभव होने लगा। बाल झाड़ने के बाद उसने दुबारा ऊपर देखा तो उसकी मुस्कान इतनी सघन हो चुकी थी कि बिना उसके मुस्कान दिखे विनोद के मन में यह अहसास झनझनाने लगा कि लता को उसके देखने से कोई आपत्ति नहीं है।

उसके बाद से विनोद के लिए आखों का टकराव दुनिया की सबसे प्यारी घटना बन गयी। जब, जहां, जैसे मौका मिलता वो हर समय इसी कोशिश में रहता कि किसी तरह उसकी आंखे उन आंखों से टकरा जाएं जिनका सपना वो सोने के बाद भी देखता रहता है। धीरे-धीरे दूरी कम हो गयी और अब रोज शाम को ये दो जोड़ी आंखें छत पर आ जाती और एक दूसरे का इंतजार करती रहती। एक बार मिल जाने पर ये तब इधर-उधर देखती जब कोई कारण होता। वरना लगातार एक दूसरे से ही उलझती रहती।

कई दिनों के बाद जब पहली बार वो दोनों कुछ बोले तो दोनों को लगा उनकी जान पहचान तो वर्षों से है लेकिन बात पहली कर रहे हैं। नाम, कहां के हो, कौन-सी क्लास वगैरह से शुरू हुई बाते धीरे-धीरे हर बात पर होने लगीं। दोनों अपने-अपने परिवार के लोगों की हकीकतें भी आपस में साझा करने लगे। जब मौका लगता सब की निगाह बचा कर छत पर आ जाते। कभी लता कूद कर विनोद की तरफ आ जाती तो कभी विनोद उसकी तरफ कूद जाता। मुंडेर के कोने में बात करते रहते और जैसे ही कोई पदचाप झीने में सुनायी पड़ती सर्राटे से कूद कर अपनी-अपनी छतों पर आके छुप जाते।

विनोद को पता चल गया कि उसके जैसे-तैसे बाप-दादाओं के मकान और थोड़ी-बहुत जमा-पूंजी से गुजर-बसर कर रहे उसके बेरोजगार पिता के सामने लता के पिता धनकुबेर हैं। कोर्ट में प्रशासनिक अधिकारी उसके पिता तनख्वाह से ज्यादा ऊपर से कमा लेते हैं। लता परिवार वालों की कुछ जमीन जमींदार उन्मूलन कानून के तहत चकबंदी में जा चुकी है लेकिन फिर भी  उन्होंने कुछ फर्जी नामों से काफी जमीन बचा रखी है जिसकी देखभाल लता के चाचा करते हैं। जिसमें गेंहू, आलू, सरसों, मौसमी सब्जियों की खेती करके और वहां लगे ढेरों आम, पपीते, नींबू, कटहल, अमरूद और बेर के पेड़ों से आने वाली फलों की बड़ी खेप बेच कर वो भारी मुनाफा कमाते। अपने खेत में लगे ट्यूब वैल का पानी बेच कर ही वो इतनी कमाई कर लेते थे हर साल पत्नी के सीतारामी, कंगन, हथफूल जैसे अनेक जेवर बन जाते और बनारसी सिल्क की कई साडि़यां उनके लोहे के बक्सों में कैद करने के लिए आ जाती। इसके बदले में हप्ते में एक-दो बार पड़ने वाले झापड़ और रोज शाम को रम के कुछ पेग हलक से नीचे उतरने के बाद दी गयी कुछ लगी-बंधी मां-बहन की गालियां उसे इतनी बुरा सौदा नहीं लगती कि वो कुछ ज्यादा हल्ला मचाए।

मासिक धर्म चालू हो जाने के कारण लता का ज्ञान विनोद से कई गुना ज्यादा था। कई बार वो विनोद के सवालों का जवाब नहीं दे पाती थी लेकिन फिर भी उसने विनोद को काफी कुछ समझा दिया था। लता यह भी जानती थी कि अगर उसके घर में किसी को इस बात की भनक भी लग गयी कि वो विनोद से इस तरह मिलती है तो उन्हें उसकी खाल उखाड़ने में पल भर नहीं लगेगा। फिर भी पता नहीं ये कैसी चौबीसों घंटे चलने वाली जलन थी जिससे राहत पाने के लिए वो विनोद से मिलने के मौके तलाशती रहती थी। शाम को मां के साथ रोटियां सिकवाने के बाद ही उसे छत पर आने का मौका मिलता था। चाची शायद ही कभी घर के काम में हाथ हाँथ बंटाती थी क्योंकि उनकी तो बीमारी ही नहीं खत्म होती थी, कभी घबड़ाहट, तो कभी सरदर्द। जब भी देखो उनके सर पर सर दर्द से राहत पाने के लिए कपड़े की पट्टी ही बंधी रहती। अगर कभी कुछ दिनों के लिए बीमारी से छुटकारा मिलता तो फिर उपरी साए, बुरी हवाएं और उनसे जलने वालो द्वारा किए गए टोटकों का असर हो जाता। कभी काले कपड़े पहने कोई औरत छाती पर आके बैठ जाती और उनकी सांस रुक जाती तो कभी खड़े-खड़े दौरा पड़ जाता और जमीन पर लोट लगाने लगती। इसी कारण साल में आधा समय शहर में रखा जाता क्योंकि ये सब चीजें गांव में जाने पर बढ़ जाती थीं।

दोनों छत पर मिलते समय बहुत सावधानी बरत रहे थे फिर भी लता के घर में कुछ सन्देह के कीड़े पनप गए थे। कोई कुछ कह नहीं रहा था क्योंकि बिना सबूत के वो दोनों साफ मुकर जाते और आगे के लिए और सावधान हो जाते। लता को बिलकुल भी नहीं पता था कि उसके घरवालों को उस पर कुछ-कुछ शक हो चुका है। विनोद के दोस्तों को तो भनक लग गयी थी लेकिन अभी दुश्मनों तक बात नहीं पहुंची थी इसलिए उसके घरवाले अभी बेखबर थे।

उस शाम मौसम कुछ अजीब था। दिन में अच्छी बूंदा-बांदी के बाद शाम को बादलों के टुकड़े टूट गए थे और ढलते सूरज की किरणें बादलों पर सातों रंग बिखेर रही थी। एक उमसभरी बेचैनी हर तरफ थी। विनोद और लता दो दिन बाद मिल रहे थे। हमेशा की तरह दोनों मुंडेर की दीवार से टेक लगा कर बैठे थे।

‘‘दो दिन कहां थी?’’, विनोद की आखों में आज कुछ अलग ही रंग तैर रहे थे। उसके शब्द उखड़ रहे थे, उसका हलक सूख रहा था। कुछ अजीब से विचार उसके मन में लुपलुप कर रहे थे।

‘‘कुछ नहीं वैसे ही, स्कूल का काम, फिर घर का काम, फुरसत ही नहीं मिली!’’, लता ने जमीन पर पड़ी पत्ती उठा कर उसको मोड़ते हुए कहा।

‘‘तुझे पता है जब तुझसे नहीं मिलता हूं तो मेरा क्या हाल हो जाता है?’’, विनोद ने उसका हाथ पकड़ लिया।

‘‘क्या हो जाता है?’’ लता ने अपना हाथ ढीला छोड़ दिया और उसकी आंखों में अपनी आंखें टिका दीं। विनोद ने उसका हाथ कस के दबा दिया। आज उसके अंदर कुछ नयी इच्छाएं रह-रह कर बिजली की तरह चमक रही थीं। लता की आखों में तैरते अनजाने भावों को पढ़ते-पढ़ते उसके हाथों में हरकत हुई और किसी अनजान सी कामना के वशीभूत होकर वो हाथ सरक कर लता के सीने पर आ गए। विनोद को लगा इन कच्चे उभारों को थाम कर उसने पूरी धरती को ही अपनी हथेली पर सजा लिया है। लता जड़ सी हो गयी, कुछ क्षणों में उसकी चेतना लौटी तो अपने भीतर करवटें लेती भविष्य की एक भरीपूरी औरत के जगने का सुखद अहसास उसकी देह के रोम-रोम में भर गया।

‘‘साले!! हरामी!!’’, आग की लपट जैसा तमतमाता और तूफान की तरह चीखता ये स्वर विनोद के कान में पड़ा तो वो लगभग उछल गया। लता के चाचा बेहद चालाकी से अपने घर की सीढि़यों से आने की बजाय विनोद के घर की सीढि़यों से आए थे। विनोद को जैसे लकवा मार गया, उसकी टांगों में इतनी ताकत भी नहीं बची थी कि वो खड़ा हो सके, वो बेदम बैठा रहा।

‘‘कुत्ते की औलाद हमारे घर की इज्जत पर हाथ डालता है? आज तेरे पुरखों की आत्माएं भी नीचे नहीं उतर आयी तो मेरा नाम ठाकुर वेद प्रकाश नहीं। बहनचोद न अपनी जाति देखी, न औकात और हमारी इज्जत पर हाथ डालता है।’’ लता का चचा गुस्से से सचमुच कांप रहा था। इतनी देर में नीचे से लता की मम्मी, चाची और पिता भी आ गये। साथ में दुनाली और लट्ठ लिए नौकर भी थे।

‘‘भाभी! लता को लेकर नीचे जाओ इससे बाद में निबटेंगे!’’

    लता छोटे-छोटे बच्चों की बुक्का फाड़ कर रोने लगी। वो समझ गयी थी कुछ बहुत बुरा होने वाला है। वो अब भी नहीं समझ पा रही थी कि इतनी प्यारे, खूबसूरत और मुलायम से अहसास के लिए सब लोग इतना भयावह और क्रूर सोच क्यों रखते हैं? उसको यह भी लग रहा था उसके यहां से हटते ही विनोद के साथ कुछ बहुत भयानक होगा। वो जमीन पर बैठ गयी। जब वो हाथ खींच कर भी नहीं उठी तो उसकी मम्मी और चाची उसे चीखते-चिल्लाते हुए लगभग गोद में उठा कर नीचे ले गयीं।

‘‘भाईसाहब इसके हाथ अगर आज साबुत बच गए तो हम कहीं मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहेंगे। मेरे सामने इसने हमारे घर की इज्जत पर हाथ डाला है।’’ लता के पिताजी कुछ बोल नहीं रहे थे लेकिन उनके चेहरे पर अंगारों जैसा भाव और आंखों से रह-रह कर निकलती चिंगारियां सब कुछ दर्शा रही थीं।

‘‘हरामी के हाथ पकड़ो’’, लता का चाचा दहाड़ा और नौकर से दुनाली अपने हाथ में ले ली। दो नौकरों ने उसके हाथ पकड़ कर जमीन पर टिका दिए। पहले विनोद ने कोई विरोध नहीं किया लेकिन जब लता के चाचा को दुनाली हाथ में लेते हुए देखा तो विनोद अपने को छुड़ाने के लिए तड़पने लगा। लता के चाचा ने दुनाली को उल्टा पकड़ा और उसका बट पूरी ताकत से विनोद के हाथ पर दे मारा। हड्डियां कट्क से चटक गयीं और खून की कई सारी छोटी-छोटी धाराएं जमीन पर बहने लगी। दर्द का तूफान उंगलियो से उठ कर विनोद के पूरे शरीर में दौड़ने लगा। वो चीखने लगा लेकिन लता के चाचा ने दूसरे हाथ की उंगलियों पर भी बट को पटक दिया। दर्द के कारण विनोद की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा। नौकरों ने उसे छोड़ दिया।

‘‘बस छोड़ दो! मर-मुर गया तो हमारे सर हत्या लगेगी।’’ लता के पिता ने कहा। चाचा भी पीछे हट गया था और और दुनाली अपने कंधे पर टांग ली। सब उसे छोड़ कर नीचे जाने लगे तो सीढि़यों के पास तक पहुंच कर लता का पिता लौट कर आया और कस के एक लात विनोद को जमाते हुए घ्रणा से लथपथ स्वर में बोला, ‘‘साले मेरी बेटी को हाथ लगाता है!’’ फिर सब नीचे उतरते गए।

बेहोशी और दर्द के सागर में डुबते उतरते हुए विनोद को आखिरी शब्द किसी तरह छत में लता के चाचा द्वारा बाहर से लगायी कुंडी को भीतर से तोड़ कर आयी अपनी मां के सुनायी दिए, ‘‘क्या आग लगी थी तुझे जो अपनी ये गत बनवा ली। हमें भी कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा। हाय राम!!’’

विनोद को अपने हाथ में दो अहसास गड्गमड्ड होते हुए महसूस हुए। एक मुलायम सा अहसास था हाथ में भरे हुए लता के धड़कते हुए अर्द्धविकसित उभारों का जो उसके पूरे अस्तित्व को सुख के कंपन से धड़का रहा था और दूसरा अहसास था हाथों से दौड़ती भयानक पीड़ा की तरंगों का जिसके आगे मौत भी सहज थी। दोनों अहसास आपस में घुल गए और विनोद बेहाश हो गया।

उसके बाद जैसे जिंदगी सिर्फ कैलेन्डर में आगे बढ़ते दिनों की संख्या हो गयी। हॉस्पिटल से घर आने में उसे एक महीना लगा। उसके बाद पूरी तरह ठीक होने में लगे छः महीनों ने उसकी जिंदगी को पूरी तरह ठूंठ कर दिया। खाने-पीने यहाँ तक दैनिक कर्म तक करने के लिए वो जिस तरह दूसरों पर निर्भर हो गया उसने उसके अंतर्मन को पूरी तरह चटका दिया। वह सर जिन्दा था न उसकी जिन्दगी में उम्मीदों की खुशबू थी न कोई जीने का अहसास। बस सांस लेनी थी और जिंदा रहना था। उसके माता-पिता ने घर बेच दिया और अपने इकलौते बेटे को लेकर गांव आ गए। बाप-दादाओं की थोड़ी सी जमीन थी और मकान बेच कर मिले पैसे जिससे गुजर-बसर चल निकली। गांव के स्कूल में ही विनोद को भर्ती कर दिया।

विनोद को गांव की सौंधी महक से भरी मिटटी, हरियाली, ताजी हवा, दूर-दूर तक फैले हरे-भरे खेत और खेतों के बीच बहती खूबसूरत नहरों में भी सिर्फ रेगिस्तान ही नजर आता था। उसके पास दो ही रास्ते थे, एक अपने को खत्म कर देना या दूसरा पढ़ाई करना। उसने पहले विकल्प के लिए कई बार नहर के आस-पास चक्कर लगाए, कीड़े मार दवाई की शीशी हाथ में ली और गांव के पास से गुजरती रेल की पटरी पर काफी देर तक बैठ के भी देखा। लेकिन फिर पता नहीं क्यों उसने पढ़ने का निर्णय लिया। उसके पढ़ने के पागलपन के सामने स्कूल की टूटी छत, ढीठ और मक्कार मास्टर, फटी किताबें, गंदी स्कूल ड्रैस और घिसी हुई छोटी-छोटी पैंसिले सबकी कोशिशें बेकार साबित हुईं और वो पढ़ता गया।

उसका कोई दोस्त नहीं था, कोई दोस्त बनने की कोशिश भी करता तो वह अपने को घोंघे की तरह कवच में समेट लेता। अंत में निराश हो कर वही उसे छोड़ देता। उसकी जबरदस्त पढ़ाकू प्रवृत्ति के कारण मास्टर भी उससे खौफ खाते थे और सिर्फ काम-काम की बात ही करते। स्कूल के ज्यादातर विद्यार्थी अपने शरीर और अपने विपरीतलिंगी के शरीर के बारे में बतियाने और उसका अनुभव करने के लिए पगलाए रहते लेकिन उसे दिन रात बस एक ही चीज सूझती थी, पढ़ाई, पढाई और सिर्फ पढाई  उसे लगता था कि वो एक  निरीह जन्तु है और पूरी दुनिया जबरदस्त शिकारी है बस पढ़ाई ही एक ऐसा खतरनाक डंक है जिससे वो दुनिया पर पलटवार कर सकता है।

उसे हर हालत में पढ़ना था, क्योंकि पढ़ना ही उसका जीवन से जुड़ा हुआ एक मात्र तन्तु था। रिश्ते-नातों की सब डोरें उसने काट दी थीं, मन की जमीन इतनी सूखी और कठोर हो गयी थी कि उसमें प्यार के फूल खिलना तो दूर भावनाओं का एक अंकुर तक नहीं फूट सकता था। किताबों में लिखे सूखे बेजान शब्दों से ही उसे प्यार था और दिन रात उन्ही से खेलता था। परीक्षाएं उसके लिए बेमानी थी, उनका मतलब सिर्फ इसलिए था कि नयी किताबें आ जाएं। जितनी भी तरह की छात्रवृत्तियां थीं वो सब उसे बिना प्रयासों के मिलती गयीं। जिस भी कक्षा में वो होता उसके पढ़ाई के पागलपन के सामने बड़ी-बड़ी प्रतिभाएं पानी मांग जाती थीं। पढ़ने में आने वाली बाधाओं से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था।

समय के साथ-साथ उसके मन की जमीन सूखती गयी और धीरे-धीरे वो कंक्रीट की सतह में बदल गयी। अब उस पर न किसी आघात का असर होता था न ही दया, ममता, स्नेह, करुणा जैसी भावनाओं का मतलब था। सफलता का उसके लिए एक ही मतलब था, परीक्षाओं को ऐसे पास करना कि बाकी लोग उसका स्वप्न भी नहीं देख पाएं, और साथ में ढेर सारे पैसे और ताकत जमा करना। दिल्ली चला गया, ट्यूशन पढ़ा-पढ़ा कर काफी पैसे जमा करने के बाद उसने अपना सेन्टर दूसरे टीचर्स किराए पर दे दिया दिया और खुद सीपीएमटी में पास होकर एम.बी.बी.एस. करने लगा। सभी परीक्षाओं में वो गोल्ड मैडलिस्ट ही बना रहा। एम.बी.बी.एस. के बाद कुछ महीने प्रैक्टिस और फिर ओर्थोपेडिक्स  की पढ़ाई करने के लिए अमेरिका का रुख किया। न कभी मां-बाप को पूछा, न कभी किसी से दोस्ती की। सिर्फ औपचारिक सम्बन्ध रखे। लौट के यहां आकर बैंक से लोन लिया, हॉस्पिटल की नींव रखी, और शहर के सबसे प्रतिष्ठित डाक्टरों में से एक की बेटी से शादी करके अपना परिवार भी बसा लिया।

उसके बाद पैसा कमाने का जो झंझावत उसने खड़ा किया वो थमा नहीं। मामुली हॉस्पिटल  से प्रदेश के सबसे आधुनिक ट्रोमा सेंटर में से एक बना लिया। हाथों में लगी हुई चोट ऊपर से तो ठीक हो चुकी थी लेकिन अपनी आत्मा की गहराइयों में धंसी उसकी टीस भुलाने के लिए वो हाथ किसी हत्यारे के हाथों से भी क्रूर हो गए। ये हाथ जान तो बचाते थे लेकिन तभी जब जिसकी जान बचानी हो उसके पास नोटो का दरिया बहता हो या वो अपना सब कुछ बेच कर इलाज कराने की मंशा रखता हो। मरीज की जान, दर्द, चीखों, तड़प का उस पर रत्ती भर असर नहीं होता था।

लेकिन आज ये कंक्रीट की सतह चटक गयी और उसमें दबा कर रखे अतीत के सभी ताबूत खुल गए और उनमें से पुरानी यादों के सभी कंकाल बाहर आ गए। डा॰ विनोद को लगा वो किसी अद्रश्य शक्ति के वशीभूत हो गए हैं और किसी जांबी की तरह लड़खड़ाते हुए उठे। जब कोई व्यक्ति वर्तमान से पूरी तरह कट जाए और पूरी तरह अपने अतीत के वश में हो जाए तो वह  जोम्बी हो जाता है।

लड़खड़ाते डा॰ विनोद ऑपरेशन टेबल के पास खड़े हो गए। सर से पांव तक ऑपरेशन पर टेबल पर पड़े उस शरीर को घूरा। फिर वही उमस भरी बेचैनी वातानुकुलित ऑपरेशन थियेटर में समाने लगी। बंद दीवारों के भीतर बादलों के टुकड़े तैर आए और सूरज के सातों रंग उन पर उछटने लगे। 40 साल की उम्र, लम्बा वैवाहिक जीवन, दो बच्चों के बाप के भीतर एक किशोर छटपटाने लगा, जैसे कोकून के अंदर कोई कीट फड़फड़ाता है। हाथ किसी अदृश्य शक्ति के वशीभूत हो कर उस लड़की की ओर बढ़ा और उसके सीने पर जाकर टिक गया। उनके हाथ के नीचे समाए कच्चे उभार में उसके जीवन होने के सबूत के रूप में धड़कन महसूस हो रही थी। मुलायम गर्माहट कपड़ों से रिस कर उनके हाथ को तर करने लगी।

डा॰ विनोद के हाथ की मजबूत पकड़ का प्रभाव था या कोई संयोग, वो लड़की खांसी,  इससे पहले कि डा॰ विनोद अपना हाथ हटा पाते, उस लड़की की पूरी देह कांपी, ऐंठी और अटकती सांसों और गहरी खांसी के साथ उसकी नाक से खून की धार भराभरा कर बह आयी। डा॰ विनोद के हाथ लाल-लाल खून से सन गए। उन्होंने झटके से अपना हाथ हटा लिया।

इस खून की लाली में पता नहीं क्या खास बात थी कि खून के दरिया से भी बेहिचक निकल जाने वाले डा॰ विनोद अपना मानसिक सन्तुलन खो बैठे। उनके दिमाग में फिर सब गड्ड-मड्ड होने लगा। किशोरावस्था में स्त्री देह से परिचय का पहला नर्म-नाजुक अहसास, फिर वो भयानक पीड़ा और अब ये लावे की तरह हाथ को जलाता खून। वो जमीन पर गिर पड़े और बदहवासी में चिल्लाने लगे, ‘‘लता मर गयी! लता मर गयी!!’’ उनका स्वर पता नहीं किस पाताल से निकल रहा था और घुम कर बूमरैंग की तरह उसी पाताल में समा जा रहा था।

डाक्टर साहब की आवाजें सुन कर डा॰ अनुज और सिक्योरिटी गार्ड ने किसी तरह चाबी लाकर बाहर से दरवाजा खोला। खून से सनी लड़की को स्ट्रेचर पर रख कर इन्टेन्सिव केयर युनिट में पहुंचाया। डाक्टर साहब को भी किसी तरह स्ट्रेचर पर लिटा कर अलग वार्ड में भेजने की व्यवस्था की।

जब बेहोशी में बड़बड़ाते हुए डाक्टर साहब को मरीजों के बीच से स्ट्रेचर पर ले जा रहे थे सब भौंचक्के से उन्हें देख रहे थे। जमीन पर बैठा उस बच्ची का बाप अपने उलझे हुए खिचड़ी बालों में हाथ फिराता हुआ चकित भाव से सोच रहा था कि डाक्टर साहब बार-बार उसकी पत्नी का नाम क्यों ले रहे हैं। वो भी तब जब उसकी पत्नी ने शादी के एक साल बाद ही इस बच्ची को पैदा करने के बाद नामालुम किस कारण से आत्महत्या कर ली थी!!